Sarvesh Tiwari Shreemukh

Sarvesh Tiwari Shreemukh युगों युगों से विश्व का कल्याण हो की प्रार्थना करने वाली सभ्यता का वर्तमान हूँ मैं! मैं सर्वेश हूँ।
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वही आंदोलन है, वही जेनजी, वही मांगे... ऊपर के आदेश से बंधे वही पुलिसवाले... लाठी भी वही, पानी की बौछारें भी वही, अश्रुगै...
11/08/2026

वही आंदोलन है, वही जेनजी, वही मांगे... ऊपर के आदेश से बंधे वही पुलिसवाले... लाठी भी वही, पानी की बौछारें भी वही, अश्रुगैस के गोले भी वैसे ही... अटल जी ने कहा था, "सत्ता का चरित्र लगभग एक सा ही होता है।" ठीक ही तो कहा था। पर इन सब के बीच कुछ है जो अलग है...
लाठी खाने के बाद भी बच्चे मुख्यमंत्री की मां को गाली नहीं दे रहे। पुलिस के जवानों का भद्दा मजाक नहीं उड़ाया जा रहा है। उन्हें घेर कर मारा पीटा नहीं जा रहा है। इंस्टा की रील के लिए नंगे नाचने वाले कथित इन्फ्लुएंसर अपने बाप से अधिक उम्र के किसी पुलिस वाले के ऊपर अभद्र टिप्पणियां नहीं कर रहे। क्यों? क्योंकि लड़कों ने आंदोलन में बामी अभद्रों का प्रवेश नहीं होने दिया।
आधी रात को हुए लाठी चार्ज में अनेक बच्चों की हड्डियां टूटी हैं। रांची के अस्पतालों में छात्रों की कराह गूंज रही है। उसके बाद भी कहीं गाली गलौज नहीं है, अश्लील पोस्टर नहीं हैं।
पिछले दिनों पटना में लड़कों पर पानी की बौछार हुई थी, तब वे नाच रहे थे। झारखंड वाले बच्चे भी पानी की बौछारों पर नाचने लगे थे। यह खुश होने की बात तो नहीं है पर एक हल्की मुस्कुराहट तैर गई थी। जवानी का उत्साही मन, पीड़ा में आनंद ढूंढ लेने वाला भारत भाव... सरकारों को इन बच्चों की बात सुन लेनी चाहिए। वैसे भी ये न किसी का इस्तीफा मांग रहे हैं, न मुख्यमंत्री को हटा कर खुद गद्दी पर बैठने का ख्वाब लेकर गए हैं। परीक्षा की गड़बड़ी का मामला है, बात इतनी भी बड़ी नहीं कि न सुनी जा सके।
जंतर मंतर के आंदोलन के समय उग्र हो गए वामी झारखंड के बच्चों के लिए नहीं बोलेंगे। बोलते, पर आंदोलन की डोर उनके हाथ में होती तब बोलते... आंदोलन शिक्षा से हट कर LGBTQ के विशेषाधिकारों पर, आजादी मांगने पर, पाकिस्तानी प्रेम पर, देश तोड़ने के नारे लगाने वालों के समर्थन पर, सनातन परम्पराओं को गाली देने पर होता तब बोलते... लेकिन झारखंड के बच्चों ने उनके एजेंट को खदेड़ दिया, वे अड़ गए कि यह आंदोलन शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं को केंद्र में रख कर ही होगा, फिर वे क्यों ही बोलें। उनका भी दोष नहीं, यह उनका मामला ही नहीं है।
एक प्रश्न हम जैसों से भी हो सकता है कि हम जंतर मंतर वालों के साथ नहीं थे तो इनके साथ क्यों है? इसका उत्तर बहुत सहज है। ये बच्चे भी कल उसी अभद्र भाषा पर उतर जाएं, वैसी ही गालीबाजी करने लगें तो इनके साथ भी कोई संवेदना नहीं रहेगी। वैसी भाषा जब हम अपने बच्चों की नहीं चाहते, अपने छात्रों से नहीं चाहते, तो दूसरे बच्चों की अभद्र भाषा का समर्थन कैसे कर सकते हैं?
झारखंड के बच्चों पर कल खूब लाठियां चली हैं। चलवाने वाले प्रसन्न ही होंगे। राहुल जी मंचो पर छात्रों से संवाद की नौटंकी कर रहे हैं, उनकी पुलिस निहत्थे बच्चों को लाठी से तोड़ रही है। यही राजनीति है...
केंद्र हो या राज्य, पेपर लीक और परिक्षाओं की अनियमितता माथे के कलंक जैसा है। इसका हल निकालना ही होगा... बाकी झारखंड के जेनजी को धन्यवाद कि उन्होंने विश्वास दिलाया, "देश का युवा अभद्र, अश्लील, फूहड़ नहीं है... जो थे, वे अपवाद थे।"

