25/04/2026
कल शाम अकेले बैठा था तो ये ख़याल आया
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रोज़ देर तक देखता हूँ ख़ुद को आईने में ,
तब भी अपना चेहरा अनजान सा नज़र आता है ,
मगर मैं ख़ुश हूँ
रोज़ शाम लौट आता हूँ हार कर ,
रोज़ सुबह निकल पड़ता हूँ फिर जीतने के लिए,
मगर मैं खुश हूँ
उदास होना चाहता हूँ, उदास होना नहीं आता,
मुस्कुराना चाहता हूँ, तू मुस्कुराने नहीं देता,
मगर मैं ख़ुश हूँ
साँस लेना भी सीने पर बोझ सा लगता है,
और आँखों में एक सपना भी एहसान सा लगता है,
मगर मैं खुश हूँ
ख़फ़ा हूँ तुझसे, पर मुझे तो तुझसे रूठना भी नहीं आता,
खड़ा हूँ लोगों की भीड़ में, दूर तक है सन्नाटा,
मगर मैं ख़ुश हूँ