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यीशु मसीह और दस कोड़ियों की चंगाई(लूका 17:11–19)एक समय की बात है, जब प्रभु यीशु मसीह यरूशलेम की ओर जा रहे थे। रास्ते में...
18/01/2026

यीशु मसीह और दस कोड़ियों की चंगाई
(लूका 17:11–19)
एक समय की बात है, जब प्रभु यीशु मसीह यरूशलेम की ओर जा रहे थे। रास्ते में वे सामरिया और गलील के बीच के क्षेत्र से होकर गुज़रे। जैसे ही वे एक गाँव के पास पहुँचे, वहाँ उन्हें दस कोढ़ी मिले।
कोढ़ एक बहुत भयानक बीमारी थी। कोढ़ी लोगों को समाज से अलग रहना पड़ता था। कोई उन्हें छूता नहीं था, कोई उनके पास नहीं आता था। वे गाँव से दूर रहते थे और हमेशा दूर से ही पुकारते थे।
जब उन दस कोड़ियों ने यीशु को देखा, तो वे दूर खड़े होकर ऊँचे स्वर में पुकारने लगे,
“हे यीशु, हे गुरू, हम पर दया कर!”
यीशु ने उन्हें देखा और करुणा से भर गए। उन्होंने उनसे कहा,
“जाओ, अपने आप को याजकों को दिखाओ।”
वे अभी रास्ते में ही थे कि अचानक वे शुद्ध हो गए। उनका कोढ़ जाता रहा। उनका शरीर चंगा हो गया।
लेकिन उन दस में से केवल एक व्यक्ति, जो सामरी था, जब उसने देखा कि वह चंगा हो गया है, तो वह ऊँचे स्वर में परमेश्वर की महिमा करता हुआ लौट आया। उसने यीशु के चरणों में गिरकर धन्यवाद किया।
यीशु ने उससे कहा,
“क्या दसों शुद्ध नहीं हुए? फिर बाकी नौ कहाँ हैं?
क्या कोई और नहीं मिला जो लौटकर परमेश्वर की महिमा करे, सिवाय इस परदेशी के?”
फिर यीशु ने उससे कहा,
“उठ, जा; तेरे विश्वास ने तुझे चंगा किया है।”✝️ Bible Story & Miracle Hashtags







6️⃣ चुप्पी भी परमेश्वर का उत्तर हो सकती हैजब परमेश्वर चुप लगता है,तब भी वह हमें अकेला नहीं छोड़ता।संदेश: खामोशी में भी व...
15/01/2026

6️⃣ चुप्पी भी परमेश्वर का उत्तर हो सकती है
जब परमेश्वर चुप लगता है,
तब भी वह हमें अकेला नहीं छोड़ता।
संदेश: खामोशी में भी विश्वास बनाए रखो।
7️⃣ यीशु ने क्रूस पर बदला नहीं, क्षमा चुनी
क्रूस पर भी यीशु ने कहा:
“हे पिता, इन्हें क्षमा कर।”
संदेश: क्षमा आत्मा को आज़ाद करती है।
8️⃣ परमेश्वर पहले दिल देखता है, काम बाद में
दुनिया काबिलियत देखती है,
परमेश्वर चरित्र देखता है।
संदेश: दिल साफ रखो, रास्ते खुलेंगे।
9️⃣ हर आशीष आराम के लिए नहीं, जिम्मेदारी के लिए होती है
जो मिला है, वह सिर्फ हमारे लिए नहीं,
दूसरों के भले के लिए है।
संदेश: आशीष को सेवा बनाओ।
🔟 जीवन का असली उद्देश्य यीशु में पाया जाता है
पैसा, नाम, शोहरत — सब अस्थायी हैं।
सच्ची शांति केवल मसीह में है।
संदेश: यीशु ही जीवन है। ✝️ Bible Story & Miracle Hashtags













यीशु मसीह का चमत्कार: हजारों लोगों को भोजन करानाएक दिन यीशु मसीह झील के किनारे एक सुनसान जगह पर लोगों को परमेश्वर के राज...
13/01/2026