रामायण पचास से अधिक भाषाओं में रिलीज हो रही है। लगभग साठ हजार स्क्रीन पर एक साथ... सौ से अधिक देशों में... यह सुखद है। क...
08/08/2026

रामायण पचास से अधिक भाषाओं में रिलीज हो रही है। लगभग साठ हजार स्क्रीन पर एक साथ... सौ से अधिक देशों में... यह सुखद है। किसी भी पौराणिक कथा को एक साथ इतने बड़े फलक पर दिखाने का यह पहला ही प्रयास है। यूरोप अपने इतिहास को लेकर ऐसे प्रयास करता रहा है, पर हमारी ओर से यह पहली बार हो रहा है। रामकथा को दुनिया भर के सामने ले जाने का यह भव्य प्रयास कितना सफल होगा यह तो बाद में पता चलेगा, पर यदि सफल हुआ तो इसका असर ठीक ठाक होगा।
संभव है कि हमें कुछ अभिनेता पसंद न हों। यह भी संभव है कि कुछ दृश्य हमें सुंदर न लगें। अनेकों स्थान पर कमियां भी हो सकती हैं। वैसे भी, फिल्म बनाने वाले लोग कोई देवता तो हैं नहीं जो कमियां न छूटेगी... इसके बाद भी यह बड़ा और सुंदर प्रयास है। यदि यह फिल्म उम्मीद से आधी सुन्दर भी बनी हो, तो भी बहुत बड़ा असर छोड़ेगी।
माता की इच्छा का सम्मान करते हुए राज्य ठुकरा कर वनवास स्वीकार करते राम, बड़े भाई को उनका अधिकार देने के लिए राजधानी से वन की ओर पदयात्रा करते भरत, बड़े भाई के पीछे पीछे वन के दुख भोगने निकले लक्ष्मण, पुत्र के प्रेम में प्राण त्यागते राजा दशरथ की कथा यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका के दर्शकों के लिए नई तो होगी ही, वे इसी बहाने भारत और सनातन के आदर्श से परिचित हो सकेंगे। यह बुरा तो नहीं...
सीता की प्रतिष्ठा के लिए अपने युग के सबसे बड़े साम्राज्य से लड़ने निकले दो भाइयों से दुनिया बहुत कुछ सीख सकती है। दुनिया सीखेगी कि अनुजवधु को हर लेने वाले बाली को स्वयं आगे बढ़ कर दंडित करना धर्म है। दुनिया करुणा सिंधु का पत्नी या भाई के लिए रोना भी देखेगी, और रावण और कुंभकर्ण जैसे दैत्यों के समक्ष तन कर खड़े होना भी... दुनिया देखेगी कि जीते हुए राज्य को भी वहीं के व्यक्ति को सौंप कर वापस लौटते राम कैसे बेदाग निकलते हैं लंका से... दुनिया देखे तो, कि धर्म कहते किसे हैं...
पारिवारिक मूल्यों के ज्ञान के लिए, मानव मूल्यों के लिए संसार को अंततः सनातन की ओर ही देखना होगा... सत्य असत्य, पाप पुण्य, धर्म अधर्म को लेकर भारतीय दृष्टिकोण जिस कथा में सर्वाधिक स्पष्ट दिखता है, वह कथा दुनिया भी सुने, देखे, समझे... उनका भी कल्याण ही होगा...

