09/06/2026
हम लोग पुलिस कांस्टेबल की परीक्षा देने के लिए नई दिल्ली के निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पहुंचे थे। लेकिन दुर्भाग्य से हमारी ट्रेन निकल चुकी थी। तभी प्लेटफॉर्म नंबर 4 पर दूसरी ट्रेन आकर रुकी। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि लोगों को खड़े रहने तक की जगह मुश्किल से मिल रही थी। जो जहां खड़ा था, वहीं जमे रहने को मजबूर था। ऐसा लग रहा था मानो पूरे डिब्बे में सांस लेने तक की जगह नहीं बची हो।
मैं भी किसी तरह डिब्बे के अंदर पहुंच गया। तभी मेरी नजर गैलरी में लेटे हुए एक व्यक्ति पर पड़ी। भीड़ के कारण लोगों को आने-जाने में परेशानी हो रही थी। कई यात्रियों ने उसे उठाने की कोशिश की, लेकिन वह हाथ जोड़कर कुछ कह रहा था। उसकी आवाज शोर में साफ सुनाई नहीं दे रही थी। जिज्ञासा के कारण मैं उसके पास गया।
मैंने उसका हाथ पकड़कर देखा तो उसका शरीर बुखार से तप रहा था। उसके चेहरे पर थकान, बेबसी और दर्द साफ दिखाई दे रहा था। संयोग से मेरे बैग में बुखार की कुछ गोलियां थीं। मैंने उसे दवा देने की कोशिश की, लेकिन पास बैठे एक यात्री ने बताया कि उसने सुबह से कुछ भी नहीं खाया है। खाली पेट दवा खाने से उसे परेशानी हो सकती थी।
मेरे टिफिन में कुछ आलू के पराठे थे। मैंने एक पराठा निकालकर उसे दिया, लेकिन वह खाने से मना कर रहा था। मैंने उसे समझाया और भरोसा दिलाया कि थोड़ा-सा खा लेने से उसे ताकत मिलेगी। काफी समझाने के बाद उसने एक आलू का पराठा खाया। कुछ देर बाद मैंने उसे बुखार की एक गोली दी, जिसे उसने पानी के साथ खा लिया।
रात के लगभग 12 बज रहे थे। दवा खाने के बाद वह शांति से वहीं गैलरी में लेट गया। पूरी रात वह रेलवे की जनरल बोगी की उसी गैलरी में पड़ा रहा। बीच-बीच में मैं दो-तीन बार उसका हाथ पकड़कर उसका बुखार जांचता रहा। कुछ समय बाद उसका बुखार सामान्य हो गया था। यह देखकर मुझे राहत मिली।
हालांकि बुखार उतर गया था, लेकिन उसके चेहरे की उदासी, आंखों की थकान और उसके कपड़ों की हालत यह बता रही थी कि वह व्यक्ति केवल बीमारी से ही नहीं, बल्कि जीवन की किसी बड़ी परेशानी से भी जूझ रहा था। भीड़ से भरी उस ट्रेन में हजारों लोग थे, लेकिन उस रात उसकी बेबसी और संघर्ष ने मेरे मन पर एक ऐसी छाप छोड़ दी, जिसे मैं आज भी नहीं भूल पाया हूं।