Pawel kumar

Pawel kumar अपनी बारी

12/03/2026

पेट्रोल, डीज़ल बढ़ने वाला है!

31/01/2026

चलो आज थोड़ा सा धार्मिक हो जातें हैं, लोगों को क्या पता चलेगा, एक दिन की ही तो बात है!
1/02/2026

04/04/2021

सिस्टम!

लोग अक्सर सिस्टम को गाली देते मिल जाएंगे, पर सिस्टम को समझने की कोशिश कुछ ही लोग करते हैं, जो इसे समझ जाते हैं वो गाली देना छोड़ देते हैं, और आम लोगों से एक कदम आगे निकल जाते हैं।
अब बात करते हैं गाली देने वालो की , ये वो लोग हैं जो दिहाड़ी मज़दूरी करते हैं (इनमें कुछ लोग मोटी सेलरी पाने वाले भी हो सकते हैं) इन्हें सिस्टम से कोई लेना-देना नहीं है, इन्हें दिहाड़ी करके पेसे कमाने हैं अपने बच्चों को पालना है उनकी जरूरतें पूरी करनी है, आराम की जिंदगी जीना इनका सपना है, पर जब भी इनके साथ कोई घटना घटती है ये रोने लग जाते हैं और कहते हैं मेरे साथ ही एसा क्यों हुआ, मानो जेसे ये घटना इस सृष्टि में पहली बार इन्हीं के साथ घटी हो, अब मान लो घटना पुलिस से संबंधित है, तो कहेंगे पुलिस पेसे खाई बेठि है हमारी सुन नहीं रही और पुलिस को गालियाँ देना शुरू कर देते हैं, मान लो उनकी सिफारिश निकल आई तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं, वो उसकी जय जय कार करते नहीं थकेंगे, अगर नहीं निकलती तो उनके पास एक ही रास्ता बचा है, गाली देना।
एसे लोगों की राजनीतिक समझ 0 होती है, उन्हें समाज में घटित किसी घटना से कोई लेना-देना नहीं होता, हाँ सामाजिक दिखावा वो बढ़ चढ़ कर करते हैं।

एक घटनाक्रम!

कितने लोग हैं जो ट्रैफ़िक पुलिस को देखते ही इधर-उधर से निकल जाते हैं अगर वो नहीं दिखी और पकड़े गए, तो कितने लोग हैं सीधा चालान कटवा लेते हैं, मेरे ख्याल से नाममात्र ही होंगे, आप अपना अनुभव भी याद कर सकते हैं, शायद ही आपके मित्र ने आपसे आकर कहा हो की पुलिस वाले खड़े थे मेरी एक ग़लती के कारण मेरा चालान कट गया, बल्कि वो ये बात उत्साह के साथ जरूर कहते मिल जाएंगे कि उनके एक फोन के कारण उनका चालान होने से बचा गया, कितने लोग कानूनो का पालन करते मिलेंगे, नाम भर।
और फ़िर सिस्टम से सिस्टम के ठीक होने की उम्मीद लगाते हो, जब तुम ही नियमो का पालन नहीं करोगे तो सिस्टम क्या ख़ाक पालन करेगा

सिस्टम को गाली देना खुद को गाली देने के बराबर है,पहले अपने अंदर के सिस्टम को ठीक करो, सिस्टम ख़ुद ब ख़ुद ठीक हो जाएगा।

पावेल कुमार!!

17/12/2020

आम नागरिक!

सही पूछिये तो लोकतंत्र में आम नागरिक की आवाज सबसे पहले सुनी जाती हैं, पर जब आप अपने चारो तरफ देखेंगे तो आपको आम नागरिक नजर ही नहीं आएगा, आम नागरिक कभी भी किसी राजनीतिक पार्टी, किसी जाति, किसी धर्म, किसी समुदाय का हितैषी नहीं होता, वो सिर्फ नागरिक का हितैषी होता है, आज हम देख रहे हैं देश में आंदोलन चल रहे हैं, पर कोई भी आंदोलन कामयाब नहीं हो रहा, और वो आंदोलनकारी इसका ठीकरा मिडिया पर फोड़ रहे हैं इन आंदोलनकारियों पर मुझे तरश आता है इनकी मूर्खता पर कोई क्यों ना हँसे, ये भी तो पहले खास थे, खास हैं और आगे भी तो खास ही रहना चाहते हैं, तो ये रोना क्यों, जब भुगतने की बारी आई तो रो दिये, तुम्हारा ग़ज़ब हाल है, बराबरी को तुम मानते नहीं और ना ही तुम उसे लाना चाहते हो, तो तुम्हारी सुनेगा कोन, और तुम उम्मीद करते हो की आम नागरिक तुम्हारा साथ दे, तुम चाहते हो कि सरकार को उसकी ओकात दिखा दे, अरे मेरे प्यारे आंदोलनकारियों अगर आप सच में आंदोलन को कामयाब करना चाहते हैं तो सबसे पहले खुद में बदलाव करिये, सरकारें तो आती जाती रहती है, निष्पक्ष बनना सीखिये, सबसे ज़रूरी पहले आप आम नागरिक बनिये, उसके बाद आप देखेंगे हर आंदोलन सफ़ल होता चला जाएगा।