कांवर     पहली बार शायद सन दो हजार तीन में देखा था पश्चिम उत्तर प्रदेश के कांवरियों को। हमारे यहां की कांवर परम्परा से ब...
06/08/2026

कांवर

पहली बार शायद सन दो हजार तीन में देखा था पश्चिम उत्तर प्रदेश के कांवरियों को। हमारे यहां की कांवर परम्परा से बिल्कुल ही अगल... बड़ा आश्चर्य हुआ था तब। अनेकों प्रश्न मन में उभरे थे। ये लोग चप्पल जूता पहन कर कांवर क्यों उठाते हैं, हमारी ओर तो खाली पैर जाने की रीत है। ये लोग जल लेकर घर की ओर क्यों आते हैं, हमारी ओर तो उधर से ही बाबा को चढ़ा दिया जाता है। ये लोग लहसुन प्याज भी खाते हैं, शिव शिव... बालक मन था, और लगता था कि जो हमारे यहां की परम्परा है वही सही है, वैसा ही होना चाहिए...
बहुत बाद में बात समझ आई। समझ आया कि हर इलाके की अपनी अलग अलग परंपराएं हैं, जो धीरे धीरे वहां की भौगोलिक, धार्मिक और आर्थिक स्थिति के आधार पर विकसित हुई है। आप देश के एक हिस्से की परम्परा के आधार पर दूसरे हिस्से के लोगों को तौलेंगे तो उनके साथ न्याय नहीं कर पाएंगें। उस ओर ऐसी ही परम्परा विकसित हुई है उन्होंने प्रारंभ से ऐसा ही देखा, सिखा है...
आजकल भी जब एक कांवरिए को सौ सौ लीटर जल लेकर आते देखता हूं तो आश्चर्य होता है। इस तरह के हठ की क्या जरूरत है, समझ नहीं आता। पर उनकी आस्था है, उनके मन को यदि ऐसा कर के संतोष मिलता है तो यही सही। इसमें कोई बुराई तो नहीं ही है।
कुछ लोगों की कांवरियों को लेकर की गई आपत्तियां देखता हूं। उनके हुड़दंग की बात होती है, मारपीट की बात होती है, शोर शराबे और डीजे आदि की बात... सोचता हूं, क्या ये लोग केवल कांवर उठाने के समय ही शोरगुल, मारपीट करते हैं।
व्यक्ति तीर्थयात्रा के समय भी अपने मूल चरित्र के अनुसार ही व्यवहार करता है। ऐसा नहीं कि कांवर उठा लिया तो बिल्कुल ही बदल जाएगा। वह जैसा है वैसा ही रहेगा। सामान्य दिनों में भी तो लोगों के हुड़दंग की खबरें आती हैं। पहाड़ों में जा कर हुड़दंग करते लोग, सड़को पर थार आदि गाड़ियों से दहशत मचाते लोग, एक साथ दर्जनों मोटरसाइकल लेकर सड़को पर स्टंट करते लोग इसी देश इसी समाज के ही तो हैं। वे जब कांवर उठाएंगे तो क्या बदल जाएंगे? सो मामला कांवर का नहीं, व्यक्ति के चरित्र का है।
लेकिन इन चंद लोगों के व्यवहार के आधार पर यदि कोई सभी कांवरियों को हुड़दंगी कह रहा है तो फिर वह दूसरे नशे में है। होते हैं कुछ हुड़दंग मचाने वाले भी, पर अधिकांश श्रद्धा लेकर ही निकलते हैं। अपनी किसी विशेष कामना के साथ, किसी पुरानी इच्छा की पूर्ति पर कृतज्ञता से भरे हुए... और ऐसे लोग कभी दूसरों के लिए पीड़ा का कारण नहीं बनते।
महादेव की कृपा पाने निकले सभी कांवरियों को शुभकामनाएं। महादेव उनकी सुनें, उनका कल्याण करें...

