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सोलर पैनल गर्मी से नहीं बल्कि सूरज की रोशनी से बिजली पैदा करते हैं। जब सूरज की रोशनी के कण, जिन्हें फोटॉन्स कहा जाता है,...
31/05/2026

सोलर पैनल गर्मी से नहीं बल्कि सूरज की रोशनी से बिजली पैदा करते हैं। जब सूरज की रोशनी के कण, जिन्हें फोटॉन्स कहा जाता है, सोलर पैनल के सिलिकॉन सेल्स से टकराते हैं, तो वे सेल्स में मौजूद इलेक्ट्रॉन्स को गति देते हैं और इसी प्रक्रिया से बिजली पैदा होती है, जिसे विज्ञान में फोटोवोल्टिक इफेक्ट कहा जाता है। चूंकि सोलर पैनल एक इलेक्ट्रॉनिक और सेमीकंडक्टर उपकरण हैं, इसलिए वे ठंडे, साफ और धूप वाले मौसम में सबसे ज्यादा कुशलता से काम करते हैं, क्योंकि कम तापमान में उनके अंदरूनी कंपोनेंट्स का वोल्टेज आउटपुट बढ़ जाता है। इसके विपरीत, जब तापमान 25°C से ऊपर जाने लगता है, तो अत्यधिक गर्मी के कारण पैनल के अंदर के इलेक्ट्रॉन्स बहुत ज्यादा उत्तेजित होकर अव्यवस्थित गति करने लगते हैं, जिससे पैनल का वोल्टेज गिर जाता है और उसकी बिजली बनाने की क्षमता प्रति डिग्री सेल्सियस लगभग 0.3% से 0.5% तक कम हो जाती है, जिसे तकनीकी भाषा में 'टेंपरेचर कोइफिशिएंट' कहते हैं। यही कारण है कि सर्दियों के साफ धूप वाले दिन सोलर पैनलों के लिए सबसे आदर्श होते हैं, जबकि गर्मियों की अत्यधिक तपिश उनकी कार्यक्षमता को थोड़ा घटा देती है।

पटना के प्रसिद्ध शिक्षक खान सर ने नेताओं की चुनावी राजनीति पर तीखा तंज कसते हुए बिल्कुल सच कहा है कि केंद्र सरकार अगर चा...
31/05/2026

पटना के प्रसिद्ध शिक्षक खान सर ने नेताओं की चुनावी राजनीति पर तीखा तंज कसते हुए बिल्कुल सच कहा है कि केंद्र सरकार अगर चाहे तो जैसे वह अन्य बड़े फैसले एक झटके में लेती है, वैसे ही कानून बनाकर देश में गोहत्या पर पूरी तरह से पूर्ण प्रतिबंध लगा सकती है, लेकिन ऐसा करने से राजनीतिक दलों का चुनावी "सिलेबस" खत्म हो जाएगा और वे अगले चुनाव में शिक्षा, रोजगार, विकास या महंगाई जैसे बुनियादी मुद्दों पर बात करने के लिए मजबूर हो जाएंगे। वर्तमान प्रशासनिक और कानूनी स्थिति को देखें तो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48 (Article 48) के तहत पशुपालन को बढ़ावा देने और दुधारू पशुओं के वध पर रोक लगाने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों को सौंपी गई है, जिसके कारण उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात जैसे अधिकांश राज्यों में तो गोहत्या पर 7 से 10 साल तक की सख्त सजा के साथ पूर्ण प्रतिबंध लागू है, जबकि केरल, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों में इसके नियम काफी लचीले हैं या प्रतिबंध नहीं हैं। इसके साथ ही भारत सरकार की आधिकारिक नीति के अनुसार देश से वास्तविक गाय के मांस (Beef) के निर्यात पर पूरी तरह कानूनी रोक है, और वैश्विक स्तर पर जो मांस बड़े पैमाने पर एक्सपोर्ट किया जाता है वह मुख्य रूप से 'बफेलो मीट' (भैंस का मांस या कैराबीफ) होता है। नेताओं द्वारा इस संवेदनशील मुद्दे को हमेशा जिंदा रखने और शिक्षा की तुलना में बीफ व मीट उद्योग पर कथित तौर पर कम जीएसटी (GST) होने जैसी कड़वी सच्चाइयों को उजागर करता खान सर का यह बयान सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है, जिसे लोग देश की चुनावी राजनीति और जनता का ध्यान भटकाने वाले एजेंडे का एक सटीक विश्लेषण मानकर काफी पसंद कर रहे हैं।