यीशु मसीह का चमत्कार: हजारों लोगों को भोजन कराना
एक दिन यीशु मसीह झील के किनारे एक सुनसान जगह पर लोगों को परमेश्वर के राज्य के बारे में सिखा रहे थे। दूर-दूर से लोग उनके पास आए थे। कोई बीमार था, कोई दुखी, कोई निराश, तो कोई आशा की तलाश में। यीशु मसीह सबकी बातें ध्यान से सुन रहे थे और प्रेम के साथ बीमारों को चंगा कर रहे थे।
धीरे-धीरे दिन ढलने लगा और शाम हो गई। वहाँ बहुत बड़ा जनसमूह था — पुरुष, स्त्रियाँ और बच्चे मिलाकर हजारों लोग। तब यीशु के शिष्य उनके पास आए और बोले,
“प्रभु, यह जगह सुनसान है और समय भी हो गया है। लोगों को जाने दीजिए ताकि ये गाँवों में जाकर अपने लिए भोजन खरीद सकें।”
यीशु मसीह ने करुणा से भरी दृष्टि से लोगों की ओर देखा और शिष्यों से कहा,
“इन्हें जाने की आवश्यकता नहीं है। तुम ही इन्हें खाने को दो।”
यह सुनकर शिष्य हैरान हो गए। उन्होंने उत्तर दिया,
“प्रभु, हमारे पास यहाँ केवल पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ हैं। इतने बड़े जनसमूह के लिए यह कैसे पर्याप्त होंगी?”
उसी समय एक छोटा सा बालक वहाँ आया, जिसके पास पाँच जौ की रोटियाँ और दो मछलियाँ थीं। यीशु मसीह ने उस बच्चे के छोटे से भेंट को प्रेम से स्वीकार किया। फिर उन्होंने रोटियाँ और मछलियाँ अपने हाथों में लीं, स्वर्ग की ओर देखकर परमेश्वर का धन्यवाद किया और उन्हें आशीष दी।
इसके बाद यीशु ने रोटियाँ तोड़कर शिष्यों को दीं और शिष्यों ने उन्हें लोगों में बाँटना शुरू किया। यह देखकर सब चकित रह गए, क्योंकि जितना बाँटा जा रहा था, उतना ही भोजन बढ़ता जा रहा था। हर व्यक्ति ने पेट भरकर भोजन किया — कोई भूखा नहीं रहा।
जब सब लोग तृप्त हो गए, तब यीशु मसीह ने कहा,
“जो टुकड़े बचे हैं उन्हें इकट्ठा करो, ताकि कुछ भी नष्ट न हो।”
शिष्यों ने बचे हुए टुकड़ों को इकट्ठा किया और बारह टोकरी भर गईं। यह देखकर लोग अत्यंत आश्चर्यचकित हुए और कहने लगे,
“निश्चय ही यह वही भविष्यद्वक्ता है, जिसे परमेश्वर ने संसार में भेजा है।”
यह चमत्कार केवल भूखे पेट भरने के लिए नहीं था, बल्कि यह विश्वास, प्रेम और परमेश्वर पर भरोसे का संदेश था। यीशु मसीह ने यह सिखाया कि जब हम अपनी थोड़ी-सी चीज़ भी विश्वास के साथ परमेश्वर को सौंप देते हैं, तो वह उसे आशीष देकर बहुतों के लिए पर्याप्त बना देता है।
जहाँ इंसान को कमी दिखाई देती है, वहाँ परमेश्वर की सामर्थ्य काम करती है। यह घटना हमें सिखाती है कि हमें अपने जीवन में परमेश्वर पर पूरा भरोसा रखना चाहिए और दूसरों की मदद के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए।





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येसु मसीह और यायरस की बेटी(मृत्यु पर जीवन की विजय की कहानी)उस समय का यहूदी देश भय, बीमारी और दुख से भरा हुआ था। लोग तरह-...
13/01/2026

