Osho प्रवचन

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(1)

 #संसार में असफलता अनिवार्य क्यों है?संसार का स्वभाव। स्वप्न का स्वभाव। स्वप्न यथार्थ नहीं है। इसलिए स्वप्न में कोई सफलत...
16/07/2025

#संसार में असफलता अनिवार्य क्यों है?

संसार का स्वभाव। स्वप्न का स्वभाव। स्वप्न यथार्थ नहीं है। इसलिए स्वप्न में कोई सफलता नहीं हो सकती।

तुम ऐसा प्रश्न पूछ रहे हो, जैसे कोई आदमी कागज पर लिखे हुए भोजन को "भोजन' समझ ले; पाकशास्त्र की किताब से पन्ने फाड़ ले और चबा जाये, और कहे कि पाकशास्त्र में तो सभी तरह के भोजन लिखें हैं, फिर पाकशास्त्र के पन्ने चबाने से तृप्ति क्यों नहीं होती?

कागज पर लिखा हुआ "भोजन' भोजन नहीं है। सपने में मिला हुआ धन धन नहीं है। संसार में जो भी मिलता है, मिलता नहीं, बस मिलता मालूम पड़ता है। क्योंकि तुम सोये हुए हो--तुम्हारे सोये हुए होने का नाम संसार है।

संसार का क्या अर्थ है? ये वृक्ष, ये चांद, ये तारे, ये सूरज, ये लोग--यह संसार है? तो तुम गलत समझ गये। संसार का मतलब है तुम्हारी आकांक्षाओं का जोड़; तुम्हारे सपनों का जोड़। संसार तुम्हारे भीतर है, बाहर नहीं। तुम्हारी निद्रा, तुम्हारी घनीभूत मूर्च्छा का नाम संसार है। मूर्च्छा में तुम जो भी कर रहे हो उससे कोई तृप्ति नहीं होगी। मूर्च्छा में तुम्हें होश ही नहीं कि तुम क्या कर रहे हो। तुम बेहोशी में चले जा रहे हो। तुम्हारी हालत एक शराबी जैसी है।

मुल्ला नसरुद्दीन एक रात ज्यादा पीकर घर आया। रास्ते में कई जगह गिरा, बिजली के खंभे से टकरा गया, चेहरे पर कई जगह चोप आ गयी, खरोंच लग गयी। आधी रात घर पहुंचा, सोचा पत्नी सुबह परेशान करेगी, कि तुम ज्यादा पीये। और प्रमाण साफ है, कि चोटें लगी हैं, खरोंचें लगी हैं चेहरे पर, चमड़ी छिल गई है।
तो उसने सोचा कि कुछ इंतजाम कर लें। तो वह गया बाथरूम में, बेलाडोना की पट्टी उसने लगाई सब चेहरे पर कि सुबह तक कुछ तो राहत हो जायेगी। और इतना तो मैं सिद्ध कर ही सकूंगा कि अगर पीये होता तो बेलाडोना लगाने की याद रहती? गिर पड़ा था रास्ते पर, पैर फिसल गया छिलके पर। घर आकर मैंने मलहम पट्टी कर ली।

बड़ा प्रसन्न सोया। सुबह पत्नी ने कहा कि यह हालत चेहरे की कैसे हुई? उसने कहा: मैं गिर गया था, एक केले के छिलके पर पैर फिसल गया। और देख ख्याल रखना, मैं कोई ज्यादा वगैरह नहीं पिया था। प्रमाण है साफ कि मैंने सारे चेहरे की मलहम-पट्टी की।

उसने कहा, हां, प्रमाण है, आओ मेरे साथ। आईने पर की थी उसने मलहम पट्टी। चेहरा तो आईने में दिखाई पड़ रहा था। प्रमाण हैं--उसकी पत्नी ने कहा--कि मलहम-पट्टी तुमने जरूर की है, पूरा आईना खराब कर दिया है। अब दिन-भर मुझे सफाई में लगेगा।

बेहोश आदमी जो करेगा, उसका क्या भरोसा! कुछ न कुछ भूल होगी ही।

संसार तुम्हारी बेहोशी का नाम है। और इसलिए अनिवार्य है असफलता।

एक और रात मुल्ला नसरुद्दीन ज्यादा पी कर आ गया। जो-जो ज्यादा पीकर आते हैं, उनको बेचारों को घर आकर कुछ इंतजाम करना पड़ता है।