समुद्र के किनारे श्रृंखला में रखे गए चार पैरों वाले ये विशालकाय कंक्रीट के ढांचे 'टेट्रापॉड' कहलाते हैं, जिनका प्राथमिक ...
31/05/2026

समुद्र के किनारे श्रृंखला में रखे गए चार पैरों वाले ये विशालकाय कंक्रीट के ढांचे 'टेट्रापॉड' कहलाते हैं, जिनका प्राथमिक कार्य समुद्र की अत्यधिक शक्तिशाली और विनाशकारी लहरों की गतिज ऊर्जा को अवशोषित व बिखेरकर तटीय रेखा को गंभीर कटाव से पूरी तरह सुरक्षित रखना है। ग्रीक भाषा में 'चार पैरों वाला' अर्थ रखने वाले इस टेट्रापॉड का आविष्कार सर्वप्रथम वर्ष 1950 में फ्रांस की 'सोग्रेह' कंपनी द्वारा किया गया था, और इनकी सबसे बड़ी खासियत इनका विशेष टेट्राहेड्रल आकार होता है जिसकी वजह से जब इन्हें एक के ऊपर एक क्रमबद्ध तरीके से डाला जाता है, तो ये आपस में एक बेहद मजबूत 'इंटरलॉकिंग' नेटवर्क बना लेते हैं। सपाट कंक्रीट की दीवारों के विपरीत, जो लहरों से सीधे टकराकर उनके पूरे दबाव के कारण समय के साथ टूट सकती हैं, टेट्रापॉड अपने बीच खाली जगह (पोरस संरचना) छोड़ते हैं जिससे टकराने के बाद लहरों का पानी आपस में और इनके चारों तरफ बंट जाता है, जिससे लहरों की मारक क्षमता और रफ्तार तुरंत बेहद कम हो जाती है। कंक्रीट के विशेष मिश्रण से तैयार किए गए इन ढांचों का वजन सामान्यतः 1 टन से लेकर 50 टन या उससे भी अधिक हो सकता है और यही अत्यधिक भारी वजन इन्हें समुद्र के भयंकर तूफानों तथा ऊंची लहरों के बीच भी अपनी जगह पर मजबूती से अडिग रखता है। बिना किसी विशेष रखरखाव के लगभग 70 से 100 वर्षों तक समुद्र के अत्यधिक खारे और संक्षारक पानी को झेलने की अद्भुत क्षमता रखने वाले ये टेट्रापॉड आज मुंबई के मरीन ड्राइव सहित दुनिया भर के महत्वपूर्ण तटीय शहरों और बंदरगाहों को समुद्री आपदाओं से बचाने में आधुनिक सिविल इंजीनियरिंग के सबसे भरोसेमंद और अचूक सुरक्षा कवच साबित हुए हैं।

समुद्र में प्लास्टिक कचरे का इतना विशाल क्षेत्र मौजूद है कि उसका आकार लगभग आधे भारत जितना माना जाता है। इस क्षेत्र को ग्...
31/05/2026

समुद्र में प्लास्टिक कचरे का इतना विशाल क्षेत्र मौजूद है कि उसका आकार लगभग आधे भारत जितना माना जाता है। इस क्षेत्र को ग्रेट पैसिफिक गार्बेज पैच कहा जाता है, जो प्रशांत महासागर के उत्तरी भाग में स्थित है। इसका अनुमानित क्षेत्रफल लगभग 16 लाख वर्ग किलोमीटर है, जो कई देशों से भी बड़ा है।

