10/05/2026
recites:
मैंने सोचा था वो बाहर चले गए हैं, इसलिए निश्चित हो कर बत्ती जलाई थी। उन्हें देखकर मैं डर सा गया, जिसके पीले अँधेरे में कोई प्रेत छाया दिखाई दे गयी हो। हालाँकि वो वहीं बैठे थे, जैसे मैं उन्हें रोज देखता था.. पलंग पर झुके हुए.. टाँग लटकाए हुए। रोशनी के चकाचौंध से वो कुछ अकबका से गए, मीचमिचाती आँखों से मुझे देखने लगे। “आज आप टहलने नहीं गए?” मैंने पूछा। “बस जाने ही वाला था।” वो अपनी cigarette की डिब्बी खोलने लगे।
एक के बाद एक सिगरेटों के टूटे बट्स झाँकने लगे। वो आधी पी कर आधी छोड़ देते थे। इसके एक सिरे पर अपनी इच्छा दूसरे सिरे पर डॉक्टर के हिदायत.. आधे आधे पूरे हो जाते थे।
कुछ देर तक वो असमंजस में इन मुझौंसे टूटों से खेलते रहे.. फिर वो उठ खड़े हुए।