सरकता हुआ किसी तरह कमरे में घुस गया। आवाज न हो, लेकिन फिर भी आवाज हो गई। पत्नी ने पूछा, क्या कर रहे हो? उसने कहा, कुरान पढ़ रहा हूं। अब ऐसी अच्छी बात कोई कर रहा हो, आधी रात में भी करे तो रोक तो नहीं सकते। धार्मिक कृत्य तो रोका ही नहीं जा सका। पत्नी उठी और उसने सोचा कि कुरान और आधी रात, और कभी कुरान इसे पढ़ता देखा नहीं! जाकर देखी, सिर हिला रहा है और सामने सूटकेस खोल रखे हैं।

"कुरान कहां है?'

उसने कहा, सामने रखी है।

आदमी बेहोशी में जो भी करेगा, गलत होगा।

तुम पूछते हो, संसार में असफलता अनिवार्य क्यों है?

क्योंकि संसार तुम्हारी बेहोशी का नाम है। फिर बेहोशियां कई तरह की हैं। कोई शराब की ही बेहोशी नहीं होती। शराब की बेहोशी तो सबसे कम बेहोशी है।
असली बेहोशियां तो बड़ी गहरी हैं। जैसे पद की बेहोशी होती है, पद की शराब होती है--पद-मद। जो आदमी पद बैठ जाता है, उसका देखो उसके पैर फिर जमीन पर नहीं लगते।

कोई हो गया प्रधान मंत्री, कोई हो गया राष्ट्रपति, फिर वह जमीन पर नहीं चलता, उसको पंख लग जाते हैं। पद-मद! किसी को धन मिल गया तो धन का मद। ये असली शराबें हैं। शराब तो कुछ भी नहीं इनके मुकाबले। पियोगे, घड़ी-दो घड़ी में उतर जाएगा नशा। ये नशे ऐसे हैं कि टिकते हैं, जिंदगी-भर पीछा करते हैं। चढ़े ही रहते हैं।

बहुत नशे हैं। और जिसे जागना हो उसे प्रत्येक नशे से सावधान होना पड़ता है। जागने के दो ही उपास हैं--या तो ध्यान की तलवार लेकर अपने सारे नशों की जड़ें काट दो; या परमात्मा के प्रेम से अपनी आंखें भर लो। शेष नशे अपने-आप भाग जायेंगे। उसकी मौजूदगी में नहीं टिकते हैं। या तो परमात्मा के बार प्रेम से भर जाओ, आत्मा के ध्यान से भर जाओ। ये दो ही उपाय है। संसार के जाने के ये दो ही द्वार हैं। तुम्हें रुच जाये।

तुम पूछते हो: संसार में असफलता अनिवार्य क्यों है?

संसार का स्वभाव ऐसा।
#कृष्ण #ओशो #मन #बुद्ध #प्रश्न

ओशोएक युवक ने आकर कहा है, 'मैं नास्तिक हो गया हूं।'मैं उसे देखता हूं। उसे पहले से जानता हूं। जीवन-सत्य को जानने की उसकी ...
16/07/2025

ओशो
एक युवक ने आकर कहा है, 'मैं नास्तिक हो गया हूं।'
मैं उसे देखता हूं। उसे पहले से जानता हूं। जीवन-सत्य को जानने की उसकी प्यास तीव्र है। वह किसी भी मूल्य पर सत्य को अनुभव करना चाहता है। उसमें तीव्र प्रतिभा है और सतही आस्थाएं उसे तृप्त नहीं करती हैं।
संस्कार, परंपरा और रूढि़यां उसे कुछ भी नहीं दे पा रही हैं। वह संदेहों और शंकाओं से घिर गया है। सारे मानसिक सहारे और धारणाएं खंडित हो गयी हैं और वह उसके एक घने नकार में डूब गया है।
मैं चुप हूं। वह दुबारा बोला है, 'ईश्वर पर से मेरी श्रद्धा हट गयी है। कोई ईश्वर नहीं है। मैं अधार्मिक हो गया हूं।'
मैं उससे कहता हूं कि यह मत कहो। नास्तिक होना, अधार्मिक होना नहीं है। वास्तविक आस्तिकता पाने के लिए नकार से गुजरना ही होता है। वह अधार्मिक होने का नहीं, वस्तुत: धार्मिक होने का प्रारंभ है।