सर्वेश!
गोपालगंज, बिहार।

करुणा सागर पंडा जी की पुस्तक मेरे लिए इस कारण से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसकी प्रस्तावना मैंने ही लिखी है। पुस्तक के पह...
05/08/2026

करुणा सागर पंडा जी की पुस्तक मेरे लिए इस कारण से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसकी प्रस्तावना मैंने ही लिखी है। पुस्तक के पहले पाठक हम हैं, और यकीनन मुझे यह बहुत पसंद आई है।
लेखक की भाषा निःसंदेह सुंदर है, और उन्होंने विषय को लेकर ठीक ठाक रिसर्च भी की है। पुस्तक ऐसे विषय पर है जिसपर अब भी हिन्दी पट्टी के अधिकांश लेखक बात करने से बचते हैं। पर करुणा सागर जी ने लिखा, और खूब लिखा है।
पुस्तक पढ़ी जानी चाहिए, इसपर चर्चा होनी चाहिए। यदि आपकी रूचि पुस्तकों में है तो पढ़ियेगा, अच्छी लगेगी। अमेजन लिंक टिप्पणी में है।
और करुणा भइया को बहुत बहुत बधाई। पहली पुस्तक प्रकाशित होने के आनंद से परिचय है मेरा, प्रसन्न तो होंगे ही आप... आनंद बना रहे 🙏

इस देश में गंगा केवल एक नदी का नाम नहीं है, हर बहती धारा गंगा है, बहता जल गंगाजल है... आप सरजू जी से जल भरते काँवरियों स...
04/08/2026

इस देश में गंगा केवल एक नदी का नाम नहीं है, हर बहती धारा गंगा है, बहता जल गंगाजल है... आप सरजू जी से जल भरते काँवरियों से पूछिए, वे कहेंगे कि गंगाजल लेकर जा रहे हैं। नारायणी के तट पर स्नान करने जा रहे किसी तीर्थ यात्री से पूछिए, वे कहेंगे कि गंगा नहाने जा रहे। गंडक के कटाव में घर गँवा चुके व्यक्ति से पूछिए, वह कहेगा कि गंगा जी काट ले गयीं... सब गंगा मईया ही हैं... जमुना, नारायणी, सरजू, सोन, कोसी, कमला सब गंगाजी... सत्यनारायण की कथा कहते पंडितजी चार अंगुल रक्षासूत्र तोड़ कर नारायण को अर्पित करते हैं और पढ़ते हैं - वस्त्र अभावे शुकतम समर्पयामि... वस्त्र नहीं है देवता, सूत को ही वस्त्र मान कर कृपा कीजिये... अब यजमान के पास वस्त्र खरीदने की सामर्थ्य नहीं तो क्या वाह कथा नहीं सुनेगा? गंगा जी दूर हैं तो क्या वह अपने गाँव के भोले बाबा को जल नहीं चढ़ाएगा? गंड़की के जल को ही गंगाजल मानिये और कृपा का प्रसाद दीजिए बाबा...
