31/12/2025
एक शाम की बारिश में
मेरा नाम रिया है। आज, 31 दिसंबर 2025 की रात को, जब बाहर ठंडी हवा चल रही है और मैं अकेली अपने फ्लैट में बैठी हूं, पुरानी यादें फिर से ताज़ा हो गईं। ये बात दो साल पुरानी है, जब मैं लखनऊ में अपनी नौकरी के सिलसिले में नई-नई शिफ्ट हुई थी। मैं उस वक्त 28 साल की थी, तलाकशुदा, और ज़िंदगी को फिर से शुरू करने की कोशिश कर रही थी। मेरा तलाक हो चुका था, और मैं अकेलापन महसूस करती थी – वो अकेलापन जो रातों में और गहरा हो जाता है।
लखनऊ की गलियां, चौक की चाट, और हजरतगंज की चहल-पहल – सब कुछ नया लगता था। एक दिन ऑफिस के बाद मैं अमीनाबाद मार्केट घूमने गई। बारिश शुरू हो गई थी, अचानक तेज़। मैं एक पुरानी किताबों की दुकान में भीगते-भीगते घुस गई। वहीं मिले वो – आरव। उम्र करीब 35 के आसपास, लंबे, गेहुंआ रंग, हल्की दाढ़ी और आंखों में वो अवधी नरमी जो लखनऊ के मर्दों में खास होती है। उनकी मुस्कान में कुछ ऐसा था जो मुझे खींचता चला गया।
उन्होंने मुझे अपनी छतरी दी और कहा, “जनाब, भीग जाएंगी आप। चलिए, मैं छोड़ देता हूं।” उनकी आवाज़ में वो मीठी अवधी लहजा था – “जनाब” कहते ही दिल में कुछ हलचल सी हुई। हम साथ-साथ निकले। बातें शुरू हुईं। पता चला वो वहीं के पुराने रहने वाले हैं, फैमिली बिजनेस करते हैं – चिकनकारी का काम। उनकी बातों से लगा जैसे वो शादीशुदा हैं, लेकिन वो कभी उस बारे में नहीं बोले, और मैंने भी नहीं पूछा। शायद यही वो निषिद्ध आकर्षण था जो हमें करीब लाया।
धीरे-धीरे मिलने का सिलसिला शुरू हुआ। वो मुझे लखनऊ की गुमनाम जगहें दिखाते – बड़ा इमामबाड़ा की छिपी गलियां, रूमी दरवाज़ा के पीछे वाली शांत जगहें। उनकी बातों में अवधी शब्द घुलते – “हमार”, “तुमका”, “बहुत दिनन से”। मुझे अच्छा लगता। एक दिन शाम को हम भूलभुलैया के पास बैठे थे। बारिश फिर शुरू हो गई। वो मेरे करीब आए, मेरे गीले बालों को पीछे किया और धीरे से कहा, “रिया, तुमका देखते ही दिल बेकरार हो जाता है।”
मैंने कुछ नहीं कहा, बस उनकी आंखों में देखा। फिर वो झुके और मेरे होंठों पर अपना होंठ रख दिया। वो चुंबन इतना नरम, इतना गहरा था कि सारी दुनिया भूल गई। उनके होंठ मेरे होंठों को चूस रहे थे, जीभ मेरी जीभ से खेल रही थी। उनके हाथ मेरी कमर पर थे, धीरे-धीरे ऊपर की तरफ सरकते हुए मेरे स्तनों को छूने लगे। मैं उनके सीने से चिपक गई, मेरी सांसें तेज़ हो गईं। बारिश में हम भीगते रहे, पर गर्मी बढ़ती गई। उनकी उंगलियां मेरी ब्लाउज के बटन खोलने लगीं, और मैंने रोकने की बजाय उन्हें और करीब खींच लिया।
उस रात वो मुझे अपने घर ले गए। पुराना लखनऊ का बड़ा सा घर, जहां सिर्फ वो अकेले रहते थे – उनकी पत्नी गांव में थी, या शायद ये सिर्फ बहाना था। कमरे में पुरानी लकड़ी की महक, चिकन के पर्दे, और दीवार पर अवधी शायरी की तस्वीरें। हमने खाना साथ खाया – उनकी बनाई हुई बिरयानी, जो इतनी स्वादिष्ट थी कि मैंने उंगलियां चाट लीं। खाने के बाद वो मुझे अपने बेडरूम में ले गए। कमरे की लाइट मद्धम थी, सिर्फ एक लैंप जल रहा था जो हमारी छायाओं को दीवार पर नाचता हुआ दिखा रहा था।
