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14/02/2026

#शिवरात्रि

Naam bataiye
17/11/2023

Naam bataiye

न्यूजीलैंड के आंखो में जो नामी उस सब का कारण सामी है      completed
16/11/2023

न्यूजीलैंड के आंखो में जो नामी उस सब का कारण सामी है completed

And finally
15/11/2023

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Sorry 😂😂
15/11/2023

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Koi to hai daya 🤣🤣😂😂
14/11/2023

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Paisa hi Paisa 😂🤣
14/11/2023

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Music 😂😂🤣🤣
13/11/2023

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 #पाटण_की_रानी_रुदाबाई जिसने सुल्तान बेघारा के सीने को फाड़ कर दिल निकाल लिया था, और कर्णावती शहर के बिच में टांग दिया थ...
06/09/2022

#पाटण_की_रानी_रुदाबाई जिसने सुल्तान बेघारा के सीने को फाड़ कर दिल निकाल लिया था, और कर्णावती शहर के बिच में टांग दिया था, और धड से सर अलग करके पाटन राज्य के बीचो बीच टांग दिया था।

गुजरात से कर्णावती के राजा थे, राणा वीर सिंह वाघेला ( #सोलंकी ),इस राज्य ने कई तुर्क हमले झेले थे, पर कामयाबी किसी को नहीं मिली, सुल्तान बेघारा ने सन् 1497 पाटण राज्य पर हमला किया राणा वीर सिंह वाघेला के पराक्रम के सामने सुल्तान बेघारा की 40000 से अधिक संख्या की फ़ौज २ घंटे से ज्यादा टिक नहीं पाई, सुल्तान बेघारा जान बचाकर भागा।

असल मे कहते है सुलतान बेघारा की नजर रानी रुदाबाई पे थी, रानी बहुत सुंदर थी, वो रानी को युद्ध मे जीतकर अपने हरम में रखना चाहता था। सुलतान ने कुछ वक्त बाद फिर हमला किया।

राज्य का एक साहूकार इस बार सुलतान बेघारा से जा मिला, और राज्य की सारी गुप्त सूचनाएं सुलतान को दे दी, इस बार युद्ध मे राणा वीर सिंह वाघेला को सुलतान ने छल से हरा दिया जिससे राणा वीर सिंह उस युद्ध मे वीरगति को प्राप्त हुए।

सुलतान बेघारा रानी रुदाबाई को अपनी वासना का शिकार बनाने हेतु राणा जी के महल की ओर 10000 से अधिक लश्कर लेकर पंहुचा, रानी रूदा बाई के पास शाह ने अपने दूत के जरिये निकाह प्रस्ताव रखा,

रानी रुदाबाई ने महल के ऊपर छावणी बनाई थी जिसमे 2500 धर्धारी वीरांगनाये थी, जो रानी रूदा बाई का इशारा पाते ही लश्कर पर हमला करने को तैयार थी, सुलतान बेघारा को महल द्वार के अन्दर आने का न्यौता दिया गया।

सुल्तान बेघारा वासना मे अंधा होकर वैसा ही किया जैसे ही वो दुर्ग के अंदर आया राणी ने समय न गंवाते हुए सुल्तान बेघारा के सीने में खंजर उतार दिया और उधर छावनी से तीरों की वर्षा होने लगी जिससे शाह का लश्कर बचकर वापस नहीं जा पाया।

सुलतान बेघारा का सीना फाड़ कर रानी रुदाबाई ने कलेजा निकाल कर कर्णावती शहर के बीचोबीच लटकवा दिया।

और..उसके सर को धड से अलग करके पाटण राज्य के बिच टंगवा दिया साथ ही यह चेतावनी भी दी की कोई भी आक्रांता भारत वर्ष पर या सनातनी महिला पर बुरी नज़र डालेगा तो उसका यही हाल होगा।