लोक के लिए गंगा मईया भी कम 'जगता' देवी नहीं रहीं। जगता बोले तो जागृत... जो भक्त की आर्त पुकार शीघ्र सुन ले... संतानहीन देवियों को सबसे अधिक भरोसा गंगा मईया पर ही रहा है... गंगा माँ हैं न, माँ होने का सुख उनसे अधिक कौन जानेगा भला? और फिर जिसके पास जो सम्पत्ति होगी वही न देगा... कमर भर जल में खड़े हो कर घंटों गोहराती देवियां अब भी दिखती हैं... गंगा मईया न सुनती हों, ऐसा तो नहीं हो सकता।
भोजपुरिया जवार में एक बड़ा पुराना सोहर( बच्चों के जनम के समय गाया जाने वाला गीत) है जिसमें अयोध्या की महारानी कौशल्या गंगा में खड़ी हो कर उनसे संतान मांग रही हैं... उनके अश्रुओं से द्रवित होती गंगा उन्हें आशीष देती हैं और फिर संसार को मिलते हैं राम। शास्त्रों में ऐसी कथा हो न हो, लोक में है... लोक कथाओं को हँस कर ख़ारिज कर देने वाला मन भी उस गीत को सुन कर भीज जाता है... गंगा माँ हैं, सचमुच माँगा होगा कौशल्या मईया ने... हमारी माएं गलत थोड़ो कहेंगी...
लोक में कहावत है सब तीरथ बार बार, गंगा सागर एक बार... गंगासागर मतलब वह स्थान जहां गंगा सागर से मिलती हैं। तबतक बूढ़ी हो चुकी होती हैं गंगा मईया... अब उनके स्वभाव में क्रोध नहीं होता, शान्ति होती है... अपनी यात्रा पूरी कर चुकी माता के पास अपने बच्चों के लिए केवल और केवल आशीर्वाद होता है... जैसे बूढ़ी दादियाँ अपने बच्चों को दिन भर आशीषती रहतीं हैं न, वैसे ही... इसी नदी के तट पर पली बढ़ी सभ्यता अपनी इस बुजुर्ग माता पर इतना भरोसा कैसे न करे? उसका आशीष पा लेने के लिए कैसे लालायित न हो?
सावन में गंगाजल ले कर महादेव को चढ़ाने चली भीड़ एक साथ दो देवताओं को प्रसन्न करती है। गंगा स्नान कर के मईया से आशीष पा लिए, जल चढ़ा कर बाबा को प्रसन्न कर लेंगे... सावन का आनंद यही तो है...