संस्कारों से, शिक्षण से, विचारों से मिली आस्तिकता कोई आस्तिकता नहीं है। जो उससे तृप्त है, वह भ्रांति में है। वह विपरीत विचारों में पलता, तो उसका मन विपरीत निर्मित हो सकता था। और फिर वह उससे ही तृप्त हो जाता।
मन पर पड़े संस्कार परिधि की, सतह की घटना है। वह मृत पर्त है। वह उधार और बासी स्थिति है। कोई भी सचमुच आत्मिक जीवन के लिये प्यासा व्यक्ति, उस काल्पनिक जल से अपनी प्यास नहीं बुझा सकता है। ओर इस अर्थ में वह व्यक्ति धन्य-भागी है।
क्योंकि वास्तविक जल को पाने की खोज इसी बेबुझी प्यास से प्रारंभ होती है।

ईश्वर को धन्यवाद दो कि तुम ईश्वर की धारणा से सहमत नहीं हो। क्योंकि यह असहमति ईश्वर के सत्य तक तुम्हें ले जा सकती है।
मैं उस युवक के चेहरे पर एक प्रकाश फैलता देखता हूं। एक शांति और एक आश्वासन उसकी आंखों में आ गया है। जाते समय में उससे कह रहा हूं,

'इतना स्मरण रखना कि नास्तकिता धार्मिक जीवन की शुरुआत है। वह अंत नहीं है। वह पृष्ठभूमि है, पर उस पर ही रुक नहीं जाना है। वह रात्रि है, उसमें ही डूब नहीं जाना है। उसके बाद ही, उससे ही, सुबह का जन्म होता है।'
🪔 ओशो

#कृष्ण #मन #ओशो #बुद्ध

आदत और स्‍वभाव___ ओशोगलत तपस्‍वी सिर्फ आदत बनाता है तप की। ठीक तपस्‍वी स्‍वभाव को खोजता है, आदत नहीं बनाता। हैबिट और नेच...
16/07/2025

आदत और स्‍वभाव___ ओशो

गलत तपस्‍वी सिर्फ आदत बनाता है तप की। ठीक तपस्‍वी स्‍वभाव को खोजता है, आदत नहीं बनाता। हैबिट और नेचर का फर्क समझ लें। हम सब आदतें बनवाते है। हम बच्‍चे को कहते है—क्रोध मत करो, क्रोध की आदत बुरी है। न क्रोध करने की आदत बनाओ। वहन क्रोध करने की आदत तो बना लेता है, लेकिन उससे क्रोध नष्‍ट नहीं होता। क्रोध भीतर चलता रहता है। कामवासना पकड़ती है तो हम कहते है कि ब्रह्मचर्य की आदत बनाओ।

वह आदत बन जाती है। लेकिन कामवासना भीतर सरकती रहती है, वह नीचे की तरफ बहती रहती है। उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। तपस्‍वी खोजता है—स्‍वभाव के सूत्र को, ताओ को, धर्म को। वह क्‍या है जो मेरा स्‍वभाव हे, उसे खोजता है। सब आदतों को हटाकर वह अपने स्‍वभाव को दर्शन करता है। लेकिन आदतों को हटाने का एक ही उपाय है—ध्‍यान मत दो, आदत पर ध्‍यान मत दो।
एक मित्र मेरे पास चार छह दिन पहले मेरे पास आए। उन्‍होंने कहा कि आप कहते है कि बम्‍बई में रहकर, और ध्‍यान हो सकता है। यह सड़क का क्‍या करें, भोंपू का क्‍या करें। ट्रेन जा रही है, सीटी बज रही है, बच्‍चे आस पास शोर मचा रहे है, इसका क्‍या करें?

मैंने कहा—ध्‍यान मत दो।

उन्‍होंने कहा –कैसे ध्‍यान न दें। खोपड़ी पर भोंपू बज रहा है, नीचे कोई हार्न बजाएं जा रहा है, ध्‍यान कैसे न दें।

मैंने कहा—एक प्रयास करो। भोंपू कोई नीचे बजाये जा रहा है, उसे भोंपू बजाने दो। तुम ऐसे बैठे रहो, कोई प्रतिक्रिया मत करो कि भोंपू अच्‍छा है कि भोंपू बुरा है।

