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प्रणाम पिताजीजन्मदिन की हार्दिक बधाई
02/09/2026

प्रणाम पिताजी
जन्मदिन की हार्दिक बधाई

कर्ता करे न कर सके, शिव करे सो होय, तीनों लोक, नौ खंड में, महादेव से बड़ा ना कोय🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
18/08/2026

कर्ता करे न कर सके, शिव करे सो होय,
तीनों लोक, नौ खंड में, महादेव से बड़ा ना कोय
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

16/08/2026

अटल जी को कोटि-कोटि नमन

महादेव रक्षा करना 🙏
03/08/2026

महादेव रक्षा करना 🙏

माँ ❤️  प्रणाम जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ....विश्व की किसी भी भाषा के शब्दकोश में ऐसा कोई शब्द नहीं, जो "माँ" को परिभ...
01/08/2026

माँ ❤️ प्रणाम जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ....
विश्व की किसी भी भाषा के शब्दकोश में ऐसा कोई शब्द नहीं, जो "माँ" को परिभाषित कर सके। शब्द उसकी ममता के आगे छोटे पड़ जाते हैं, उपमाएँ उसके व्यक्तित्व के आगे फीकी लगती हैं, और अलंकार भी उसके प्रेम की गहराई को व्यक्त करने में असमर्थ हो जाते हैं।
माँ वह है, जिसके प्रेम और वात्सल्य की कोई सीमा नहीं,
जिसके त्याग का कोई माप नहीं, जिसके स्नेह का कोई विकल्प नहीं और जो हमारे वजूद की वजह हो, हमारा अस्तित्व जिनसे बना उस माँ की महानता को शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं।
ईश्वर आपको स्वस्थ, दीर्घायु और सदैव प्रसन्न रखें। आपका स्नेह और आशीर्वाद ही मेरी सबसे बड़ी पूँजी है।

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं एवं ढेर सारी बधाई
14/06/2026

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं एवं ढेर सारी बधाई

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से जो कहते हैं यदि उसे आज के शब्दों और परिस्थितियों में ढालें तो यह अर्थ होगा कि मनुष्य का सबसे ब...
24/05/2026

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से जो कहते हैं यदि उसे आज के शब्दों और परिस्थितियों में ढालें तो यह अर्थ होगा कि मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह स्वयं को अपने पद, कर्म, सफलता, महत्वाकांक्षा और संसार द्वारा दी गई पहचान के साथ जोड़ लेता है। वही भ्रम धीरे धीरे उस व्यक्ति के जीवन का भी आधार बन गया था। अत्यंत साधारण आर्थिक पृष्ठभूमि से निकलकर उसने बचपन से अपने माता-पिता का संघर्ष देखा था। अभावों के बीच सम्मान बचाए रखने का संघर्ष, परिवार को स्थिरता देने का संघर्ष, और आने वाली पीढ़ी को बेहतर जीवन देने का संघर्ष। उसी संघर्ष ने उसके भीतर असाधारण बनने की तीव्र आकांक्षा पैदा की। उसे लगा कि यदि वह बहुत बड़ा बन गया, बहुत सफल हो गया, बहुत प्रतिष्ठा और धन अर्जित कर लिया, तो भीतर बैठा भय समाप्त हो जाएगा। वह निरंतर आगे बढ़ता गया। नई भूमिकाएँ, नई पहचानें, नई उपलब्धियाँ, नए लोग, नया प्रभाव। हर स्थान पर उसने स्वयं को परिस्थितियों के अनुसार ढाला, स्वयं को सिद्ध किया, और लोगों की दृष्टि में एक सक्षम, महत्वाकांक्षी और प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में स्थापित किया। परंतु जितनी उसकी बाहरी प्रगति बढ़ती गई, उतनी ही भीतर एक अनकही बेचैनी भी गहरी होती गई। उसे धीरे धीरे अनुभव होने लगा कि वह जीवन भर स्वयं को नहीं, बल्कि अपनी भूमिकाओं को जीने की कोशिश करता रहा। कभी आदर्श पुत्र बनने की कोशिश, कभी महत्वाकांक्षी युवा तो कभी प्रभावशाली पेशेवर बनकर। उसकी उपलब्धियाँ बढ़ रही थीं, पर भीतर स्थिरता नहीं आ रही थी। उसे प्रतिष्ठा खोने का भय था, पीछे छूट जाने का भय था, उस पुराने अभाव में लौट जाने का भय था जिससे उसका परिवार कभी निकला था। और शायद पहली बार उसके भीतर यह प्रश्न स्पष्ट होकर उठा कि यदि एक दिन उससे उसकी सारी पहचानें, सफलताएँ और सामाजिक स्वीकृतियाँ छिन जाएँ, तो क्या उसके भीतर ऐसा कुछ बचेगा जिसे वह वास्तव में “स्वयं” कह सके। उसी क्षण उसके भीतर पहला वास्तविक प्रश्न उठा, समझ जागी। यह समझ कि संसार को जीतने की यात्रा और स्वयं को जानने की यात्रा एक ही चीज़ नहीं होती।

माँ ❤️जिसकी कोई उपमा नहीं...जिसकी कोई सीमा नहीं
10/05/2026

माँ ❤️
जिसकी कोई उपमा नहीं...
जिसकी कोई सीमा नहीं

24/04/2026
जय परशुराम
19/04/2026

जय परशुराम

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