10/07/2026
अमेरिका की जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी (George Washington University) के दो मशहूर प्रोफेसर्स प्रोफेसर हुसैन असकरी (Hossein Askari) और रेहमान शेहरजादे (Rehman Scheherazade) ने साल 2010 में एक ऐतिहासिक रिसर्च पेपर पब्लिश किया। इसका नाम था 'How Islamic are Islamic Countries?' यानी मुस्लिम देश कितने इस्लामिक हैं? इन्होंने एक संस्था बनाई जिसका नाम है 'Islamicity Foundation'। इस फाउंडेशन ने हर साल 'Islamicity Index' (इस्लामीयता सूचकांक) जारी करना शुरू किया। लेकिन यहाँ एक बात समझना बेहद जरूरी है। इन प्रोफेसर्स ने इस आधार पर रैंकिंग नहीं बनाई कि किस देश में कितनी मस्जिदें हैं, कितने लोग नमाज़ पढ़ रहे हैं या कितने लोग रोज़ा रख रहे हैं। बल्कि, उन्होंने क़ुरआन और सहीह हदीस से 3,000 से ज्यादा व्यावहारिक और सामाजिक सिद्धांतों (Practical Principles) को निकाला। उन्होंने देखना चाहा कि पैगंबर मोहम्मद (सल्ल.) ने समाज को जीने का, हुकूमत चलाने का और व्यापार करने का जो तरीका सिखाया था, उस पर आज की तारीख में कौन सा देश सबसे ईमानदारी से अमल कर रहा है।"
इस इंडेक्स को मापने के लिए प्रोफेसर्स ने किसी भी देश के सिस्टम को 4 मुख्य हिस्सों में बांटा:
पहला पिलर: आर्थिक सूचकांक (Economic Islamicity Index):
इस्लाम कहता है कि व्यापार में धोखा नहीं होना चाहिए, नाप-तौल में कमी नहीं होनी चाहिए, और धन का बँटवारा ऐसा हो कि कोई भूखा न सोए। इस पिलर में देखा गया कि कहाँ गरीबी कम है, कहाँ आर्थिक इंसाफ है और कहाँ की मार्केट्स पूरी तरह पारदर्शी (Transparent) हैं।
दूसरा पिलर: कानून और शासन (Legal & Governance Index):
इस्लाम का सबसे बड़ा उसूल है 'अदल' यानी इंसाफ। कानून की नज़र में अमीर और गरीब, बादशाह और फकीर सब बराबर होने चाहिए। अदालतें बिना किसी दबाव के काम करें और देश भ्रष्टाचार (Corruption) और रिश्वतखोरी से पाक हो।
तीसरा पिलर: मानव और राजनीतिक अधिकार (Human & Political Rights Index):
इस्लाम हर इंसान की जान, माल और उसकी इज्जत की हिफाजत की गारंटी देता है। इस पिलर में परखा गया कि किस देश में नागरिकों को बोलने की आज़ादी है, महिलाओं और अल्पसंख्यकों (Minorities) के अधिकार सुरक्षित हैं, और लोगों को बुनियादी सुविधाएं जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य मिल रहा है या नहीं।
चौथा पिलर: अंतर्राष्ट्रीय संबंध (International Relations Index):
इसमें देखा गया कि कौन सा देश दुनिया में अमन (Peace) फैलाने, पर्यावरण की रक्षा करने और दूसरे देशों के साथ वादों और संधियों को निभाने में कितना ईमानदार है।"
जब इन चारों पैमानों को मिलाकर फाइनल रैंकिंग तैयार की गई, तो नतीजे हैरान करने वाले थे। टॉप 10 देशों में न्यूजीलैंड, डेनमार्क, आयरलैंड, स्वीडन और नीदरलैंड जैसे देश आए। और सबसे दुखद बात क्या थी ? टॉप 40-50 देशों में भी कोई मुस्लिम बहुल देश अपनी जगह नहीं बना पाया। मुस्लिम देशों में सबसे ऊपर मलेशिया (Malaysia) रहा, जिसकी रैंक 43वीं थी, और उसके बाद यूएई (UAE) और कतर का नंबर आया।
ऐसा क्यों हुआ? इसका जवाब खुद प्रोफेसर हुसैन असकरी ने अपने एक इंटरव्यू में दिया था। उन्होंने कहा था:
'हमने पाया कि कई मुस्लिम देशों में मजहबी रस्में और इबादतें तो बहुत पाबंदी से की जा रही हैं, लेकिन उनका राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक सिस्टम पूरी तरह नाकाम हो चुका है। वहाँ भ्रष्टाचार है, नाइंसाफी है, और इंसानी हुकूक की पामाली है। इसके उलट, न्यूजीलैंड जैसे देशों ने अनजाने में ही सही, लेकिन इस्लाम के उन सामाजिक उसूलों को अपने सिस्टम का हिस्सा बना लिया है, जिसे खुद इस्लाम ने दुनिया को सिखाया था।'
और जानते हैं अपने देश भारत का कौन सा नंबर आया ? 87 वीं रैंक। यह रैंक तब है जब हमारे देश में क़ौमी मिल्ली तंज़ीमों का अंबार है जो यह दावा करती है कि वह दीनी तालीमात और दीनी ख़िदमात को अंज़ाम दे रहे हैं।