11/08/2026
वही आंदोलन है, वही जेनजी, वही मांगे... ऊपर के आदेश से बंधे वही पुलिसवाले... लाठी भी वही, पानी की बौछारें भी वही, अश्रुगैस के गोले भी वैसे ही... अटल जी ने कहा था, "सत्ता का चरित्र लगभग एक सा ही होता है।" ठीक ही तो कहा था। पर इन सब के बीच कुछ है जो अलग है...
लाठी खाने के बाद भी बच्चे मुख्यमंत्री की मां को गाली नहीं दे रहे। पुलिस के जवानों का भद्दा मजाक नहीं उड़ाया जा रहा है। उन्हें घेर कर मारा पीटा नहीं जा रहा है। इंस्टा की रील के लिए नंगे नाचने वाले कथित इन्फ्लुएंसर अपने बाप से अधिक उम्र के किसी पुलिस वाले के ऊपर अभद्र टिप्पणियां नहीं कर रहे। क्यों? क्योंकि लड़कों ने आंदोलन में बामी अभद्रों का प्रवेश नहीं होने दिया।
आधी रात को हुए लाठी चार्ज में अनेक बच्चों की हड्डियां टूटी हैं। रांची के अस्पतालों में छात्रों की कराह गूंज रही है। उसके बाद भी कहीं गाली गलौज नहीं है, अश्लील पोस्टर नहीं हैं।
पिछले दिनों पटना में लड़कों पर पानी की बौछार हुई थी, तब वे नाच रहे थे। झारखंड वाले बच्चे भी पानी की बौछारों पर नाचने लगे थे। यह खुश होने की बात तो नहीं है पर एक हल्की मुस्कुराहट तैर गई थी। जवानी का उत्साही मन, पीड़ा में आनंद ढूंढ लेने वाला भारत भाव... सरकारों को इन बच्चों की बात सुन लेनी चाहिए। वैसे भी ये न किसी का इस्तीफा मांग रहे हैं, न मुख्यमंत्री को हटा कर खुद गद्दी पर बैठने का ख्वाब लेकर गए हैं। परीक्षा की गड़बड़ी का मामला है, बात इतनी भी बड़ी नहीं कि न सुनी जा सके।
जंतर मंतर के आंदोलन के समय उग्र हो गए वामी झारखंड के बच्चों के लिए नहीं बोलेंगे। बोलते, पर आंदोलन की डोर उनके हाथ में होती तब बोलते... आंदोलन शिक्षा से हट कर LGBTQ के विशेषाधिकारों पर, आजादी मांगने पर, पाकिस्तानी प्रेम पर, देश तोड़ने के नारे लगाने वालों के समर्थन पर, सनातन परम्पराओं को गाली देने पर होता तब बोलते... लेकिन झारखंड के बच्चों ने उनके एजेंट को खदेड़ दिया, वे अड़ गए कि यह आंदोलन शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं को केंद्र में रख कर ही होगा, फिर वे क्यों ही बोलें। उनका भी दोष नहीं, यह उनका मामला ही नहीं है।
एक प्रश्न हम जैसों से भी हो सकता है कि हम जंतर मंतर वालों के साथ नहीं थे तो इनके साथ क्यों है? इसका उत्तर बहुत सहज है। ये बच्चे भी कल उसी अभद्र भाषा पर उतर जाएं, वैसी ही गालीबाजी करने लगें तो इनके साथ भी कोई संवेदना नहीं रहेगी। वैसी भाषा जब हम अपने बच्चों की नहीं चाहते, अपने छात्रों से नहीं चाहते, तो दूसरे बच्चों की अभद्र भाषा का समर्थन कैसे कर सकते हैं?
झारखंड के बच्चों पर कल खूब लाठियां चली हैं। चलवाने वाले प्रसन्न ही होंगे। राहुल जी मंचो पर छात्रों से संवाद की नौटंकी कर रहे हैं, उनकी पुलिस निहत्थे बच्चों को लाठी से तोड़ रही है। यही राजनीति है...
केंद्र हो या राज्य, पेपर लीक और परिक्षाओं की अनियमितता माथे के कलंक जैसा है। इसका हल निकालना ही होगा... बाकी झारखंड के जेनजी को धन्यवाद कि उन्होंने विश्वास दिलाया, "देश का युवा अभद्र, अश्लील, फूहड़ नहीं है... जो थे, वे अपवाद थे।"