कि बजानेवाला दुश्‍मन कि बजानेवाला मित्र हे। कि इसका सिर तोड़ देंगे अगर आगे बजाया। कुछ प्रति क्रिया मत करो। तुम बैठे रहो,सुनते रहो। सिर्फ सुनो। थोड़ी देर में तुम पाओगे कि भोंपू बजता भी हो तो भी तुम्‍हारे लिए बजना बन्‍द हो जाएगा। ऐक्सैप्टैंस इट, स्‍वीकार करो।

जिस आदम को बदलना हो उसे स्‍वीकार कर लो। उससे लड़ों मत। स्‍वीकार कर लो, जिसे हम स्‍वीकार लेते है उस पर ध्‍यान देना बन्‍द हो जाता है। क्‍या आपका पता है किसी स्‍त्री के आप प्रेम में हों उस पर ध्‍यान होता है। फिर विवाह करके उसको पत्‍नी बना लिया, फिर वह स्‍वीकृत हो गयी। फिर ध्‍यान बंद हो जाता है। जिस चीज को हम स्‍वीकार लेते है….

एक कार आपके पास नहीं है वह सड़क पर निकलती है चमकती हुई,ध्‍यान खींचती है। फिर आपको मिल गयी, फिर आप उसमे बैठ गये है। फिर थोड़े दिन में आपको ख्‍याल ही नहीं आता है कि वह कार भी है, चारों तरफ जो ध्‍यान को खींचती थी। वह स्‍वीकार हो गयी।

जो चीज स्‍वीकृत हो जाती है उस पर ध्‍यान बन्‍द हो जाता है। स्‍वीकार कर लो, जो है उसे स्‍वीकार कर लो अपने बुरे से बुरे हिस्‍से को भी स्‍वीकार कर लो। ध्‍यान बन्‍द कर दो, ध्‍यान मत दो। उसको ऊर्जा मिलनी बंद हो जायेगी। वह धीरे-धीरे अपने आप क्षीण होकर सिकुड़ जाएगी,टूट जाएगी। और जो बचेगी ऊर्जा, उसका प्रवाह अपने आप भीतर की तरफ होना शुरू हो जायेगा।

गलत तपस्‍वी उन्‍हीं चीजों पर ध्यान देता है जिन पर भोगी देता है। सही तपस्‍वी….ठीक तप की प्रक्रिया…ध्‍यान का रूपांतरण है। वह उन चीजों पर ध्‍यान देता है। जिन पर न भोगी ध्‍यान देता है, न तथा कथित त्‍यागी ध्‍यान देता है। वह धान को ही बदल देता है। और ध्‍यान हमार हमारे हाथ में है। हम वहीं देते है जहां हम देना चाहते है।

अभी यहां हम बैठे है, आप मुझे सुन रहे है। अभी यहां आग लग जाए मकान में,आप एकदम भूल जाएंगे कि सुन रहे थे, की कोई बोल रहा था, सब भूल जाएंगे। आग पर ध्‍यान दौड़ जाएगा, बहार निकल जाएंगे। भूल ही जाएंगे कि कुछ सुन रहे थे। सुनने का कोई सवाल ही न रह जाएगा। ध्‍यान प्रतिपल बदल सकता है।

सिर्फ नए बिन्‍दु उसको मिलने चाहिए। आग मिल गयी, वह ज्‍यादा जरूरी हे जीवन को बचाने के लिए। आग हो गयी, तो तत्‍काल ध्‍यान वहीं दौड़ जाएगा। आप के भीतर तप की प्रक्रिया में उन नए बिन्‍दुओं और केन्‍द्रों की तलाश करनी है जहां ध्‍यान दौड़ जाए और जहां नए केन्द्र सशक्‍त होने लगें। इसलिए तपस्‍वी कमजोर नहीं होता, शक्‍तिशाली हो जाता है। गलत तपस्‍वी कमजोर हो जाता है। गलत तपस्‍वी कमजोर होकर सोचता हे कह हम जीत लेंगे और भ्रांति पैदा होती है जीतने की

ओशो 🪔 महावीर वाणी—भाग-1

#कृष्ण #मन #ओशो #बुद्ध

चेतना का एक नियम है, जिस चीज की आप बहुत कोशिश करते हैं, उसकी धार मिट जाती है। उसकी धार को पाना मुश्किल है। हम सभी सुख की...
15/07/2025

