Sant Suraksha Samachar

Sant Suraksha Samachar संतो की रक्षा सुरक्षा हेतु इस मिशन का ?

17/12/2025
11/12/2025

"इच्छा से इच्छापूर्ति तक.."

"सृष्टि के आरंभ में कुछ नहीं था। न समय था, न दिशा, न पदार्थ, न प्रकाश, न ध्वनि। एक शांत, असीम, अज्ञात ऊर्जा थी। उसी ऊर्जा के भीतर पहली हलचल हुई। वही पहली कंपन्न इच्छा थी। इच्छा का अर्थ था अस्तित्व की पहली चाह। इच्छा ने स्वयं को पहचाना और पहचानने की आवश्यकता ने विस्तार की माँग उत्पन्न की। उसी क्षण ब्रह्मांड की रचना प्रारंभ हुई। इच्छा ने ऊर्जा को जन्म दिया, ऊर्जा ने कंपन को, कंपन ने प्रकाश को, प्रकाश ने स्थान को, और स्थान ने रूप को। यह क्रम इच्छा की निरंतर गति पर आधारित था। इसलिए कहा जाता है कि सृष्टि का पहला शब्द इच्छा था और अंतिम शब्द भी इच्छा है। सृष्टि की शुरुआत इच्छा से हुई और उसका अंत इच्छापूर्ति में ही होगा।

इच्छा की पहली अभिव्यक्ति थी जानना। दूसरी थी बनना। तीसरी थी अनुभव करना। जानने के लिए विस्तार हुआ। बनने के लिए पदार्थ और ऊर्जा में विभाजन हुआ। अनुभव के लिए चेतना प्रकट हुई। चेतना अनुभव के लिए देह की तलाश में थी और देह चेतना के अनुभव के लिए। इस मिलन से जीवन प्रारंभ हुआ। जीवन इच्छा का घनीभूत रूप है। जहाँ इच्छा सघन होती है, वहाँ जीवन का जन्म होता है। इसलिए जीवन और इच्छा का संबंध जन्मजात है। इच्छा और जीवन एक ही तत्व के दो नाम हैं।

सृष्टि के कई युगों में इच्छा अनेक रूपों में प्रकट होती रही। वनस्पति में इच्छा थी जीवित रहने की। पशु में इच्छा थी भोजन और सुरक्षा की। मनुष्य में इच्छा चेतन आकांक्षा के रूप में जन्मी। मनुष्य केवल जीना नहीं चाहता, वह जानना चाहता है, बनना चाहता है, समझना चाहता है, प्राप्त करना चाहता है, और अंततः पूर्ण होना चाहता है। यही इच्छा उसे समस्त जीवों में अद्वितीय बनाती है। इच्छा ही मनुष्य का स्वभाव भी है और उद्देश्य भी।

मानव इतिहास के हर युग में इच्छा की दिशा अलग रही। आदिमानव की इच्छा संरक्षण की थी। कृषिकाल में स्थायित्व की। साम्राज्य युग में शक्ति और नियंत्रण की। धर्मकाल में मुक्ति की। आधुनिक युग में इच्छा है पहचान, उपलब्धि, स्वतंत्रता, गति और अनुभव की। युग बदलते रहे, लक्ष्य बदलते रहे, लेकिन इच्छा का स्वभाव न बदला। इच्छा हमेशा विस्तार चाहती है। उसी विस्तार का अंतिम रूप इच्छापूर्ति है।

इसी ब्रह्मांडीय इच्छा की यात्रा मेरे व्यक्तिगत जीवन की यात्रा में भी प्रकट होती है। मेरा जन्म भी दो इच्छाओं के मिलन से हुआ। एक इच्छा मेरी माता की थी—जीवन को जन्म देने की। दूसरी इच्छा मेरे पिता की थी—अपनी वंशधारा को आगे बढ़ाने की। इन दोनों इच्छाओं ने मिलकर वह ऊर्जा बनाई जिससे मेरे जीवन का आरंभ हुआ। इसलिए मेरा अस्तित्व भी इच्छा की देन है। मैं इच्छा से जन्मा हूँ। मेरी पहली धड़कन भी इच्छा की ध्वनि थी। मेरे अस्तित्व का प्रथम आह्वान था—अनुभव करना, समझना, और पूर्णता की ओर बढ़ना।

बचपन में इच्छा सरल थी। देखने की, सीखने की, समझने की। दुनिया छोटी लगती थी और जिज्ञासा विशाल। हर नई चीज़ चमत्कार लगती थी। हर अनुभव नया द्वार खोलता था। इच्छा का केंद्र था खोज का आनंद।

विद्यालय काल में इच्छा दिशा लेने लगती है। तुलना, प्रतिस्पर्धा, पहचान—ये पहली बार जीवन में प्रवेश करते हैं। इच्छा बनती है बेहतर बनने की। समाज इच्छा को आकार देना शुरू करता है। दूसरों की राय प्रभाव डालती है। इच्छा अब चुनौती बन जाती है।

