24/05/2026
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से जो कहते हैं यदि उसे आज के शब्दों और परिस्थितियों में ढालें तो यह अर्थ होगा कि मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह स्वयं को अपने पद, कर्म, सफलता, महत्वाकांक्षा और संसार द्वारा दी गई पहचान के साथ जोड़ लेता है। वही भ्रम धीरे धीरे उस व्यक्ति के जीवन का भी आधार बन गया था। अत्यंत साधारण आर्थिक पृष्ठभूमि से निकलकर उसने बचपन से अपने माता-पिता का संघर्ष देखा था। अभावों के बीच सम्मान बचाए रखने का संघर्ष, परिवार को स्थिरता देने का संघर्ष, और आने वाली पीढ़ी को बेहतर जीवन देने का संघर्ष। उसी संघर्ष ने उसके भीतर असाधारण बनने की तीव्र आकांक्षा पैदा की। उसे लगा कि यदि वह बहुत बड़ा बन गया, बहुत सफल हो गया, बहुत प्रतिष्ठा और धन अर्जित कर लिया, तो भीतर बैठा भय समाप्त हो जाएगा। वह निरंतर आगे बढ़ता गया। नई भूमिकाएँ, नई पहचानें, नई उपलब्धियाँ, नए लोग, नया प्रभाव। हर स्थान पर उसने स्वयं को परिस्थितियों के अनुसार ढाला, स्वयं को सिद्ध किया, और लोगों की दृष्टि में एक सक्षम, महत्वाकांक्षी और प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में स्थापित किया। परंतु जितनी उसकी बाहरी प्रगति बढ़ती गई, उतनी ही भीतर एक अनकही बेचैनी भी गहरी होती गई। उसे धीरे धीरे अनुभव होने लगा कि वह जीवन भर स्वयं को नहीं, बल्कि अपनी भूमिकाओं को जीने की कोशिश करता रहा। कभी आदर्श पुत्र बनने की कोशिश, कभी महत्वाकांक्षी युवा तो कभी प्रभावशाली पेशेवर बनकर। उसकी उपलब्धियाँ बढ़ रही थीं, पर भीतर स्थिरता नहीं आ रही थी। उसे प्रतिष्ठा खोने का भय था, पीछे छूट जाने का भय था, उस पुराने अभाव में लौट जाने का भय था जिससे उसका परिवार कभी निकला था। और शायद पहली बार उसके भीतर यह प्रश्न स्पष्ट होकर उठा कि यदि एक दिन उससे उसकी सारी पहचानें, सफलताएँ और सामाजिक स्वीकृतियाँ छिन जाएँ, तो क्या उसके भीतर ऐसा कुछ बचेगा जिसे वह वास्तव में “स्वयं” कह सके। उसी क्षण उसके भीतर पहला वास्तविक प्रश्न उठा, समझ जागी। यह समझ कि संसार को जीतने की यात्रा और स्वयं को जानने की यात्रा एक ही चीज़ नहीं होती।