चेतना का एक नियम है, जिस चीज की आप बहुत कोशिश करते हैं, उसकी धार मिट जाती है। उसकी धार को पाना मुश्किल है। हम सभी सुख की धार को मार लेते हैं। और बड़े मजे की बात है कि दुख में हमारे धार बनी रहती है। हम इतना दुख जो पाते हैं, इसका कारण जगत में बहुत दुख है ऐसा नहीं, हमारे जीने के ढंग में बुनियादी भूल है।

दुख को हम कभी छूना नहीं चाहते, इसलिए उसमें धार बनी रहती है। और सुख को हम छूते-छूते रहते हैं निरंतर, उसकी धार मर जाती है।

आखिर में हम पाते हैं, दुख ही दुख रह गया हाथ में और सुख की कोई खबर नहीं रही। तब हम कहते हैं कि सुख तो मुश्किल से कभी मिला हो मिला हो, सपना मालूम पड़ता है। सारा जीवन दुख है।

लेकिन दुख की यह धार हमारे ही कारण है। इससे उलटा जो कर लेता है, उसका नाम तप है। वह दुख की धार को छूता रहता है और सुख की फिक्र छोड़ देता है।

धीरे-धीरे दुख की धार मिट जाती है और सारा जीवन सुख हो जाता है। जिस चीज को आप छुएंगे, वह मिट जाएगी। जिस चीज को आप मांगेंगे, वह खो जाएगी। जिसके पीछे आप दौड़ेंगे, उसे आप कभी नहीं पा सकेंगे।

इसलिए जीवन गणित नहीं, एक पहेली है। और जो गणित की तरह समझता है, वह मुश्किल में पड़ जाता है।

जो उसे एक रहस्य और एक पहेली की तरह समझता है, वह उसके सार राज को समझ कर जीवन की परम समता को उपलब्ध हो जाता है।

#कृष्ण #ओशो #मन Osho Hindi speech OSHO

 #बातचीत करना, गपशप करना — क्या यह ऊर्जा की बर्बादी नहीं है? क्या यह एक ध्यान-भंग नहीं है?तो किसी भी रूप की ऊर्जा की बर्...
15/07/2025

#बातचीत करना, गपशप करना — क्या यह ऊर्जा की बर्बादी नहीं है? क्या यह एक ध्यान-भंग नहीं है?

तो किसी भी रूप की ऊर्जा की बर्बादी ही ध्यान-भंग है। इसलिए हमें यह खोज करनी चाहिए: क्या ऊर्जा की कोई भी बर्बादी नहीं हो सकती?

आप लोग इस पर गहराई से विचार नहीं करते! क्या हम अपनी ऊर्जा बर्बाद नहीं करते? कितने ही तरीकों से करते हैं, है ना?

और जब आप 'एकाग्र' होना चाहते हैं, तो वह एक तरह का प्रतिरोध बन जाता है। सही है? आप अपने चारों ओर एक दीवार खड़ी कर लेते हैं और कहते हैं, 'मुझे इस पर ध्यानपूर्वक देखना है' — क्या यह ऊर्जा की बर्बादी नहीं है? यह संघर्ष, यह चाह कि हमें एकाग्र होना है, नियंत्रण पाना है, शक्ति प्राप्त करनी है — क्या यह सब ऊर्जा की बर्बादी नहीं है?

किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के पास अपने पद को बनाए रखना — यह भी शक्ति की इच्छा है।

मैंने अभी कुछ दिन पहले एक सुंदर कहानी सुनी। किसी व्यक्ति ने रानी (Queen) से हाथ मिलाया, और उस व्यक्ति के बगल में खड़ी एक महिला ने उससे कहा, जिसने रानी से हाथ मिलाया था, 'क्या मैं आपसे हाथ मिला सकती हूँ?'! (हंसी)

समझ रहे हैं आप?

