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Welcome to The Jats! This page is dedicated to the proud heritage and culture of the Jat community. We share stories, photos, and videos that showcase our history, traditions, and achievements. Join us in celebrating our community's spirit and unity!"

23/06/2026

भारत में एक तो पहले ही इतना गपोड़ इतिहास भरा पड़ा था, हर किताब में मनोहर कहानियाँ पढ़ने को मिलती है अब ये AI और आ गया जिस से हर दिन एक नया योद्धा पैदा किया जा रहा है लेकिन मजे की बात ये भी है की लोग सच भी मान रहे है। सोचो जिस जमाने में इंटरनेट नहीं था तो क्या-क्या गप लिखे गए थे।😁
खैर! हमें क्या लेना।

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मामा भांजी ❓❓❓❓ 😡
23/06/2026

मामा भांजी ❓❓❓❓ 😡

बाड़मेर राजस्थान से एक अजीब मामला सामने आया है ये दोनों लोग रिश्ते में मामा-भांजी बताये जा रहे है।😭

दो दिन से संघी स्लीपर सेल ने जाट आरक्षण आंदोलन भरतपुर को लेकर माहौल बना रखा है की जाट तो राजा है इनको आरक्षण क्यों चाहिए...
23/06/2026

दो दिन से संघी स्लीपर सेल ने जाट आरक्षण आंदोलन भरतपुर को लेकर माहौल बना रखा है की जाट तो राजा है इनको आरक्षण क्यों चाहिए और आरक्षण मिलने से क्या हो जाएगा ?
नीचे राजस्थान पशु चिकित्सक एग्जाम का रिजल्ट देखिए और सोचिए ज़्यादा लिखने की जरूरत नहीं की आरक्षण से क्या हो जाएगा ?
यदि आरक्षण से कुछ नहीं होता तो रातों रात २% लोगो को १०% आरक्षण दे दिया गया और वो लोग आज सिस्टम का हिस्सा बन आपको हांक रहे है! वो भी बिना मेरिट के।
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ठीक किया समय पर निकल लिया, जनता का शुक्र करना चाहिए इसको कि इज्जत से जाने दिया। ऐसे लोग चुनाव में जाट बनकर वोटो की भीख म...
23/06/2026

ठीक किया समय पर निकल लिया, जनता का शुक्र करना चाहिए इसको कि इज्जत से जाने दिया।
ऐसे लोग चुनाव में जाट बनकर वोटो की भीख मांगने आयेंगे तब याद रखना आम जाट को मिलने वाले हक से समस्या है इनको, ये लोग आम जाटों से नफ़रत करते है।

22/06/2026

Jat Reservation movement ✊🏻

22/06/2026

आज भरतपुर का जाट अपने स्वाभिमान की लड़ाई लड़ रहा है जब आर्थिक आधार पर बामन बनिया को आरक्षण दे सकते है तो जाटों को आरक्षण देने से क्या दिक्कत हो रही है ये प्रधानमंत्री को बताना चाहिए: सांसद हनुमान बेनीवाल
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22/06/2026

जाट आरक्षण आंदोलन
#भरतपुर

भरतपुर राजस्थान 📍
22/06/2026

भरतपुर राजस्थान 📍

21/06/2026

गोदी मीडिया की नजर में 😭
किसान आंदोलन करें तो खालिस्तानी
पहलवान हक के लिए लड़े तो जातिवादी
बेगुनाहों मुसलमानों की लिंचिंग राष्ट्रवाद
बागपत में वरुण लुहारी का मर्डर जायज
जाट आरक्षण मांगे तो उपद्रवी

और दूसरी तरफ़ अवैध हथियार लहरा कर राज्य के विरुद्ध संगीन अपराध करने वाला बिहार का तिवारी शहीद कहलायेगा क्यों की वो जाति विशेष से था!
भेंचो जूता कहाँ है मेरा😡

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21/06/2026

भारत एक बहु-जातीय (Multi-Ethnic) देश है। यहाँ विभिन्न एथनिक समूह समय-समय पर आते रहे और अंततः इसी भूमि का हिस्सा बनकर रह गए। यही कारण है कि इस देश पर किसी एकात्मवादी सांस्कृतिक मॉडल को आरोपित करने का कोई भी प्रयास कभी पूर्णतः सफल नहीं हो सकता।

"हिन्दू" के नाम पर देश में प्रचलित असंख्य छोटे-छोटे धर्मों, मतों, सम्प्रदायों और सांस्कृतिक परम्पराओं की पृथक पहचान को समाप्त कर उन्हें एक सामूहिक नाम दे दिया गया।