पावेल कुमार

01/10/2020

अपनी बारी

ये बात 2014 की है जब देश में लोकसभा के चुनाव थे, लोग देश में बदलाव चाहते थे, लोग बलात्कार की घटनाओ से, आरक्षण से, कॉग्रेस से, महंगाई से,बेरोजगारी से, सबसे आजादी चाहते थे।
चुनाव हुए, सरकार बदल गई, पर सरकार बदलने से क्या बदलाव आया ये आप भी अच्छी तरह से जानते हैं।
बलात्कार :बलात्कार से घ्रणा करने वाले लोगों ने बढ़ चढ़ कर BJP को वोट किया, सही भी था पर किसी ने ये नहीं देखा की BJP ने जिन नेताओ को टिकट दिया है उनपर बलात्कार व आपराधिक मामले कितने चल रहे हैं किसी में ये जानने की जिज्ञासा या रूचि ही नहीं थी, सबको एक चहरा(मोदी) दिखा दिया कि इसके पास आपकी समस्या का समाधान है, आपकी कौनसी समस्या का समाधान कितना हुआ या नहीं ये आप अपना देख लीजिये।

मैं तो कहता हूं कि किसी भी इंसान के पास बलात्कार जेसी समस्या का समाधान नहीं है, इस समस्या का समाधान सिर्फ़ और सिर्फ़ समाज के पास है, समाज से मेरा मतलब उन नकली ठेकेदारों से नहीं जो धर्म जाति, देखकर ही आंदोलन करते हैं और अपनी राजनीति चमका लेते हैं, समाज से मेरा मानना उस सामाजिक सोच से है जो सोच हम अपने परिवार के प्रति रखते हैं क्या वो सोच हम अपने समाज के प्रति रखते हैं? मेरे ख्याल से नहीं!
हमारा समाज महिलाओं को कितनी आज़ादी देता है ये बात आप अच्छी तरह से जानते हैं, जो समाज महिलाओं के पहनावे, धर्म, जाति पर नजर रखने लगे वो समाज, समाज होने का ढोंग कर रहा है ये बात हमे समझ लेनी चाहिए, हमे एसे रूढ़िवादी, जातिवाद समाज व सोच का खुलकर विरोध करना चाहिए।
विषय बहुत बड़ा है आज के लिये इतना ही बाकी के विषयों पर फ़िर कभी लिखूँगा।
अंत में इतना ही कहूँगा बलात्कार को ना तो BJP रोक सकती है ना ही कॉंग्रेस, और ना ही अन्य राजनीतिक पार्टि।
आपकी सोच इस मामले में अहम भूमिका अदा कर सकती है।।
पावेल

09/04/2020

कभी तो समझो

कुछ लोग तो घर पहुंच गए, कुछ वहीं फंसे हैं जहां वो काम करते थे, किस हालत में जी रहें है ये कहना बहुत मुस्किल है, ये तो वही समझ सकता है जो इस हालत से गुजरा है, या अब भी कहीं फंसा है, पर हम अपने हालत से भी कुछ अंदाजा लगा सकते हैं , लोग वाकई में बहुत बुरे दौर से गुजर रहे हैं, लोग परेशानी में अपनी व्यथा किससे कहें ये वो समझ ही नहीं पा रहें, बस आस लगाए बेठे है जल्द ही ये बंद समाप्त हो जाए, और वो बाहर निकले, पर वो नहीं जानते कि एक ओर समस्या उनका इंतजार कर रही है, वो है बेरोजगारी, जब वो घर से बाहर काम करने निकलेंगे तो उन्हें वो काम भी नहीं मिलेगा जो वो काम करते थे, स्थिति समान्य होने में दिन, महीने या साल भी लग सकता है, उन्हें रोजगार उतना जल्दी नहीं मिलेगा जितना जल्दी वो घर बेठे सोच रहे हैं, सरकार भी उनके रोजगार के बारे में नहीं सोचेंगी, ऎसा मैं इसलिये कह रहा हूं क्योंकि बंद के दौरान ही गरीब के खाते में 500 रुपये डालकर जो मज़ाक किया है इससे सरकार की मंशा साफ झलकती है, भिखारियों जेसा व्यवहार किया जा रहा है बेंक से 500 रुपये निकलने गए लोगों के साथ,हाँ मैं भी इस दुर्व्यवहार के लिए बेंक वालो का समर्थन करता हूं क्योंकि अगर थोड़ी सी भी शर्म इन लोगों में बची है तो ये सरकार के सिस्टम को समझने की कोशिश करेंगे और समझेंगे कि गलती किसी और कयों है, इस गलती में उनकी कितनी भूमिका है और सिस्टम केसे काम करता है, केसे उनका पढ़ा-लिखा होना कितना जरूरी है इसी पर उनका और उनकी आने वाली पीढ़ी का भविष्य टिका है (बेवकूफ़ लोग ही ये कहते हैं कि हमे सरकार से कोई लेना-देना नहीं है ये तो बड़े लोगों की होती है) एक पढ़े लिखे नागरिक को सरकार व देश विदेश में घटित होने वाली हर घटना से लेना-देना होता है, सही कहूँ तो हर इंसान का हर उस घटना से लेना-देना है जो दुनिया में कहीं पर भी घटित होती है।
जितना जल्दी हो समझ लो, एक बेवकूफ़, अंपढ़ ही इतनी आसानी से समझा सकता है। 😂