वैज्ञानिकों के अनुसार इस क्षेत्र में करीब 1.8 ट्रिलियन (1.8 लाख करोड़) प्लास्टिक के टुकड़े मौजूद हैं। हालांकि यह कोई ठोस तैरता हुआ प्लास्टिक का द्वीप नहीं है, बल्कि समुद्री धाराओं के कारण लाखों-करोड़ों प्लास्टिक के छोटे-बड़े टुकड़े एक विशाल क्षेत्र में फैले हुए हैं। इनमें से अधिकांश बहुत छोटे कण होते हैं, जिन्हें सूक्ष्म प्लास्टिक कहा जाता है।

यह प्लास्टिक समुद्री जीवों के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। कई मछलियां, कछुए, समुद्री पक्षी और अन्य जीव इसे भोजन समझकर निगल लेते हैं, जिससे उनकी मृत्यु तक हो सकती है। यह कचरा समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ अंततः खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मनुष्यों तक भी पहुंच सकता है।

ग्रेट पैसिफिक गार्बेज पैच आज दुनिया में प्लास्टिक प्रदूषण की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक माना जाता है और यह हमें याद दिलाता है कि प्लास्टिक का जिम्मेदारी से उपयोग और उसका सही निपटान कितना आवश्यक है।

हाई-वोल्टेज बिजली के संचरण टावरों में 4 लाख वोल्ट (400 kV) या उससे भी अधिक की अत्यधिक शक्तिशाली बिजली प्रवाहित होती है, ...
30/05/2026

हाई-वोल्टेज बिजली के संचरण टावरों में 4 लाख वोल्ट (400 kV) या उससे भी अधिक की अत्यधिक शक्तिशाली बिजली प्रवाहित होती है, जिसके कारण इन तारों को बिना छुए भी केवल उनके पास जाने मात्र से ही जानलेवा करंट लग सकता है। इतनी विशाल मात्रा में वोल्टेज होने पर तारों के आस-पास का विद्युत क्षेत्र इतना मजबूत हो जाता है कि वह अपने चारों ओर मौजूद हवा के कणों को आवेशित कर देता है, जिससे सामान्य रूप से कुचालक रहने वाली हवा अचानक बिजली की सुचालक बन जाती है। इस वैज्ञानिक घटना को 'इलेक्ट्रिक आर्किंग' या 'फ्लैशओवर' कहा जाता है, जिसमें बिजली नीली-सफेद तीव्र चिंगारी के रूप में हवा को चीरते हुए कई फीट की दूरी से ही किसी भी नजदीकी वस्तु या इंसान पर छलांग लगा सकती है। यह खतरा विशेष रूप से बारिश, घने कोहरे, उच्च आर्द्रता (उमस) या हवा में धूल-प्रदूषण होने पर कई गुना बढ़ जाता है क्योंकि नमी और हवा के कण करंट को और लंबी दूरी तक आसानी से सफर करने का रास्ता देते हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के अनुसार इन 4 लाख वोल्ट वाले टावरों से हमेशा कम से कम 16 फीट (लगभग 5 मीटर) की सुरक्षित दूरी बनाए रखने की सख्त हिदायत दी जाती है, क्योंकि इनके अत्यधिक निकट जाने पर इंसान बिना तारों को स्पर्श किए भी इस अदृश्य और घातक ऊर्जा की चपेट में आकर अपनी जान गंवा सकता है।

शुरुआती दौर में वाहनों में पेट्रोल और डीजल भरने की प्रक्रिया आज की तरह डिजिटल या ऑटोमैटिक नहीं थी। 20वीं सदी की शुरुआत म...
30/05/2026

शुरुआती दौर में वाहनों में पेट्रोल और डीजल भरने की प्रक्रिया आज की तरह डिजिटल या ऑटोमैटिक नहीं थी। 20वीं सदी की शुरुआत में, विशेष रूप से 1910 और 1920 के दशकों में, दुनिया भर के पेट्रोल पंपों पर 'विजिबल गैस पंप' का इस्तेमाल किया जाता था, जिसके सबसे ऊपर 5 से 10 गैलन की क्षमता वाला एक पारदर्शी कांच का बेलनाकार जार या कंटेनर लगा होता था। पेट्रोल पंप कर्मचारी सबसे पहले एक मैनुअल हैंडल या लीवर को अपने हाथों से घुमाकर जमीन के नीचे बने मुख्य टैंक से ईंधन को ऊपर खींचता था, जिससे वह तेल कांच के उस मापक बर्तन में भर जाता था जिस पर सटीक मात्रा दर्शाने के लिए लीटर या गैलन के निशान छपे होते थे। ग्राहक अपनी आँखों से देखकर तेल की सही मात्रा और उसकी शुद्धता सुनिश्चित कर लेते थे, जिसके बाद कर्मचारी नली का वाल्व खोल देता था और कांच के बर्तन में भरा ईंधन गुरुत्वाकर्षण के दबाव से सीधे गाड़ी की टंकी में चला जाता था; इसके अलावा ग्रामीण या छोटे क्षेत्रों में मशीन न होने पर लोहे, पीतल या एल्युमिनियम के प्रमाणित मापक बर्तनों में तेल निकालकर कीप की मदद से हाथों से सीधे गाड़ियों में उड़ेल दिया जाता था।