इस युद्ध के बाद रानी रुदाबाई ने राजपाठ सुरक्षित हाथों में सौंपकर कर जल समाधि ले ली, ताकि कोई भी तुर्क आक्रांता उन्हें अपवित्र न कर पाए।

ये देश नमन करता है रानी रुदाबाई को, गुजरात के लोग तो जानते होंगे इनके बारे में। हमारे पुर्वजो और विरांगानाये ऐसा कर्म कर सनातन संस्कृति का मान रखा है और वैदिक धर्म को बचाया है।
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Gadar2  ्रेम_कथाआमिर खान!....लगान नजदीकी सिनेमाघरों में साथ आएगी तो क्या गदर....कमाई नहीं करेगी?....करेगी और जरूर करेगी।...
22/08/2022

Gadar2
्रेम_कथा
आमिर खान!....लगान नजदीकी सिनेमाघरों में साथ आएगी तो क्या गदर....कमाई नहीं करेगी?....करेगी और जरूर करेगी। गदर को बॉक्स ऑफिस का कोई भी क्लेश कमाई करने से नहीं रोक सकता है।

गदर-एक प्रेम कथा! 15 जून 2001 यानी बीस साल पहले आज के दिन नज़दीकी सिनेमाघरों में पहुँची थी और भयँकर गदर काटा था।

दर्शक बावले हो चले थे। भारतीय सिनेमा इतिहास की पहली फ़िल्म रही होगी। जिसके आठ शो चलाए गए। फिर भी दर्शक बेकाबू थे। नज़दीकी सिनेमाघरों के मालिक परेशान, उन्हें समझ न आ रहा था। कि क्या करे? क्या न करें?

15 जून 2001 की सुबह भुवनेश्वर उड़ीसा के नज़दीकी सिनेमाघर मालिक ने निर्देशक अनिल शर्मा को फ़ोन करके पूछा कि सर! आपने क्या बना दिया है? इतना बवाल हो रहा है?

निर्देशक अनिल शर्मा हैरानी भरे स्वर में बोले कि 'क्यों कही दंगा हो गया है?

नहीं सर! लेकिन दर्शकों को काबू करना मुश्किल हो रहा है। जितना पब्लिक अंदर है उससे अधिक बाहर है। दर्शकों से सब्र नहीं हो रहा है। रिपीट वेल्यू अधिक है। पहला शो खत्म कर रहे है। दूसरे में अंदर जा रहे है। नए लोगों को मौका नहीं मिल पा रहा है।

इधर, फ़िल्म समीक्षक वर्ग उल्टियां पर उल्टियां कर रहा था। क्योंकि गदर ने उनका हाजमा बिगाड़ दिया था। अपच हो गई थी। गदर का कंटेंट उन्हें डाइजेस्ट नहीं हुआ। एक समीक्षक ने अखबार को हेड लाइन दी। 'गदर- गटर एक प्रेम कथा' अति राष्ट्रवाद का हैवी डोज।

समीक्षक वर्ग तारा सिंह के झटके को झेल न पाया था। बॉक्स ऑफिस पहले से बेहोश पड़ा था। लोग ट्रक में बैठकर तारा से मिलने आ रहे थे। उसके संवाद गुनगुना रहे थे। गीत बज रहे थे। दर्शकों के लिए उसत्व जैसा माहौल बन गया था।

गदर का सिग्नेचर एक्शन सीक्वेंस हैंडपंप उखाड़ने वाला ठीक से शूट न हुआ। सूरज की रोशनी ने हल्का खलल डाल दिया था। परन्तु इससे पहले हुई डायलॉगबाजी ने सब संभाल दिया था।

अमीषा पटेल की जगह काजोल रहती। जो निर्देशक की पहली पसंद थी। गदर के रोमांच में इजाफा हो जाता।

