03/03/2026
नंदिनी 2 | कूड़ा बिनने वाले ने कर दिखाया दूसरा चमत्कार | लेफ्टिनेंट नंदिनी की सच्चाई | मौत से छीना
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रात के ठीक दो बज रहे थे।
सैन्य अस्पताल की ऊँची इमारत पर पीली रोशनी टिमटिमा रही थी। बाहर सन्नाटा था, लेकिन भीतर बेचैनी उबल रही थी।
आईसीयू के बाहर एक बेंच पर बारह साल का वंश बैठा था। कंधे पर पट्टी बंधी थी। घुटनों पर सूखा खून। चेहरा धूल और आँसुओं से सना हुआ। पर आँखों में डर से ज्यादा जिद थी।
आईसीयू के भीतर लेफ्टिनेंट नंदिनी राठौड़ बेहोश पड़ी थीं।
मशीन की हर बीप वंश के दिल की धड़कन से जुड़ी हुई लग रही थी।
अचानक अस्पताल के मुख्य गेट पर ब्रेक की तीखी आवाज गूंजी।
दो बाइक। फिर एक काली जीप।
गेट पर तैनात सिपाही चौंक गए।
“कौन हो तुम लोग?”
जीप से चार आदमी उतरे। चेहरे काले कपड़े से ढंके। हाथों में हथियार।
एक ने ठंडी आवाज में कहा—
“लेफ्टिनेंट नंदिनी राठौड़ से मिलना है।”
“मुलाकात का समय खत्म है,” सिपाही ने रोका।
दूसरे ने बंदूक ऊपर उठा दी—
“हमें समय की परवाह नहीं।”
अगले ही पल हवा में गोली चली।
धड़ाम!
अस्पताल के शीशे कांप उठे। चीखें गूंज उठीं।