जापान की बुलेट ट्रेन, जिसे 'शिनकानसेन' कहा जाता है, का सुरक्षा रिकॉर्ड दुनिया के रेल इतिहास में सबसे बेमिसाल और अचूक मान...
30/05/2026

जापान की बुलेट ट्रेन, जिसे 'शिनकानसेन' कहा जाता है, का सुरक्षा रिकॉर्ड दुनिया के रेल इतिहास में सबसे बेमिसाल और अचूक माना जाता है। साल 1964 में अपनी शुरुआत से लेकर अब तक, यानी पिछले 60 से अधिक वर्षों के सफर में इस नेटवर्क ने 10 अरब से ज्यादा यात्रियों को बेहद सुरक्षित तरीके से उनकी मंजिल तक पहुँचाया है, लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस पूरे इतिहास में आज तक किसी भी ट्रेन क्रैश, आमने-सामने की टक्कर, पटरी से उतरने या किसी भी प्रकार की तकनीकी खराबी के कारण एक भी यात्री की मौत नहीं हुई है। इस असाधारण सफलता के पीछे जापान की अत्याधुनिक इंजीनियरिंग और कड़े सुरक्षा नियम हैं, जिसमें बुलेट ट्रेनों के लिए पूरी तरह से अलग और समर्पित ट्रैक्स बनाए गए हैं ताकि किसी अन्य सामान्य या मालगाड़ी से टक्कर की गुंजाइश ही न रहे; साथ ही इसमें बिना सिग्नल वाले 'ऑटोमैटिक ट्रेन कंट्रोल' (ATC) का इस्तेमाल होता है जो आगे चल रही ट्रेन की दूरी के हिसाब से रफ्तार को खुद-ब-खुद नियंत्रित कर लेता है। इसके अलावा, जापान जैसे अत्यधिक भूकंप-संवेदनशील देश में 'UrEDAS' (अर्जेंट अर्थक्वेक डिटेक्शन एंड अलार्म सिस्टम) तकनीक तैनात है, जो भूकंप का पहला हल्का झटका महसूस होते ही बिजली की सप्लाई को पूरी तरह काट देती है और ट्रेनों में ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेक लगा देती है; यही कारण है कि साल 2004 और 2022 के भीषण भूकंपों के दौरान ट्रेनें पटरी से उतरने के बावजूद बेहतरीन सुरक्षा कवच की वजह से एक भी यात्री को खरोंच तक नहीं आई और यह तकनीक आज भी पूरी दुनिया के लिए सुरक्षा और समय की पाबंदी का सबसे बड़ा वैश्विक मानक बनी हुई है।

अरविंद केजरीवाल ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने और देश में सकारात्मक माहौल पैदा करने के लिए करेंसी नोटों पर...
29/05/2026

अरविंद केजरीवाल ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने और देश में सकारात्मक माहौल पैदा करने के लिए करेंसी नोटों पर भगवान गणेश और माता लक्ष्मी जी की तस्वीर होनी चाहिए। उनका मानना है कि इससे देश में सुख-समृद्धि और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा।

MRI (मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग) मशीन से जुड़ा यह वैज्ञानिक तथ्य पूरी तरह सच है कि इसके अंदर मौजूद सुपरकंडक्टिंग चुंबक प...
29/05/2026