उस दिन बॉक्स ऑफिस पर लगान न लगाया होता। तो गदर सुनामी ला देती। ऐसा नहीं है कि लगान अच्छी फिल्म न थी। बहुत अच्छी फिल्म थी। लेकिन गदर का माहौल बिगाड़ने की क्या जरूरत थी। एक हफ्ता जल्दी/देरी से लगान वसूल कर लेते। क्योंकि लगान से 270 स्क्रीन काउंट कम हो गए थे। सोलो रिलीज में गदर भारतीय सिनेमा इतिहास की सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्म हो जाती।

अगर गदर आज के परिवेश में रिलीज होती तो बाहुबली के सिंहासन को टक्कर दे रही होती या कहे बॉक्स ऑफिस के पार्किंग लॉट में तारा सिंह का ट्रक खड़ा होता। मल्टीप्लेक्स और सिंगल स्क्रीन नजदीकी सिनेमाघर जाम हो चुके होते। ख़ैर।

15 जून 2001 के दिन केंद्र में कांग्रेस की सरकार होती तो यकीनन गदर सेंसर बोर्ड में पास न होती। उसे लटकाए रखते। या फिर कुछ कट के साथ, बॉलीवुड के संविधान को लागू करने का आदेश दिया जाता।
#गदर #बीससाल

श्रेय - ओम लवानिंया जी

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भगत_सिंह की बैरक की साफ-सफाई करने वाले सफाई कर्मी (वाल्मीकि) का नाम  #बोघा था. भगत सिंह उसको  #बेबे (मां) कहकर बुलाते थे...
16/08/2022

भगत_सिंह की बैरक की साफ-सफाई करने वाले सफाई कर्मी (वाल्मीकि) का नाम #बोघा था. भगत सिंह उसको #बेबे (मां) कहकर बुलाते थे.

जब कोई पूछता कि भगत सिंह ये बोघा तेरी बेबे कैसे हुआ?

तब भगत सिंह कहते,

'मेरा मल-मूत्र या तो मेरी बेबे ने उठाया, या इस भले पुरूष बोघे ने. बोघे में मैं अपनी बेबे (मां) देखता हूं.ये मेरी बेबे ही है."

यह कहकर भगत सिंह बोघे को अपनी बाहों में भर लेता.

भगत सिंह जी अक्सर बोघा से कहते,

"बेबे ! मैं तेरे हाथों की रोटी खाना चाहता हूँ,"

पर बोघा अपनी जाति को याद करके झिझक जाता और कहता,...

"भगत सिंह तू ऊँची जात का सरदार, और मैं एक अदना सा वाल्मीकि, भगतां तू रहने दे, ज़िद न कर."

सरदार भगत सिंह भी अपनी ज़िद के पक्के थे, फांसी से कुछ दिन पहले जिद करके उन्होंने बोघे को कहा....

"बेबे! अब तो हम चंद दिन के मेहमान हैं, अब तो इच्छा पूरी कर दे!"

बोघे की आँखों में आंसू बह चले. रोते-रोते उसने खुद अपने हाथों से उस वीर शहीद ए आजम के लिए रोटिया बनाई, और अपने हाथों से ही खिलाई.

भगत सिह के मुंह में रोटी का ग्रस डालते ही बोघे की रुलाई फूट पड़ी.

"ओए भगतां, ओए मेरे शेरा, धन्य है तेरी मां, जिसने तुझे जन्म दिया."

भगत सिंह ने बोघे को अपनी बाहों में भर लिया.

ऐसी सोच के मालिक थे वीर सरदार भगत सिंह जी...

परन्तु आजादी के 75साल बाद भी हम समाज में व्याप्त ऊँच-नीच के भेद-भाव की भावना को दूर करने के लिये वो न कर पाए जो 88 साल पहले भगत सिंह ने किया. ,, हम सभी को भी भगत सिंह जी की तरह जातपात के बंदन से मुक्त होकर समाज के लिए काम करना चाहिए

महान शहीदे आजम को इस देश का सलाम!
जय हिन्द,, ,,इंकलाब जिंदाबाद,, प्रणाम शहीद
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