01/05/2026
आज 01 मई को डॉलर ₹95.40 पार कर गया। यानी रुपया फिर लुढ़का, और इस बार इतनी शांति से लुढ़का जैसे उसे भी पता हो कि जनता अब महंगाई की खबर सुनकर चौंकती नहीं, सिर्फ चुप हो जाती है।
यह सिर्फ करेंसी का गिरना नहीं है, यह उस मॉडल का नतीजा है जिसमें चुनाव तक मुफ्त चीजें बाँटो, कैमरे चमकाओ, ड्रम बजाओ, और चुनाव खत्म होते ही जनता को बिल थमा दो।
2014 में कहा गया था मजबूत सरकार आएगी तो रुपया मजबूत होगा। तब डॉलर ₹58-₹60 के आसपास था। बड़े-बड़े मंचों से बताया गया कि अब दुनिया भारत को सलाम करेगी, निवेश बरसेगा, रोजगार आएगा, अर्थव्यवस्था दौड़ेगी।
2026 में नतीजा सामने है। डॉलर ₹95.40, पेट्रोल महंगा, रसोई महंगी, नौकरी कम, और भक्त अब भी ताली में व्यस्त। जैसे आदमी डूब रहा हो और किनारे वाले उसकी तैराकी की तारीफ कर रहे हों।
रुपया ऐसे ही नहीं गिरता। इसके पीछे सालों की गलत प्राथमिकताएँ होती हैं। भारत आज भी अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल विदेश से खरीदता है। जब तेल महंगा होता है तो डॉलर की मांग बढ़ती है। जब डॉलर की मांग बढ़ती है तो रुपया कमजोर होता है।
यह सीधी बात है। मगर 12 साल तक ऊर्जा नीति का मतलब भाषण रहा, आत्मनिर्भरता का मतलब नारा रहा, और जमीन पर निर्भरता जस की तस रही।
दूसरा कारण है विदेशी निवेशकों का भरोसा टूटना। निवेशक मंदिर उद्घाटन देखकर पैसा नहीं लगाते, वे कानून, स्थिर नीति, टैक्स ढांचा, उद्योग माहौल और संस्थाओं की स्वतंत्रता देखते हैं।
जब फैसले अचानक हों, छोटे उद्योग दबें, बेरोजगारी बढ़े, बाजार अनिश्चित हो, तब पैसा निकलता है। लाखों करोड़ का विदेशी पैसा बाहर गया, रुपया दबा। मगर टीवी पर बताया गया कि देश सुपरपावर बन रहा है। टीवी और थाली, दोनों बहुत कुछ सह लेते हैं।
तीसरा कारण है व्यापार घाटा। हम खरीद ज्यादा रहे हैं, बेच कम रहे हैं। मेक इन इंडिया का ढोल खूब बजा, मगर छोटे उद्योग नोटबंदी और जटिल GST में पिस गए। जो कारखाने रोजगार देते थे वे कागजों में उलझ गए। उत्पादन घटा, आयात बढ़ा, रोजगार घटा, रुपया गिरा। फिर कहा गया डिजिटल हो जाओ। जैसे टूटी हड्डी पर स्टिकर चिपका दिया जाए।
2014 से 2022 तक सरकारी विज्ञापनों पर लगभग ₹6,491 करोड़ खर्च होने की रिपोर्टें आईं। उसके बाद भी प्रचार का सिलसिला जारी। रोड शो, बड़े मंच, विशाल कटआउट, हर योजना पर चेहरा, हर प्रमाणपत्र पर चेहरा, हर मोड़ पर चेहरा।
जनता टैक्स दे रही थी अस्पताल के लिए, स्कूल के लिए, सिंचाई के लिए, रोजगार के लिए। बदले में उसे पोस्टर मिले। लोकतंत्र को सेल्फी स्टूडियो बना दिया गया।
चुनाव के समय मुफ्त योजनाओं की बरसात हुई। मुफ्त राशन, मुफ्त नकद, मुफ्त वादे। मुफ्त अगर शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और सामाजिक सुरक्षा के लिए हो तो समझ आता है। मगर जब मुफ्त चीजें वोट कैलेंडर देखकर बाँटी जाएँ और उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान न हो, तब घाटा बढ़ता है।
घाटा बढ़े तो कर्ज बढ़ता है। कर्ज बढ़े तो भरोसा घटता है। भरोसा घटे तो रुपया गिरता है। फिर जनता से कहा जाता है विश्वगुरु बन रहे हैं। आदमी सिलेंडर भराने जाए या विश्वगुरु का पोस्टर चूमे।
डॉलर ₹95.40 का मतलब है पेट्रोल महंगा, डीजल महंगा, ट्रांसपोर्ट महंगा, दाल महंगी, गैस महंगी, मोबाइल महंगा, दवा महंगी। किसान की लागत बढ़ेगी। दुकानदार की ढुलाई बढ़ेगी। नौकरीपेशा आदमी की बचत घटेगी। गरीब आदमी की थाली छोटी होगी। मध्यम वर्ग EMI और महंगाई के बीच पिसेगा।
लेकिन टीवी पर बहस फिर भी विपक्ष के बयान पर होगी। असली मुद्दों को गायब करने की कला विश्वस्तरीय है।
भक्तों से सवाल है। जब कांग्रेस के समय डॉलर बढ़ता था तब राष्ट्र संकट में पड़ जाता था। अब ₹95.40 पर राष्ट्र मौन क्यों है। तब पेट्रोल बढ़े तो लूट, अब बढ़े तो वैश्विक कारण। तब रुपया गिरे तो निकम्मी सरकार, अब गिरे तो विश्व परिस्थिति। तब सवाल देशभक्ति था, अब सवाल देशद्रोह है। यह भक्ति नहीं, मानसिक किराएदारी है।
सरकार को क्या करना चाहिए प्रचार पर खर्च घटाओ। इवेंट मैनेजमेंट बंद करो। MSME को सस्ता कर्ज दो। निर्यात उद्योग बढ़ाओ। तेल आयात निर्भरता घटाओ। शिक्षा और स्किलिंग पर पैसा लगाओ। RBI को पेशेवर ढंग से काम करने दो।
30 अप्रैल 2026 सिर्फ तारीख नहीं है। यह वह दिन है जब दावों की ऊँचाई और रुपये की गिरावट एक साथ दिखी। जनता से अच्छे दिन मांगे गए थे, बदले में महंगा जीवन मिला।
अब भी जो ताली बजा रहा है, उससे जेब चेक कर लेना। शायद वह अपनी नहीं, तुम्हारी कटवा रहा है।
🥀💔😊