उन्होंने धीरे-धीरे मेरी साड़ी खोली। पहले पल्लू गिराया, फिर प्लेट्स एक-एक करके खोलीं। मेरी त्वचा पर उनके उंगलियों का स्पर्श जैसे बिजली सा था। वो मेरे गले पर किस करते, कान में फुसफुसाते, “रिया, तुम बहुत हसीन हो। हम तुमका बहुत चाहत बानी।” उनकी जीभ मेरे कान के लोब को चाट रही थी, और मैं कांप उठी। मैंने उनकी कुर्ता उतारी, उनके सीने पर किस किया। उनका सीना चौड़ा, बालों से भरा हुआ – मैंने अपनी उंगलियां उसमें फंसाईं। हम बिस्तर पर लेट गए। उनकी उंगलियां मेरे शरीर के हर हिस्से पर घूम रही थीं – पहले स्तनों पर, निप्पल्स को मसलते हुए, जो अब सख्त हो चुके थे। मैं सिसकारियां ले रही थी, “आरव… आह…”। फिर उनकी उंगलियां नीचे सरकीं, मेरी जांघों के बीच। वो धीरे-धीरे मेरी पैंटी उतार रहे थे, और मैं अपनी टांगें फैला रही थी। उनकी उंगली मेरे क्लिटोरिस पर रगड़ रही थी, गोल-गोल घुमाते हुए, और मैं गीली हो चुकी थी।
जब वो मेरे अंदर आए, तो ऐसा लगा जैसे सालों की प्यास बुझ रही हो। उनका लिंग मोटा, सख्त – धीरे-धीरे अंदर सरकता हुआ। मैंने अपनी कमर ऊपर उठाई, उन्हें और गहरा महसूस करने के लिए। धीमी, गहरी चाल। उनकी सांसें मेरे कान में, मेरे नाखून उनकी पीठ पर खरोंच मार रहे थे। वो मेरे स्तनों को चूस रहे थे, एक को मुंह में लेकर, दूसरे को हाथ से दबाते हुए। मैं चीख रही थी, “आरव… तेज़… और तेज़…”। वो मेरे ऊपर थे, उनके पसीने की बूंदें मेरे शरीर पर गिर रही थीं। फिर वो मुझे ऊपर आने को कहा, मैं उनकी गोद में बैठ गई। मैं ऊपर-नीचे हो रही थी, उनका लिंग मेरे अंदर-बाहर। उनकी उंगलियां मेरी गांड पर थीं, दबाते हुए। हमारा रिदम बढ़ता गया। मेरी चीखें कमरे में गूंज रही थीं, उनकी अवधी में पुकार – “रिया… बस… और… तुम्हारी ये गर्मी… आह…”। मैंने महसूस किया कि मैं चरम पर पहुंच रही हूं, मेरी योनि सिकुड़ रही थी उसके चारों ओर। आखिर में हम दोनों साथ थक कर गिर पड़े, एक-दूसरे से लिपटे हुए, पसीने से तर। वो मेरे अंदर ही झड़ गए, और मैंने वो गर्माहट महसूस की जो मुझे शांत कर गई।
उसके बाद कई महीने ऐसे ही बीते।हर मिलन में नई तीव्रता। एक बार उनके घर की छत पर, जहां रात का आसमान साफ था। हमने वहां एक चादर बिछाई। वो मुझे पीछे से पकड़े, मेरी गर्दन पर किस करते। उनकी उंगलियां मेरी ब्रा के हुक खोल रही थीं, और मैं उनकी जींस की जिप खोल रही थी। वो मुझे दीवार से सटा कर खड़े-खड़े ही अंदर घुसे, मेरी एक टांग ऊपर उठाकर। मैं दीवार पकड़े हुए सिसकारियां ले रही थी, हवा में हमारी सांसें मिल रही थीं। दूसरी बार मेरे फ्लैट में, जहां हमने शॉवर में साथ नहाया। पानी की बौछार के नीचे, वो मेरे शरीर पर साबुन लगा रहे थे – स्तनों पर, पेट पर, जांघों पर। उनकी उंगलियां फिर से मेरे अंदर, और मैं उनके लिंग को हाथ से सहला रही थी। हम फर्श पर गिर पड़े, पानी बहता रहा, और हम एक-दूसरे में खो गए। वो मुझे अपनी जीभ से नीचे की तरफ खुश कर रहे थे, मेरे क्लिटोरिस को चूसते हुए, और मैं उनके बाल पकड़े चीख रही थी। फिर मैंने उन्हें मुंह में लिया, उनकी आहें सुनकर और उत्तेजित हो गई।
वो मुझे अवधी में लव लेटर्स लिखते – “तुम बिना जीना मुश्किल बा। तुम्हारी वो रातें याद आतीं, जब हम एक हो जाते।” पर ज़िंदगी की अपनी रफ्तार है। उनकी फैमिली ने शादी तय कर दी, पुरानी रिश्तेदारी की। मैं समझती थी – अवध के घरों में ये सब चलता है, लेकिन दिल टूटा। हमने आखिरी बार मिलकर खूब रोया, खूब प्यार किया। उस आखिरी रात, हमने सब कुछ आज़माया – धीमे से शुरू, फिर तेज़, पीछे से, ऊपर से। वो मेरी गांड पर किस करते, उंगलियां डालते, और मैंने पहली बार वो भी आज़माया। दर्द था, लेकिन सुख भी।आखिर में अलविदा कहा, आंसूओं के साथ।
आज भी जब लखनऊ की बारिश याद आती है, या अवधी लहजा सुनाई देता है, तो दिल में वो गर्मी फिर महसूस होती है। वो रिश्ता शायद गलत था, निषिद्ध था, पर सच था। मेरे जीवन का सबसे खूबसूरत, सबसे कामुक अध्याय।
ये मेरी सच्ची कहानी है… या शायद सिर्फ मेरी याद।