17/03/2026
पती जेल में था और पत्नी के साथ यह क्या हो रहा था /
गुलाबचंद और रेशमा: प्रतिशोध, त्याग और पुनर्मिलन की अमर गाथा
यह कहानी उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले की उन गलियों से निकलती है, जहाँ धूल और सादगी के बीच एक ऐसा प्रेम पनपा जिसने कानून, समाज और समय की सीमाओं को चुनौती दे दी। यह महज एक अपराध की कहानी नहीं है, बल्कि एक पुरुष के स्वाभिमान और एक स्त्री के अटूट धैर्य की गाथा है, जिसका समापन हाल ही में अयोध्या की पावन भूमि पर हुआ।
1. मासूमियत का अंत और विछोह की पहली रात
साल 2003 की बात है। 19 साल का गुलाबचंद एक सीधा-साधा, कम बोलने वाला युवक था। उसका विवाह 17 साल की रेशमा से हुआ। दोनों के मन में नए जीवन के हजारों सपने थे। शादी के बाद रेशमा जब पहली बार अपने ससुराल आई, तो गुलाब को लगा जैसे उसके घर में साक्षात लक्ष्मी आ गई हो। लेकिन परंपरा के अनुसार, शादी के महज सात दिन बाद रेशमा के मायके वाले उसे 'गौना' (विदाई) कराकर वापस ले गए।
गुलाब के लिए वे सात दिन सात जन्मों जैसे थे। रेशमा के जाने के बाद उसका मन किसी काम में नहीं लगता था। उस दौर में न तो हर हाथ में मोबाइल था और न ही बात करने का कोई और जरिया। विछोह की तड़प जब बर्दाश्त से बाहर हो गई, तो शादी के कुछ ही दिनों बाद एक शाम 5 बजे गुलाब ने अपनी पुरानी साइकिल उठाई। 40 किलोमीटर का रास्ता, कच्ची सड़कें और गहराता अंधेरा भी उसके कदमों को नहीं रोक सका। रात के 10 बजे, जब पूरा गांव सो चुका था, गुलाब ने रेशमा के घर का दरवाजा खटखटाया।
जब रेशमा ने दरवाजा खोला और अपने पति को पसीने से लथपथ, साइकिल के साथ देखा, तो उसकी आंखों में हैरानी और प्यार के आंसू एक साथ छलक पड़े। वह रात उनके जीवन की सबसे सुखद लेकिन आखिरी सामान्य रात साबित होने वाली थी।
2. खौफनाक सच और मर्यादा का चीरहरण
अगली सुबह जब गांव में शोर हुआ कि गुलाबचंद रात को ही ससुराल आ गया है, तो पड़ोस में रहने वाले दबंग मंटू और उसके पिता दत्तू के सीने पर सांप लोटने लगे। उनका रेशमा के परिवार के साथ जमीन का एक पुराना विवाद था। वे उस उपजाऊ जमीन को हड़पना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने रेशमा के परिवार को हमेशा कमजोर समझकर प्रताड़ित किया था।
गुलाब जब घर के बाहर निकला, तो मंटू और दत्तू ने गाली-गलौज शुरू कर दी। बात हाथापाई तक पहुंच गई। मंटू ने गुलाब के ससुर को धक्का देकर गिरा दिया। जब गुलाब ने बीच-बचाव किया, तो मंटू ने पूरे गांव के सामने वह जहर उगला जिसने गुलाब के भीतर के शांत इंसान को एक शिकारी में बदल दिया।
मंटू ने अट्टहास करते हुए कहा, "तू किस बात की धौंस दिखा रहा है? अपनी इस 'सती-सावित्री' पत्नी से पूछ, जब तू यहाँ नहीं था, तब मैंने इसके साथ क्या-क्या किया है। अगर तू मर्द है, तो पूछ इससे... और सुन, पहले जो किया वो तो तूने देखा नहीं, पर अब जो करेंगे वो तेरी आंखों के सामने करेंगे।"
दत्तू ने अपने बेटे की पीठ थपथपाते हुए कहा, "हाँ, अब देखते हैं तेरी मर्दानगी कितनी बड़ी है।"
गुलाब के लिए यह सिर्फ शब्द नहीं थे, बल्कि उसकी आत्मा पर किया गया प्रहार था।
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