इन सब बातों को ध्यान से सुनिए और स्वयं जानिए कि आप किसी चीज़ को 'ध्यान-भंग' क्यों कहते हैं। सारे संघर्ष, क्या वे ध्यान-भंग नहीं हैं? आपकी सारी ईर्ष्याएं क्या ध्यान-भंग नहीं हैं? यह सब ऊर्जा की बर्बादी है — ईर्ष्यालु होना, किसी से नफरत करना, किसी से जलन करना।

तो हमारा जीने का ढंग — जैसा हम जी रहे हैं — वही ऊर्जा की बर्बादी है। और अगर हम उस जीने के ढंग को समाप्त कर दें — तो फिर कोई ध्यान-भंग रह ही नहीं जाता। तब आप वास्तव में जी रहे होते हैं।"

— जे. कृष्णमूर्ति
सार्वजनिक प्रवचन 4, मद्रास (चेन्नई), भारत — 6 जनवरी 1985

Osho Hindi speech

 #कृष्ण कहते हैं:"बुद्धिमान वह है जो कर्म के फल से अपना मोह छोड़ देता है और जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।"इस कथन...
15/07/2025

#कृष्ण कहते हैं:
"बुद्धिमान वह है जो कर्म के फल से अपना मोह छोड़ देता है और जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।"

इस कथन को गहराई से समझने की आवश्यकता है।
कृष्ण आपको कर्म छोड़ने को नहीं कहते — वे निष्क्रिय होने को नहीं कहते। वे बस इतना कहते हैं कि कोई भी कार्य फल की अपेक्षा से न किया जाए। यह बात स्वयं कर्म की पवित्रता के लिए कही गई है, ताकि कर्म पूर्ण और सजीव हो सके। इसलिए सारे ज्ञानी, सारे मनीषी यही कहते आए हैं — कर्म करो, लेकिन फल की आकांक्षा से मुक्त होकर।

पर आमतौर पर यदि कोई फल की इच्छा छोड़ दे, तो वह कर्म भी छोड़ देता है। क्योंकि सामान्य मनुष्य जो कुछ भी करता है, किसी उद्देश्य से करता है — रोटी के लिए, पैसा, प्रसिद्धि, पद, सम्मान के लिए। अगर उद्देश्य नहीं रहा, तो करने की प्रेरणा क्यों रहेगी?

"फल" का मतलब है:
"अगर तुम ऐसा करोगे तो यह मिलेगा" — यही फल है।
लेकिन कृष्ण कहते हैं कि मोक्ष भी यदि उद्देश्य बन जाए, तो वह भी बंधन बन जाता है।
क्योंकि "चाह" ही बंधन है।
मोक्ष की चाह भी चाह ही है। तो सवाल उठता है:
कर्म कैसे करें बिना फल की कामना के?

हमारे जीवन में दो तरह के कर्म होते हैं:

1. भविष्य की अपेक्षा से किया गया कर्म —
यह आज का कार्य है जो कल की आशा में किया गया है। लेकिन भविष्य तो अनिश्चित है, वह अभी अस्तित्व में नहीं है। और जब हम भविष्य की आशा में जीते हैं, तब आज नहीं जीते। फिर आज अधूरा रह जाता है, और हमारा सारा जीवन बीत जाता है केवल किसी आने वाले कल की प्रतीक्षा में। मृत्यु के समय सबसे बड़ी पीड़ा यह होती है कि अब कोई भविष्य नहीं है।

2. स्वाभाविक, सहज कर्म —
यह वह कर्म है जो आपके भीतर से, आपकी पूर्णता से, आपके आनंद से उपजता है। उदाहरण के लिए, रास्ते में किसी का गिरा हुआ छाता उठाकर बिना किसी उम्मीद के वापस कर देना। न "धन्यवाद" की अपेक्षा, न किसी प्रशंसा की, न फोटो खिंचवाने की। ऐसा कर्म पूर्ण होता है — यह फल नहीं चाहता, यह स्वयं फल है।

अगर कर्म आनंद से, प्रेम से, पूर्णता से किया जाए —
तो उसका कोई बाहर का उद्देश्य नहीं होता।
वह स्वयं ही उपलब्धि है।
वह कर्म 'निष्काम' होता है — यानी "कामना रहित।"
और ऐसा कर्म करने वाला व्यक्ति मुक्त होता है।

जब तुम कर्म से प्रेम करते हो — न कि उसके परिणाम से — तभी वह पूरा होता है।

ऐसा व्यक्ति आज में जीता है। और जो आज में जीए, उसका कल भी नया, ताज़ा और आनंदपूर्ण होगा।
लेकिन जो आज को अधूरा छोड़ता है — "कल कुछ मिलेगा" की आशा में — उसका कल भी अधूरा ही होगा।

कृष्ण कहते हैं:
"फल ईश्वर पर छोड़ दो।"
इसका अर्थ यह नहीं कि ईश्वर कहीं बैठा है फल बाँटने को।
इसका अर्थ है — कर्म को पूरे होश, प्रेम और पूर्णता से करो, और फिर छोड़ दो।
तभी तुम्हारा कार्य पूजा बनता है।