येसु मसीह और यायरस की बेटी
(मृत्यु पर जीवन की विजय की कहानी)
उस समय का यहूदी देश भय, बीमारी और दुख से भरा हुआ था। लोग तरह-तरह की बीमारियों से पीड़ित थे और मृत्यु का डर हर घर में छाया रहता था। उसी समय एक व्यक्ति था जिसका नाम यायरस था। वह यहूदी समाज में एक आदरणीय व्यक्ति था और आराधनालय का प्रधान था। लोगों में उसकी इज़्ज़त थी, लेकिन उस दिन वह सारी प्रतिष्ठा भूलकर टूटे हुए दिल के साथ येसु मसीह के पास आया।
यायरस की इकलौती बेटी थी—लगभग बारह वर्ष की, फूल जैसी कोमल, हँसी से घर को रोशन करने वाली। लेकिन वह अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गई थी। डॉक्टर, वैद्य, दवाइयाँ—सब असफल हो चुके थे। अब उसकी साँसें भी साथ छोड़ने लगी थीं।
दिल में आख़िरी उम्मीद लिए यायरस दौड़ता हुआ येसु के पास पहुँचा। जैसे ही उसने येसु को देखा, वह उनके चरणों में गिर पड़ा और रोते हुए बोला,
“हे गुरु, मेरी बेटी मरने वाली है। कृपया मेरे घर चलिए और उस पर हाथ रखिए, ताकि वह जीवित रहे।”
येसु ने उसकी आँखों में झाँका—वहाँ डर था, लेकिन उससे भी ज़्यादा विश्वास था। येसु बिना कुछ कहे उसके साथ चल पड़े।
रास्ते में भीड़ थी। लोग येसु को छूने, देखने और उनसे चंगाई पाने को आतुर थे। तभी एक स्त्री, जो बारह वर्षों से रक्तस्राव की बीमारी से पीड़ित थी, चुपके से येसु के वस्त्र का किनारा छू लेती है और चंगी हो जाती है। येसु रुक जाते हैं। वे पूछते हैं, “मुझे किसने छुआ?”
यायरस बेचैन हो उठता है। हर पल उसकी बेटी की हालत बिगड़ रही थी। तभी उसके घर से कुछ लोग दौड़ते हुए आते हैं और कहते हैं,
“आपकी बेटी मर गई है। अब गुरु को क्यों कष्ट देते हैं?”
यह सुनते ही यायरस की दुनिया उजड़ जाती है। पैरों तले ज़मीन खिसक जाती है। लेकिन येसु उसकी ओर देखते हुए कहते हैं,
“डर मत, केवल विश्वास रख।”
येसु यायरस के घर पहुँचते हैं। वहाँ रोने-पीटने की आवाज़ें थीं। लोग विलाप कर रहे थे, मातम छाया हुआ था। येसु कहते हैं,
“तुम क्यों रोते हो? बच्ची मरी नहीं, सो रही है।”
लोग उनका मज़ाक उड़ाते हैं। वे जानते थे कि बच्ची मर चुकी है। लेकिन येसु घर के भीतर जाते हैं और केवल तीन शिष्यों—पतरस, याकूब और यूहन्ना—को साथ लेते हैं।
कमरे में बच्ची निश्चल पड़ी थी। माँ-बाप की आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे। येसु बच्ची के पास जाते हैं, उसका हाथ पकड़ते हैं और कोमल लेकिन अधिकार से भरे स्वर में कहते हैं:
“तलीथा कूम!”
अर्थात—“हे बच्ची, मैं तुझसे कहता हूँ, उठ!”
और उसी क्षण—
जो आँखें बंद थीं, वे खुल गईं।
जो शरीर ठंडा पड़ा था, उसमें जीवन दौड़ गया।
बच्ची उठकर बैठ गई और चलने लगी।
माता-पिता स्तब्ध रह गए। खुशी, आश्चर्य और भय—सब एक साथ उमड़ पड़े। येसु ने उनसे कहा कि बच्ची को कुछ खाने को दें और किसी को यह बात न बताएं।
उस दिन यायरस के घर में केवल एक बच्ची ही नहीं जगी—
विश्वास भी जाग उठा, आशा भी जीवित हो गई।
संदेश
यह कहानी हमें सिखाती है कि
येसु मसीह के लिए कोई भी स्थिति असंभव नहीं है
जहाँ मनुष्य की आशा समाप्त हो जाती है, वहाँ परमेश्वर का कार्य शुरू होता है
विश्वास मृत्यु को भी जीवन में बदल सकता है

