09/04/2026
इंसानियत शर्मसार: क्या हम पत्थर बन चुके हैं?
आज हमारे शहर फारबिसगंज की सड़क पर एक फिल्म नहीं, बल्कि असली मौत का खेल चल रहा था। एक शख्स दूसरे का गला रेत रहा था और हमारे 'वीर' नागरिक हाथ में स्मार्टफोन थामे अपनी बहादुरी दिखा रहे थे—वीडियो रिकॉर्ड करके!
क्या हम इतने गिर चुके हैं?
सब्जी मंडी के उस गेट के सामने सिर्फ एक इंसान का धड़ अलग नहीं हुआ, बल्कि हमारी नैतिकता, हमारे संस्कार और हमारे 'इंसान' होने के दावे के भी टुकड़े-टुकड़े हो गए।
• वीडियो बनाने वालों से एक सवाल: जब आप ज़ूम करके उस कटते हुए गले का वीडियो बना रहे थे, क्या आपकी रूह नहीं कांपी?
• तमाशबीनों से एक सवाल: अगर मरने वाला आपका अपना भाई या पिता होता, तब भी क्या आप मोबाइल का एंगल ही सेट कर रहे होते?
शर्म आती है यह कहते हुए कि हम उस समाज का हिस्सा हैं जहाँ लोग मरते हुए इंसान को बचाने के बजाय उसकी मौत को 'लाइव' दिखाना ज्यादा जरूरी समझते हैं।
आज फ़ारबिसगंज की सड़कों पर जो चुप्पी हमने साधी है, याद रखना... कल जब हमारी खुद की चीखें निकलेंगी, तो दुनिया मदद के लिए हाथ नहीं, सिर्फ कैमरा ही उठाएगी। मोबाइल की स्क्रीन से बाहर निकलिए, इससे पहले कि हम सिर्फ एक 'वायरल वीडियो' बनकर रह जाएं।" इंसान बनिए, कैमरा नहीं!
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