यदि हम हर कार्य को — चाहे वह आलू छीलना हो या कविता लिखना — प्रेम से, जागरूकता से, पूर्णता से करें, और फल की चिंता न करें — तो वही मुक्ति का मार्ग है।
कृष्ण कहते हैं, ऐसा व्यक्ति जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है।

क्योंकि जो इच्छा में जीता है, आशा में जीता है, वह जन्म लेता रहेगा — क्योंकि वह अधूरा है, और भविष्य की लालसा उसे बार-बार जन्म में खींचती है।
लेकिन जो आज को पूरी तरह जी लेता है, वह पूर्ण है — उसे फिर लौटने की आवश्यकता नहीं।

मुक्ति जीवन से नहीं है, कामना से है।
बंधन जीवन नहीं है, इच्छा है।

और जो व्यक्ति आज में जीता है — उसका हर कार्य, हर प्रेम, हर मृत्यु तक — मुक्ति है।
क्योंकि बंधन और मुक्ति कहीं बाहर नहीं, आपके भीतर हैं।
आप जैसा सोचते हैं, वैसा ही संसार बन जाता है।

हम ही अपने जीवन के निर्माता हैं।

ओशो

Osho Hindi speech OSHO

मैंने एक कहानी सुनी है। पेरिस के विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र का जो विभागाध्यक्ष था, जो हेड ऑफ दि डिपार्टमेंट था, उसने...
03/07/2025

मैंने एक कहानी सुनी है। पेरिस के विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र का जो विभागाध्यक्ष था, जो हेड ऑफ दि डिपार्टमेंट था, उसने एक दिन आकर सुबह-सुबह ही अपनी कक्षा में घोषणा की कि मैं दुनिया का सबसे श्रेष्ठतम व्यक्ति हूं!

विद्यार्थी हंसे। झक्की तो वे उसे मानते ही थे। दर्शनशास्त्र का कोई प्रोफेसर और विश्वविद्यालय में झक्की न माना जाए, ऐसा होता ही नहीं। पहली तो बात, दर्शनशास्त्र में झक्की ही उत्सुक होते हैं, ऐसी धारणा है। फिर कोई साधारण झक्की नहीं होगा, जब विभाग का अध्यक्ष हो गया तो असाधारण झक्की होगा। और आज तो हद हो गई। इतने सीधे-सीधे कोई कहता है? लोग छिपा-छिपा कर कहते हैं! इस आदमी ने सीधे ही आकर घोषणा कर दी कि मैं दुनिया का सबसे श्रेष्ठतम व्यक्ति हूं। विद्यार्थी तो सकते में आ गए। लेकिन एक विद्यार्थी ने हिम्मत खड़े होने की की और पूछा कि आप दर्शनशास्त्र के अध्यापक हैं, आप तो जो भी कहते हैं उसके पीछे जरूर कोई तर्क होगा। आपकी इस घोषणा के पीछे क्या तर्क प्रक्रिया है? समझाएं।

तो उस प्रोफेसर ने कहा, मुझे पता था कोई न कोई पूछेगा कि इसके पीछे तर्क की प्रक्रिया क्या है। तो मैं सारी तैयारी करके आया हूं। उसने अपने झोले से दुनिया का नक्शा निकाला, बोर्ड पर टांगा, और कहा, यह दुनिया का नक्शा है। मैं तुमसे पूछता हूं कि दुनिया में सबसे श्रेष्ठ देश कौन सा है?

स्वभावतः सभी फ्रेंच थे; उन्होंने कहा, फ्रांस! इसमें क्या पूछने की बात है? यह तो स्वतः सिद्ध है।

तो उस प्रोफेसर ने कहा, तो बाकी दुनिया छोड़ दें। फ्रांस सबसे श्रेष्ठ देश है, यह सिद्ध हुआ। तुम सब राजी होते हो, हाथ उठा दो। अब इतना ही मुझे सिद्ध करना है कि मैं फ्रांस में सर्वश्रेष्ठ हूं, तो दुनिया में सर्वश्रेष्ठ हो जाऊंगा। और मैं तुमसे यह पूछता हूं कि फ्रांस में सर्वश्रेष्ठ नगर कौन सा है?