यीशु मसीह द्वारा लाज़र को जीवित करने की कहानीयह घटना बाइबल के अनुसार एक बहुत ही चमत्कारी और विश्वास को मजबूत करने वाली क...
08/01/2026

यीशु मसीह द्वारा लाज़र को जीवित करने की कहानी
यह घटना बाइबल के अनुसार एक बहुत ही चमत्कारी और विश्वास को मजबूत करने वाली कहानी है। यह कहानी बैतनियाह नामक गाँव की है, जहाँ लाज़र नाम का एक व्यक्ति अपनी दो बहनों, मरथा और मरियम, के साथ रहता था। ये तीनों यीशु मसीह से बहुत प्रेम करते थे और यीशु भी उनसे गहरा स्नेह रखते थे।
एक दिन लाज़र गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। उसकी हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती चली गई। मरथा और मरियम को जब लगा कि अब हालात बहुत खराब हैं, तो उन्होंने तुरंत यीशु मसीह के पास संदेश भिजवाया कि,
“हे प्रभु, जिसे आप प्रेम करते हैं, वह बहुत बीमार है।”
जब यीशु मसीह ने यह संदेश सुना, तो उन्होंने कहा,
“यह बीमारी मृत्यु के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर की महिमा के लिए है, ताकि इसके द्वारा परमेश्वर के पुत्र की महिमा प्रकट हो।”
यीशु वहाँ से तुरंत नहीं गए। उन्होंने दो दिन और उसी स्थान पर रुकना उचित समझा। इस बीच लाज़र की मृत्यु हो गई। उसे कब्र में दफना दिया गया और चार दिन बीत चुके थे।
चार दिन बाद यीशु मसीह बैतनियाह पहुँचे। गाँव में शोक का माहौल था। बहुत से लोग मरथा और मरियम को सांत्वना देने आए हुए थे। जैसे ही मरथा को पता चला कि यीशु आ रहे हैं, वह दौड़कर उनके पास गई और बोली,
“हे प्रभु, यदि आप यहाँ होते तो मेरा भाई न मरता। लेकिन अब भी मैं जानती हूँ कि आप जो कुछ परमेश्वर से माँगेंगे, वह आपको देगा।”
यीशु ने उससे कहा,
“तेरा भाई फिर से जी उठेगा।”
मरथा ने उत्तर दिया,
“हाँ प्रभु, मैं जानती हूँ कि अंतिम दिन पुनरुत्थान में वह जी उठेगा।”
तब यीशु मसीह ने कहा,
“पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ। जो मुझ पर विश्वास करता है, वह मरकर भी जीवित रहेगा।”
इसके बाद मरियम भी आई। वह यीशु के चरणों में गिरकर रोने लगी और वही बात दोहराई,
“प्रभु, यदि आप यहाँ होते, तो मेरा भाई न मरता।”
मरियम और वहाँ मौजूद लोगों का दुःख देखकर यीशु मसीह का हृदय भर आया। बाइबल में लिखा है कि यीशु रो पड़े। यह दिखाता है कि वे केवल परमेश्वर के पुत्र ही नहीं, बल्कि हमारे दुःख को समझने वाले करुणामय प्रभु भी हैं।
यीशु ने पूछा,
“तुमने उसे कहाँ रखा है?”
लोग उन्हें कब्र के पास ले गए। वह एक गुफा थी, जिसके मुँह पर पत्थर रखा हुआ था। यीशु ने कहा,
“पत्थर हटा दो।”
मरथा ने कहा,
“प्रभु, उसे मरे चार दिन हो गए हैं, अब तो दुर्गंध आने लगी होगी।”
यीशु ने उत्तर दिया,
“क्या मैंने तुझसे नहीं कहा था कि यदि तू विश्वास करेगी, तो परमेश्वर की महिमा देखेगी?”
तब पत्थर हटा दिया गया। यीशु ने स्वर्ग की ओर आँखें उठाकर प्रार्थना की और फिर ऊँचे स्वर में कहा,
“लाज़र, बाहर निकल आ!”
और यह एक महान चमत्कार था!
जो लाज़र चार दिन से मरा हुआ था, वह जीवित होकर बाहर निकल आया। उसके हाथ-पाँव कपड़ों से बँधे हुए थे। यीशु ने लोगों से कहा,
“इसे खोल दो और जाने दो।”
यह देखकर वहाँ मौजूद बहुत से लोगों ने यीशु मसीह पर विश्वास किया। यह चमत्कार इस बात का प्रमाण था कि यीशु को मृत्यु पर भी अधिकार है और वे सच्चे जीवनदाता हैं।
संदेश (शिक्षा):
यह कहानी हमें सिखाती है कि चाहे परिस्थिति कितनी ही कठिन क्यों न हो, यीशु मसीह के लिए कुछ भी असंभव नहीं है। जहाँ मनुष्य की आशा समाप्त हो जाती है, वहीं से परमेश्वर का कार्य आरंभ होता है।