भारत इस दृष्टि से एक विशिष्ट सभ्यता है कि यहाँ की बहुसंख्यक जनसंख्या ऐतिहासिक रूप से कभी किसी एक संगठित धर्म का हिस्सा नहीं रही। भारत जैसी बहुलतावादी सांस्कृतिक संरचना वाले देश में कोई एक संगठित धार्मिक व्यवस्था समस्त समाज का धर्म हो भी नहीं सकती थी। जिसे आज "हिन्दू धर्म" कहा जाता है, वह स्वयं किसी एकीकृत और केंद्रीकृत धार्मिक व्यवस्था के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि शंकराचार्यों अथवा अन्य धार्मिक प्राधिकारियों के आदेशों का देश की अधिसंख्य जनता के जीवन पर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ता।

हिन्दू धर्म के भीतर स्वयं इस बात पर सर्वसम्मति नहीं है कि वह एकेश्वरवादी है अथवा बहुदेववादी; मूर्तिपूजा वैध है अथवा अवैध; विवाह अविच्छेद्य संस्कार है अथवा एक सामाजिक अनुबंध। तलाक के प्रश्न पर भी शास्त्रीय मतों और व्यवहारिक जीवन के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। हिन्दू विवाह अधिनियम से पूर्व तथाकथित हिन्दू धर्म में तलाक का कोई सर्वमान्य प्रावधान नहीं था, जबकि अनेक गैर-द्विज समुदायों में तलाक सामाजिक रूप से स्वीकृत और सामान्य प्रथा थी।

वास्तव में "हिन्दू" के नाम पर देश में विद्यमान असंख्य स्थानीय धर्मों, सम्प्रदायों और सांस्कृतिक परम्पराओं की विशिष्ट पहचान को एक व्यापक श्रेणी में समाहित कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप ब्राह्मण धर्म की पहचान ही हिन्दू धर्म की पहचान के रूप में स्थापित हो गई। इस प्रकार हिन्दू धर्म के नाम पर ब्राह्मण धर्म देश की विशाल जनसंख्या का वैचारिक नियंता बन बैठा।

चूँकि "हिन्दू" की पहचान देश की अधिसंख्य जनता पर आरोपित की गई है, इसलिए यह निर्धारित कर पाना अत्यंत कठिन हो जाता है कि वास्तव में हिन्दू कौन है। यही कारण है कि हिन्दू की परिभाषा प्रायः सकारात्मक रूप में नहीं, बल्कि नकारात्मक रूप में दी जाती है—अर्थात् जो अमुक-अमुक धर्मों को नहीं मानते, वे सब हिन्दू हैं। इसी कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत की बहुलतावादी सांस्कृतिक संरचना को समाप्त कर एकात्मवादी सांस्कृतिक मॉडल स्थापित करना चाहता है, जिससे ब्राह्मणीय वर्चस्व स्थायी रूप से बना रहे।

यदि जाटों की बात करें, तो जाट मूलतः एक एथनिक समुदाय हैं। पिछले अनेक दशकों से उनका धार्मिककरण कर उन्हें हिन्दू पहचान के अंतर्गत समाहित करने के प्रयास किए जाते रहे हैं। इस प्रक्रिया में वैष्णव मत, आर्य समाज तथा अन्य हिन्दू सुधारवादी धाराएँ आंशिक रूप से सफल भी हुईं। इसके बावजूद जाट समुदाय ने अपनी पारम्परिक कबायली मान्यताओं, विशेषकर जठेरा जैसी सांस्कृतिक-धार्मिक परम्पराओं, को पूर्णतः नहीं छोड़ा। इसी प्रकार वे ऐतिहासिक रूप से स्वयं को वर्णव्यवस्था का अभिन्न अंग भी नहीं मानते रहे।

किन्तु भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा व्यापक हिन्दुत्ववादी विमर्श के प्रभाव में जाटों को बार-बार हिन्दू वर्णव्यवस्था का हिस्सा सिद्ध करने का प्रयास किया गया। सुब्रमण्यम स्वामी जैसे अनेक हिन्दुत्ववादी विचारकों द्वारा राजनीतिक विमर्श में जाटों को बीच में लाकर उन्हें शूद्र घोषित करने के प्रयास इसी मानसिकता का उदाहरण हैं।

चाहे 2016 का जाट आरक्षण आन्दोलन रहा हो अथवा किसान आन्दोलन, विभिन्न वैचारिक धाराओं से जुड़े अनेक हिन्दू समूहों द्वारा जाटों के विरुद्ध संगठित प्रचार अभियान चलाए गए। उन्हें खालिस्तानी कहा गया, राष्ट्रविरोधी कहा गया, और न जाने किन-किन आरोपों से नवाज़ा गया। भारतीय सेना में दस प्रतिशत से अधिक योगदान देने वाले समुदाय से भी बार-बार देशभक्ति के प्रमाण माँगे गए।