किशोरावस्था में इच्छा तेज और अनियंत्रित हो जाती है। पहचान की, स्वतंत्रता की, सिद्ध करने की, स्वीकार किए जाने की। यह समय इच्छाओं की आँधी का होता है जिसमें दिशा अस्पष्ट रहती है। हर युवक स्वयं को खोजने और सिद्ध करने की दौड़ में रहता है।

युवा अवस्था में इच्छा सबसे प्रचंड होती है। व्यक्ति सोचता है कि उपलब्धि ही जीवन है। धन, पद, प्रतिष्ठा, प्रभाव—ये लक्ष्य बनते हैं। मनुष्य मानता है कि सब कुछ मिल जाए तो संतोष मिलेगा। पर जितना मिलता है, भीतर उतना खालीपन महसूस होता है। क्योंकि इच्छा का स्वभाव रुकने का नहीं है। इच्छा हमेशा अगले स्तर की मांग करती है। पूर्ति अंत नहीं, आगे का द्वार है। इसी सच की शुरुआत तब होती है जब व्यक्ति पहली बार टूटता है।

30 से 40 वर्ष की अवधि इच्छा और वास्तविकता के संघर्ष की अवधि है। सपनों की ऊँचाई और परिस्थितियों का बोझ आपस में टकराते हैं। इसी टकराव में व्यक्ति अपना वास्तविक सत्य पहचानता है। कई लोग टूट जाते हैं। कई समझौता कर लेते हैं। कई अपनी मौलिकता खो देते हैं। पर कुछ लोग समझते हैं कि इच्छा बाहरी विजय का खेल नहीं, भीतरी जागरण की यात्रा है। मैं भी इसी मोड़ पर इस सत्य से गुज़रा। समझ आया कि इच्छा साधन नहीं, दिशा है। इच्छा परिणाम नहीं, उद्देश्य है। इच्छा बोझ नहीं, ऊर्जा है।

40 से 50 वर्ष की अवधि इच्छा की परिपक्वता का समय है। इच्छा अब बाहर नहीं, भीतर की ओर मुड़ती है। पहले इच्छा थी पाने की, अब है होने की। पहले इच्छा थी जोड़ने की, अब है हटाने की। पहले इच्छा थी सिद्ध होने की, अब है सत्य होने की। पहले इच्छा थी दूसरों से मान्यता पाने की, अब है स्वयं को पहचानने की। यही चरण इच्छा को इच्छापूर्ति के मार्ग पर ले जाता है।

इच्छापूर्ति क्या है? इच्छापूर्ति बाहरी उपलब्धियों की सूची नहीं है। इच्छापूर्ति वह अवस्था है जहाँ इच्छा और कर्म एक हो जाते हैं। जहाँ चाह और मार्ग में दूरी नहीं रहती। जहाँ भीतर और बाहर में संघर्ष नहीं रहता। इच्छापूर्ति वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति अपनी सच्ची प्रकृति को पहचान लेता है। इच्छापूर्ति वह है जहाँ जीवन प्रवाह बन जाता है, संघर्ष नहीं।

अब, 51 वर्ष की अवस्था में स्पष्ट अनुभव है कि हर घटना इच्छा को आकार देती रही। हर असफलता ने इच्छा को शुद्ध किया। हर चोट ने उसे पारदर्शी बनाया। हर संघर्ष ने उसे मजबूत किया। हर टूटन ने उसे परिपक्व बनाया। आज समझ में आता है कि इच्छा ही जन्म का कारण है और इच्छा ही मृत्यु के बाद की दिशा है। इच्छा ही वह स्मृति है जो जन्मों के बीच यात्रा करती है। इच्छा ही वह पुल है जो मनुष्य और ब्रह्म के बीच संबंध बनाती है।

इस 51 वर्ष की यात्रा का निष्कर्ष यह है कि इच्छा ही ईश्वर है। इच्छा ही ब्रह्म का प्रथम स्वर है। इच्छा ही जीवन की धुरी है। इच्छा न होती तो ब्रह्मांड न होता, चेतना न होती, अनुभव न होता, मानव न होता। इच्छा को दबाना अज्ञान है। इच्छा को समझना ज्ञान है। इच्छा को पूर्ण करना मुक्ति है।

इच्छा से इच्छापूर्ति तक की यात्रा ही मनुष्य का वास्तविक धर्म है। यही जीवन का वास्तविक उद्देश्य है। यही अस्तित्व का नियम है। मनुष्य इच्छा से जन्म लेता है और इच्छापूर्ति में पूर्ण हो जाता है। इच्छा से शुरुआत और इच्छापूर्ति तक समापन ही संपूर्णता है।

यही यात्रा है। यही सत्य है। यही मेरा अनुभव है। यही मेरा जीवन है। यही 51 वर्ष का सार है।

इच्छा से इच्छापूर्ति तक — यही मानव होने का अर्थ है।"

आशीर्वचन:-

स्वामी राजेंद्र देव जी
इच्छापूर्ति धाम, अदलपुर खैर अलीगढ़ उत्तर प्रदेश

Address

समाधान आश्रम
Faridabad
121004

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Sant Suraksha Samachar posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Business

Send a message to Sant Suraksha Samachar:

Share