उड़ाऊ पुत्र की कहानी (लूका 15:11–32)यीशु मसीह ने एक व्यक्ति की कहानी सुनाई जिसके दो पुत्र थे। छोटा पुत्र अपने पिता से अप...
08/01/2026

उड़ाऊ पुत्र की कहानी (लूका 15:11–32)
यीशु मसीह ने एक व्यक्ति की कहानी सुनाई जिसके दो पुत्र थे। छोटा पुत्र अपने पिता से अपनी विरासत का हिस्सा माँगकर दूर देश चला गया। वहाँ उसने गलत संगति और बुरी आदतों में अपना सारा धन बर्बाद कर दिया। जब देश में अकाल पड़ा तो वह बहुत गरीब हो गया और खाने के लिए तरसने लगा। तब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और वह मन ही मन पछताते हुए अपने पिता के पास लौट आया। उसने सोचा कि वह दास बनकर भी रहने को तैयार है।
लेकिन पिता ने उसे दूर से देखकर गले लगा लिया, उसे माफ कर दिया और खुशी मनाई। पिता ने कहा, “मेरा बेटा खो गया था, अब मिल गया है।”
यह कहानी हमें सिखाती है कि परमेश्वर सच्चे मन से पश्चाताप करने वालों को प्रेम और क्षमा से अपनाता है।

04/01/2026
युवा वर्ग के लिए बाइबल स्टडीआज का युवा वर्ग कई चुनौतियों से घिरा हुआ है। पढ़ाई, करियर, दोस्ती, सोशल मीडिया और भविष्य की ...
04/01/2026

युवा वर्ग के लिए बाइबल स्टडी

आज का युवा वर्ग कई चुनौतियों से घिरा हुआ है। पढ़ाई, करियर, दोस्ती, सोशल मीडिया और भविष्य की चिंता—इन सब के बीच सही रास्ता चुनना आसान नहीं होता। ऐसे समय में बाइबल स्टडी युवाओं के जीवन के लिए एक मजबूत आधार बन सकती है।

बाइबल हमें सिखाती है कि हमारा जीवन परमेश्वर की एक अनमोल देन है। जब युवा लोग नियमित रूप से बाइबल पढ़ते हैं, तो उन्हें सही निर्णय लेने की समझ मिलती है। बाइबल के वचन हमें सच्चाई, धैर्य, प्रेम और आत्म-संयम का मार्ग दिखाते हैं।

युवा अवस्था में मन भटकना स्वाभाविक है, लेकिन बाइबल स्टडी मन और आत्मा को स्थिर करती है। यह हमें गलत संगति, नशे, हिंसा और अनैतिकता से दूर रहने की ताकत देती है। परमेश्वर का वचन हमें याद दिलाता है कि हमारा भविष्य सुरक्षित हाथों में है।