महिला पहलवान आन्दोलन के दौरान भी जाट समुदाय की महिलाओं के विरुद्ध व्यापक स्तर पर अपमानजनक टिप्पणियाँ की गईं। यह केवल दक्षिणपंथी हिन्दुओं तक सीमित नहीं था; अनेक वामपंथी, दलित चिंतक तथा स्वयं को मध्यस्थ या उदारवादी बताने वाले समूह भी इसमें सम्मिलित दिखाई दिए। कई अवसरों पर फ़ेक न्यूज़ और दुष्प्रचार का भी सहारा लिया गया तथा मीडिया के एक वर्ग ने इन प्रायोजित प्रोपेगेंडा को प्रसारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसके अतिरिक्त जाट समुदाय की पृथक एथनिक पहचान को कमजोर करने के उद्देश्य से जाटों के क्षेत्र में ICM जैसे विचारों को भी झूठ, भय और प्रायोजित तरीके से बढ़ावा दिया जा रहा है, जहाँ अनेक बार ऐतिहासिक तथ्यों की अपेक्षा वैचारिक आग्रहों और प्रायोजित आख्यानों को प्राथमिकता दी जाती है। उद्देश्य स्पष्ट है—जाटों की विशिष्ट और स्वतंत्र पहचान को समाप्त कर उन्हें एक व्यापक धार्मिक-सांस्कृतिक ढाँचे में विलीन कर देना।

ऐसी स्थिति में कौन-सा स्वाभिमानी समुदाय उस व्यवस्था का हिस्सा बने रहना चाहेगा, जो दिन-रात उसकी सामुदायिक पहचान, उसके इतिहास, उसकी परम्पराओं और उसके पूर्वजों को बदनाम करने का प्रयास करती हो? इसी कारण हमने यह घोषणा की कि हम जाट हिन्दू नहीं हैं। किन्तु इसका यह अर्थ भी नहीं है कि हम किसी अन्य हिन्दू पंथ, किसी बाहरी धर्म अथवा किसी परायी सभ्यता द्वारा निर्मित व्यवस्था का अंग बन जाएँ।

इसी वैचारिक आधार पर हमने अपने नवीन जाट धर्म — "DIA" — की घोषणा की।

आज कुछ समय पूर्व विभिन्न क्षेत्रों और सभी सामाजिक वर्गों के जाटों ने सामूहिक रूप से यह निर्णय लिया कि वे जाट एथनिक समुदाय को हिन्दू धर्म के प्रभाव और नियंत्रण से मुक्त करेंगे। साथ ही यह भी घोषित किया गया कि अब से जाट समुदाय—

१. अपनी पहचान स्वयं निर्धारित करेगा।
२. अपनी नियति स्वयं निर्धारित करेगा।
३. अपनी नैतिकता स्वयं निर्धारित करेगा।
४. अपनी विधि-संहिता स्वयं निर्धारित करेगा।
५. अपनी परम्पराएँ स्वयं निर्धारित करेगा।
६. अपनी मर्यादाएँ स्वयं निर्धारित करेगा।
७. अपनी वर्जनाएँ स्वयं निर्धारित करेगा।
८. अपना खान-पान स्वयं निर्धारित करेगा।
९. अपना परिधान और फैशन स्वयं निर्धारित करेगा।
१०. और उपर्युक्त सभी से बढ़कर, अपना आराध्य स्वयं निर्धारित करेगा।

हाँ, हमने उसी दिन ब्राह्मण शब्दकोष को त्याग दिया।

हमने अपना पृथक कैलेंडर तैयार किया।

हमने हिन्दू पर्सनल कोड को भी पूर्ण रूप से त्याग दिया है।

हमने अपना पृथक कॉज़्मॉलजी, थियॉलजी, मॅरैलिटी, लॉ, राइट्स ऑफ़ पॅसिज, लिटर्जी, वर्शिप, स्पिरिचुअलिटी, फ़ेस्टिवल, फ़ास्टिंग, सॅबथ, टैबू, एस्कटॉलजी, इक्लीज़ियॉलजी, इत्यादि विकसित किए हैं।

हमने अपना पृथक आर्ट्स और क्राफ़्ट्स, पृथक पवित्र चिह्न, आदि विकसित किए हैं।

चूँकि हमारा मानना है कि इंसान के जीवन का उद्देश्य मात्र "दो जून की रोटी और एक लंगोटी" नहीं है। जीवन का उद्देश्य सभ्यता के सभी पहलुओं के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भागीदारी निभाना है और अन्य मानव समुदायों के साथ प्रतिस्पर्धा करना है।

"योग्यता की उत्तरजीविता" की माँग है कि या तो कड़ी-से-कड़ी प्रतिस्पर्धा करो, या मर जाओ, या शूद्र बन जाओ।

शूद्र बनना मृत्यु से भी बुरा है, क्योंकि अपनी पवित्रता, आत्मसम्मान और स्वाभिमान को त्यागकर जीवित रहना पशुओं का स्वभाव है, इंसानों का नहीं।
Via :Jat Ethnic

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