MRI (मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग) मशीन से जुड़ा यह वैज्ञानिक तथ्य पूरी तरह सच है कि इसके अंदर मौजूद सुपरकंडक्टिंग चुंबक पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से लगभग 30,000 से 60,000 गुना अधिक शक्तिशाली होता है और सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह चुंबक कभी भी बंद नहीं होता है, यानी जब मशीन इस्तेमाल में नहीं होती या अस्पताल की लाइट बंद होती है, तब भी इसका खतरनाक चुंबकीय क्षेत्र 24 घंटे पूरी ताकत से सक्रिय रहता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इस चुंबक को अत्यधिक ठंडी लिक्विड हीलियम गैस (-269°C) के अंदर डुबोकर रखा जाता है, जिससे इसमें बिना किसी बाहरी बिजली के भी लगातार करंट दौड़ता रहता है और यदि कोई अज्ञानता में लोहे, स्टील या अन्य चुंबकीय धातु से बनी वस्तु जैसे कि चाबी, कैंची, व्हीलचेयर या ऑक्सीजन सिलेंडर इस कमरे के भीतर ले जाता है, तो मशीन का भयंकर खिंचाव उस वस्तु को 'मिसाइल इफेक्ट' के कारण बंदूक की गोली की रफ्तार (65 किमी/घंटे से भी तेज) से अपनी ओर खींच लेता है, जिससे मशीन के पास खड़े व्यक्ति की जान जाने का गंभीर खतरा पैदा हो जाता है और इसी वजह से मरीजों के शरीर पर मौजूद हर प्रकार के धातु के गहने, पेसमेकर या इम्प्लांट की जांच करने के बाद ही उन्हें इस बेहद सुरक्षित लेकिन संवेदनशील रूम में प्रवेश दिया जाता है।

पापुआ न्यू गिनी दुनिया का सबसे समृद्ध भाषाई विविधता वाला देश है, जहाँ मात्र 1 करोड़ की छोटी सी आबादी होने के बावजूद आधिक...
29/05/2026

पापुआ न्यू गिनी दुनिया का सबसे समृद्ध भाषाई विविधता वाला देश है, जहाँ मात्र 1 करोड़ की छोटी सी आबादी होने के बावजूद आधिकारिक तौर पर 840 से अधिक जीवित स्थानीय भाषाएँ बोली और समझी जाती हैं, जो पूरी दुनिया की कुल भाषाओं का लगभग 12 प्रतिशत है। वैश्विक भाषा डेटाबेस 'एथनोलॉग' के अनुसार इस सूची में दूसरे स्थान पर इंडोनेशिया (700+ भाषाएँ) और तीसरे स्थान पर भारत (450+ भाषाएँ) आता है। पापुआ न्यू गिनी में इतनी भारी संख्या में भाषाओं के विकसित होने का मुख्य कारण यहाँ की बेहद कठिन भौगोलिक बनावट है, जहाँ ऊंचे और दुर्गम पहाड़, गहरी घाटियाँ, दलदल और घने उष्णकटिबंधीय वर्षावन मौजूद हैं; इस भौगोलिक अलगाव के कारण यहाँ के विभिन्न कबीले और समुदाय सदियों तक एक-दूसरे से पूरी तरह कटे रहे और उन्होंने अपनी स्वतंत्र भाषाएँ व संस्कृतियाँ विकसित कर लीं। इसके अलावा, यहाँ के प्राचीन इतिहास (लगभग 50,000 साल पुरानी इंसानी बस्तियाँ) और कभी भी कोई एक बड़ा केंद्रीय साम्राज्य न होने की वजह से किसी एक भाषा का प्रभुत्व नहीं हो पाया। यद्यपि यहाँ सैकड़ों स्थानीय भाषाएँ हैं, फिर भी देश के प्रशासनिक कामकाज और विभिन्न समुदायों के बीच आपसी संपर्क के लिए मुख्य रूप से चार आधिकारिक भाषाओं—अंग्रेजी, टॉक पिसिन, हिरी मोटू और पापुआ न्यू गिनी सांकेतिक भाषा का उपयोग किया जाता है, जिनमें से 'टॉक पिसिन' यहाँ की सबसे लोकप्रिय और सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली संपर्क भाषा है।

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