बाइबल स्टडी केवल किताब पढ़ना नहीं है, बल्कि जीवन जीने की कला सीखना है। जब युवा प्रार्थना के साथ बाइबल पढ़ते हैं, तो वे परमेश्वर की आवाज़ को अपने दिल में महसूस करते हैं। इससे आत्मविश्वास बढ़ता है और जीवन का उद्देश्य स्पष्ट होता है।

युवाओं को चाहिए कि वे अकेले ही नहीं, बल्कि समूह में भी बाइबल स्टडी करें। समूह में अध्ययन करने से सवाल पूछने, अनुभव बाँटने और एक-दूसरे को प्रोत्साहित करने का अवसर मिलता है। इससे आपसी प्रेम और विश्वास भी मजबूत होता है।

अंत में, बाइबल स्टडी युवाओं को एक अच्छा इंसान, जिम्मेदार नागरिक और सच्चा विश्वास करने वाला बनाती है। जो युवा आज परमेश्वर के वचन को अपने जीवन में जगह देते हैं, वही कल समाज के लिए एक आशीष बनते हैं।

हमारे पेज को फोलो किजिए।

अंधे की आँखें खुल गईं(बाइबल – यूहन्ना 9 अध्याय पर आधारित)यरूशलेम के पास एक रास्ते के किनारे एक आदमी बैठा था, जो जन्म से ...
03/01/2026

अंधे की आँखें खुल गईं

(बाइबल – यूहन्ना 9 अध्याय पर आधारित)

यरूशलेम के पास एक रास्ते के किनारे एक आदमी बैठा था, जो जन्म से अंधा था। वह लोगों से भीख माँगकर अपना जीवन चलाता था। लोग उसे देखकर अकसर कहते थे,
“यह ज़रूर किसी पाप की सज़ा भुगत रहा है।”

एक दिन प्रभु यीशु मसीह अपने चेलों के साथ वहाँ से गुज़रे। चेलों ने उनसे पूछा,
“गुरुजी, यह आदमी अंधा क्यों पैदा हुआ? इसके अपने पापों के कारण या इसके माता-पिता के?”

यीशु ने उत्तर दिया,
“न तो इसके पापों के कारण और न इसके माता-पिता के, बल्कि इसलिए कि परमेश्वर के काम इसमें प्रकट हों।”

फिर यीशु ने ज़मीन पर थूका, मिट्टी से कीचड़ बनाया और वह कीचड़ उस अंधे की आँखों पर लगाया। उन्होंने उससे कहा,
“जाओ, सिलोह के कुंड में जाकर धो लो।”

वह आदमी वहाँ गया और जैसे ही उसने अपनी आँखें धोईं—
✨ उसे दिखाई देने लगा! ✨

वह खुशी से चिल्लाने लगा। उसके पड़ोसी और जो लोग उसे पहले अंधा देखते थे, हैरान होकर कहने लगे,
“क्या यह वही आदमी नहीं है जो भीख माँगता था?”

उसने कहा,
“हाँ, मैं वही हूँ, लेकिन अब मैं देख सकता हूँ। यीशु ने मुझे चंगा किया है।”

बाद में वह आदमी फिर से यीशु से मिला। यीशु ने उससे पूछा,
“क्या तुम मनुष्य के पुत्र पर विश्वास करते हो?”

उसने कहा,
“हे प्रभु, वह कौन है, ताकि मैं उस पर विश्वास करूँ?”

यीशु ने कहा,
“तुम उसे देख चुके हो, और जो तुमसे बात कर रहा है वही है।”

तब वह आदमी झुक गया और बोला,
“हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ।”

---

संदेश

यह कहानी हमें सिखाती है कि:

यीशु मसीह केवल आँखों को ही नहीं, दिलों को भी रोशनी देते हैं

परमेश्वर दुखी और गरीब लोगों को कभी नहीं भूलता

सच्चा विश्वास जीवन को बदल देता है ✝️

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