तब जरा विद्यार्थी समझे कि अब मामला गड़बड़ हुआ जा रहा है। स्वभावतः वे सभी पेरिस के निवासी थे, उन्होंने कहा, पेरिस। तो प्रोफेसर ने कहा, अब फ्रांस को भी छोड़ दो, अब रहा पेरिस, अब पेरिस में ही निपटारा करना है। और पेरिस में सर्वाधिक श्रेष्ठतम संस्था कौन सी है?

निश्चित ही विश्वविद्यालय! विद्यापीठ! सरस्वती का मंदिर!

और उसने पूछा कि विश्वविद्यालय में सर्वश्रेष्ठ विषय कौन सा है?

दर्शनशास्त्र के विद्यार्थी थे तो सभी ने कहा, दर्शनशास्त्र। तो उसने कहा, अब भी कुछ बाकी बचा है सिद्ध करने को? मैं दर्शनशास्त्र का प्रधान अध्यापक हूं। मैं दुनिया का श्रेष्ठतम व्यक्ति हूं।

ऐसे ही तर्क…मेरा शास्त्र श्रेष्ठ! मेरा सिद्धांत श्रेष्ठ! मेरी जाति श्रेष्ठ! मेरा वर्ण श्रेष्ठ! लेकिन सीधी-सीधी बात क्यों नहीं कहते? सीधी कहो तो अच्छा। बीमारी साफ हो तो इलाज हो सके। बीमारी जब छुप-छुप कर आती है तो इलाज करना मुश्किल हो जाता है। बीमारी जब नयी-नयी शक्लें लेकर आती है तो इलाज करना मुश्किल हो जाता है, निदान ही मुश्किल हो जाता है। इसीलिए सदियां हो गईं और निदान नहीं हो पा रहा है। अगर तुम कहो कि मैं दुनिया का सबसे श्रेष्ठ व्यक्ति हूं, तो पहले तो तुम भी डरोगे, छाती कंपेगी, यह कहें कैसे? और सारे लोग संदेह उठाएंगे।

ओशो

#बुद्ध #ओशो

*एक किसी ने ओशो से दीक्षा ली , संन्यास लिया और सात बरस बाद अचानक एक दिन आकर कहने लगा ---"अब मैँ भय-मुक्त हो गया हूँ* *अब...
03/07/2025

*एक किसी ने ओशो से दीक्षा ली , संन्यास लिया और सात बरस बाद अचानक एक दिन आकर कहने लगा ---"अब मैँ भय-मुक्त हो गया हूँ*
*अब बता सकता हूँ कि मैं सात बरस पहले जब अहमदाबाद आया था , संन्यास लेने के लिए नही आया था , आपको कत्ल करने के लिए आया था ..."*

ओशो मुस्कुराए ,
मुँह से निकला ---एक बार फिर ?

वह व्यक्ति समझा नही ,
कहने लगा ---"मेरे पास रिवाल्वर था । उस दिन की मीटिंग में लोगों की हाजिरी इतनी ज्यदा थी कि मुझे हाल में बैठने की जगह नही मिली, इसलिए प्रबंधक लोगों ने मंच पर ही बैठ जाने की मेरे लिए जगह बना दी, जहां आप बैठे थे .."

ओशो ने कहा ---"फिर इस तरह का मौक़ा तूने क्यों जाने दिया ? "

वह कहने लगा ---"मैंने पहले कभी आपको सुना नही था। उस दिन आप जब बोले, मैँ सारा समय आपको सुनता रहा। मन बदल कर रह गया आपको क़त्ल करने की जगह मैंने आपसे दीक्षा ले ली ..."

ओशो हंसकर एक लंबा सिलसिला देखते रहे। जान गए कि आज से *सात सौ साल* पहले उनके जिस मुरीद ने उन्हे ज़हर दिया था, मौत का कारण बना था, यह वही आदमी था ..

ओशो कुछ देर ख़ामोश एक वूक्ष के नीचे खड़े रहे, उस वूक्ष की फूल पत्तियाँ हंस दीं --

"और शायद किसी गुरु-पीर को यह शर्फ़ हासिल नहीं हुआ कि कोई उसे क़त्ल करने आया हो और दीक्षा लेकर पैरों में बैठ गया हो ..."🙏🏼

-अमृता प्रीतम
(स्मरण गाथा किताब में से

#बुद्ध #ओशो

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