02/01/2026
"पकोड़े तलना भी एक हुनर है, पर शायद वो हुनर सिर्फ उन युवाओं के लिए है जिनके पास 'पहुंच' नहीं है।" 🎓💼
आज के दौर में शिक्षा की शुचिता और डिग्रियों की गरिमा पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है। जब मेहनत से हासिल की गई डिग्रियां अलमारी की धूल फांकने लगें और काबिलियत के बजाय 'संपर्क' और 'सिफारिश' सफलता के मापदंड बन जाएं, तो युवा मन में हताशा का जन्म लेना स्वाभाविक है। पकोड़े तलना या कोई भी शारीरिक श्रम करना बुरा नहीं है—श्रम की अपनी एक प्रतिष्ठा होती है—परंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब यह 'हुनर' किसी विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि 'मजबूरी' के रूप में थोपा जाता है। यह विडंबना ही है कि ऊंचे पदों पर बैठने की योग्यता रखने वाला युवा जब अपनी मेधा को रद्दी के भाव बिकते देखता है, तो उसे समझ आता है कि इस व्यवस्था में 'ज्ञान के प्रकाश' से ज्यादा 'पहुंच की चमक' मायने रखती है। यह केवल एक बेरोजगारी का मुद्दा नहीं है, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के आत्मविश्वास का टूटता हुआ दर्पण है, जहाँ सपने संसाधनों के अभाव में नहीं, बल्कि अवसर की असमानता के कारण दम तोड़ रहे हैं।