सर्वेश!
गोपालगंज, बिहार।

तस्वीर नेट से ही...

सावन का पहला सोमवार! गांव के शिवालय में भोर के तीन बजे से ही भीड़ है। गांव की सड़कों पर महिलाओं का आना जाना लगा हुआ है। ...
03/08/2026

सावन का पहला सोमवार! गांव के शिवालय में भोर के तीन बजे से ही भीड़ है। गांव की सड़कों पर महिलाओं का आना जाना लगा हुआ है। भारत के बज्र मूर्ख इतिहासकारों की तरह आप यह अंदाजा न लगाएं कि पुरुष मंदिर नहीं जाते, वे बस सामाजिक नियमों का पालन करते हुए रुक गए हैं। "मंदिर में जा रही स्त्रियां गांव के नाते बहू हैं, छोटे भाई की पत्नी हैं, चाचियां हैं, भौजाई हैं... क्यों ना कुछ देर के लिए मंदिर उन्हीं के लिए छोड़ दिया जाय। उन्हें मंदिर से वापस आने के बाद भी सौ काम होंगे... छोड़ो, हम बाद में जल चढ़ा लेंगे..." धर्म समाज के प्रति इतना समर्पण, इतनी सहिष्णुता तो सिखा ही देता है। इतनी भी व्यवहारिक समझ न हो तो काहे का धर्म?
भोर में ढाई तीन बजे ही पहुंच कर मंदिर धो गई है कोई महिला। अब तो मंदिर धोने लिए भी प्रतिस्पर्धा है देवियों में, जो पहले जग कर पहुंच जाय... बात केवल सावन की ही नहीं है, बारहों महीने लोग मंदिर धोने पहुंच रहे हैं अब... वृद्ध हो चुके साधु बाबा को इधर दो चार वर्षों से राहत मिल गई है। उनका काम अब लोग ही कर देते हैं। यह बदलाव कम सुखद नहीं...
जल ढारने गए तीर्थयात्रियों का पहला जत्था बाबाधाम से लौटा है आज। बैद्यनाथ धाम पूर्वांचल के लिए हमेशा बाबाधाम रहा। बाबा का घर... शिव लोक में बाबा हैं। झारखंड के वनवासी जिन्हें बूढ़ा बाबा कहते हैं, भोजपुरी वाले भोला बाबा, कासी बिसनाथ वाले भी तो बाबा ही कहते हैं... देश ही बाबा कहता है... हैं भी, उनके यहां से लौटने वाले कांवरिए यूं ही तो इतने प्रसन्न नहीं दिखते...
सबकी झोली भरी हुई है। टोला भर में बांटे जा सकने भर का प्रसाद, माला, हाथ में बांधने वाला कलावा, गमछा, सिंदूर... अपने हाथ से प्रसाद की पुड़िया बना कर पोतों से बटवा रहे बूढ़े को एक एक घर की फिकर है। तिरबेनी घर परसादी जरूर चला जाय। रमेशवा के लिए एगो बढ़िया माला खरीदे हैं, उसके घर भेजवा देना... चनेसर के लिए गमछा... वे प्रसाद नहीं, जैसे अपनी तपस्या का फल बांट रहे हैं। श्रद्धा से भरे, करुणा की मूर्ति जैसे... आंखों के आगे सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगाजी अभी हैं, स्क्रीन पर दिखती भोले बाबा की छवि याद है... क्या हुआ जो मंदिर के गर्भगृह में जा कर जल नहीं चढ़ा सके, उनके नगर में पहुंच गए साध पूरी हो गई... कौन जाने अगली साल तक जांगर रहे न रहे... जवानी में गांव भर से लफड़ा बटोरनेवाला आदमी बुढ़ापे में इतना पवित्र, इतना भावुक कैसे हो जाता है हो? उमर का असर...
तीर्थयात्रियों के जत्थे लौट आएं तो गांव भगवा हो जाता है। जो गए हैं उन्होंने अपने लिए भगवा रंग का कपड़ा खरीदा ही है, बच्चों के लिए भी उसी रंग की गंजी, हाफ पेंट खरीद लाए हैं... अब एक डेढ़ महीने तक माहौल भगवामय रहेगा...
लो... अचानक आ गया झमाझम... हँस पड़े हैं सभी... सावन की सोमारी है, बाबा का अभिषेक कैसे नहीं करेंगे इंद्रदेव भला... मंदिर स्त्रियों से खाली हो रहा है, अब पुरुष भी जा सकते हैं... मंदिर के ऊपर लगे चोंगे से सुरीली ध्वनि आ रही है, सौराष्ट्र देशे विशदेsतिरम्ये.... पूर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधाने...
सावन किसी से जरा भी कम सुंदर नहीं...

सर्वेश तिवारी श्रीमुख
गोपालगंज, बिहार।

रावण सचमुच रावण ही लग रहा है, क्योंकि मैंने इसके पहले यश की कोई फिल्म नहीं देखी। यदि पहले उसकी कोई फिल्म देखे होते तो सं...
01/08/2026