पावेल कुमार

23/09/2019

आप बेवकूफ़ है??(आप =जनता। )
राजनीति ने बेरोजगार युवाओं का किस तरह से मज़ाक बनाया है इसका अंदाजा आप 3 दिन (21, 22,23 सितंबर ) में हुई घटनाओं से लगा सकते हैं, यातायात के साधनो की कमी, लचर रेलवे सिस्टम, जिसे बच्चो की जान की जरा भी परवाह नहीं है, बस सरकार का खजाना भरना व आपकी वोट का पक्का होना ही सरकार के लिए महत्वपूर्ण है, उन्हें इससे कोई मतलब नहीं है कि आपका सेंटर 200-300 किलोमीटर दूर कयों ना हो, चाहे आप लड़का या लड़की कयों ना हो, इस बात के लिए मैं सरकार की तारीफ तो करूँगा है कि इस मामले में उसने लड़का और लड़की में जरा भी फर्क़ नहीं किया बिल्कुल बराबरी का दर्जा दिया है।
सरकार को पता था कि चुनाव आयोग चुनाव की घोषणा करने वाला है इस लिए ही उसने (HSSC) 3 दिन में ये सब निपटा दिया और आपको पता भी नहीं चला क्योंकि आप (जनता ) बेवकूफ़ हो ये बात वो अच्छी तरह जानते है और आप भी।

कल ट्रेन में कुछ लोग मिले बोले अगर ट्रेन में कुछ ओर डब्बे जोड़ दिए जाते, सरकारी बसे ओर चला दी जाती तो ये हालत ना होता , मेरा तो एक ही जवाब था अगर पेपर को 3 दिन की बजाय 1 महीने में शनिवार रविवार को लेते तो केसा रहता। 🤔

✍️✍️P. Wazirpura ✍️✍️

09/09/2019

धारणा या परम्परा!

मेने काफी नजदीक से देखा है लोग समाज में बराबरी का दर्जा तब ही पाते है जब वो किसी सामाजिक धारणा या परम्परा को निभाते हैं, ऎसा न करने पर वो अपने आप को समाज में नीचा व असभ्य महसूस करता है पर इन परम्पराओं को करने में अमीर आदमी को ज़्यादा परेशानी नहीं है पर गरीब आदमी इन परंपराओं को करने में ओर गरीब हो जाता है इसमे ये बात भी महत्वपूर्ण है जो परम्परा में उपहार(गिफ्ट) का लेन देन होता है वो गरीब व अमीर के लिए अलग अलग होता है वो सामने वाले की हसियत देख कर दिया जाता है इसे आप नकार नहीं सकते, परम्पराओं को लेके आप बहाना भी कर सकते है मैं पहली बार या आखिरी बार कर रहा हूं इसके बाद नहीं करूंगा, या आप ये भी कह सकते है कि इससे लोगों का सम्मान होता है इसलिए मैं ऎसा कर रहा हूं, यदि ऎसा है तो आप सम्मान की परिभाषा नहीं जानते या फिर आप भीड़ का हिस्सा बनने में खुश है, आप समाज में बदलाव लाने की संभावना खो चुके हैं आप निराश व हताश हो चुके है
कया आप शिक्षित है ??

अगर हाँ, तो आपके द्वारा की गई रूढ़िवादी परम्परा अंपढ़ व पढ़े लिखे लोगो पर व्यापक प्रभाव छोड़ती है। 🙏🙏

✍️✍️पावेल ✍️✍️

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