रावण सचमुच रावण ही लग रहा है, क्योंकि मैंने इसके पहले यश की कोई फिल्म नहीं देखी। यदि पहले उसकी कोई फिल्म देखे होते तो संभव है वह भी रावण कम और यश अधिक दिखता। इसमें कुछ भी नया आ अजीब नहीं है, यह सामान्य ही है। इसी तरह लक्ष्मण और मेघनाद भी ठीक लग रहे हैं। अन्य पात्रों के साथ भी कोई दिक्कत नहीं है।
साई पल्लवी घरेलू लगती हैं, और मुझे वे माता सीता के रूप में ठीक ही लग रही हैं। यह जरूरी नहीं था कि आप सीता के रोल के लिए कोई अद्वितीय सुंदरी ढूंढ कर लाते, माता सीता के चरित्र के लिए ऐसी ही सहज और सामान्य दिखने वाली कलाकार की जरूरत थी। रामानंद सागर की रामायण में सीता की भूमिका करने वाली दीपिका भी ऐसी ही सहज थीं...
दिक्कत है तो तनिक भगवान श्रीराम की भूमिका निभा रहे कलाकार में। इसमें कोई शक नहीं कि वे रणबीर कपूर ही लग रहे हैं। इसका कारण यह भी हो सकता है कि हमने उन्हें पहले देखा और अनेक भूमिकाओं में देखा है। और रणवीर इतने बड़े अभिनेता तो नहीं हैं कि खुद को हर रोल में पूरी तरह ढाल लें। वे हर फिल्म में रणवीर ही लगते हैं और यहां भी... फिर भी, भारत के बाहर के दर्शक उन्हें भगवान श्रीराम के रूप में याद रखेंगे। वे सहज, सुंदर दिख ही रहे हैं।
वैसे अगर इस एक खटके को छोड़ दें तो नीतीश तिवारी की रामायण एक सुंदर और भव्य प्रयास है। चार हजार करोड़ का बजट है तो फिर तकनीक के मामले में भी यह फिल्म अबतक की सबसे भव्य फिल्म होगी। रामानंद सागर ने उस पुराने दौर में और बेहद कम बजट में रामायण सीरियल बनाया था। युद्ध के दृश्यों में तीर से तीर टकराने वाले दृश्य उनकी मजबूरी थी, क्योंकि इससे अधिक वे क्या ही शूट कर पाते। पर अब उम्मीद की जा सकती है कि युद्ध के दृश्य भव्य होंगे... डॉ कुमार विश्वास लगे हैं तो इस बात की उम्मीद भी की जा सकती है कि संवादों और दृश्यों में मर्यादपुरुषोतम की गरिमा बनी रहेगी।
ए आर रहमान का दौर बीत चुका है। पहले भी उनके गीतों में पारंपरिक भारतीय संगीत की झलक तो नहीं ही आती थी। रामायण के संगीत के लिए वैसे संगीतकार पर विश्वास करना ठीक होता जिसके संगीत में भारतीय शास्त्रीय संगीत और भारतीय वाद्यों की झलक हो। बाकी देखते हैं, उम्मीद पर दुनिया...
कुल मिला कर बात यह कि फिल्म देखी जाएगी... आलोचना आदि बाद की बात है।

संतोष भइया किसी से नहीं डरते। बाघ से, शेर से, हाथी से... चीता को तो चेन से बांध कर घुमाने का शौक रखते हैं भाई साहब! फिर ...
27/07/2026

संतोष भइया किसी से नहीं डरते। बाघ से, शेर से, हाथी से... चीता को तो चेन से बांध कर घुमाने का शौक रखते हैं भाई साहब! फिर भी किसी न किसी से तो डरते ही होंगे। सोचिये तो, जो पुरुष किसी से नहीं डरता वह किससे डरता है?
खैर... जन्मदिन की ढेरों शुभकामनायें भइया ♥️🙏

27/07/2026

सरकारों से मेरी भी दर्जनों असहमतियाँ हैं, रहेंगी। यूजीसी रेगुलशन, आरक्षण, पेपर लीक, समय पर नियुक्तियां न होना, आदि आदि दर्जनों मुद्दे होंगे जिनसे मेरे बच्चों को भी जूझना होगा। फिर भी मैं यही चाहूंगा कि मेरे बच्चे उस भीड़ का हिस्सा बनने की जगह इस ग्रुप का हिस्सा बनें...

पिछले दिनों जब यूजीसी वाले प्रकरण में सत्ता के समर्थकों ने ही सोशल मिडिया पर हल्ला किया तो कुछ अतिराष्ट्रवादी मित्रों ने...
26/07/2026

पिछले दिनों जब यूजीसी वाले प्रकरण में सत्ता के समर्थकों ने ही सोशल मिडिया पर हल्ला किया तो कुछ अतिराष्ट्रवादी मित्रों ने उन्हें खूब धिक्कारा था। एक दो बिना चेहरे वाली फर्जी आईडी से प्रधानमंत्री जी की जाति का जिक्र हुआ और फिर उसके बहाने सरकार के विरुद्ध बोल रहे हर व्यक्ति की खूब लानत मलामत की गयी थी। याद है?
इस आंदोलन में गालियों का रिकार्ड बना है, पर वे वाले सत्ता समर्थक दिखे नहीं कहीं... किधर गए भाई?

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