03/07/2026
📖 कहानी: नीयत और परमात्मा
मुख्य पात्र (Characters)
राजू (पापा): एक महात्मा स्वभाव के पुरुष, जिनकी नीयत हमेशा साफ़ और पवित्र रहती है।
कीर्ति (मम्मी): राजू की पत्नी, जिनकी नीयत में हमेशा उतार-चढ़ाव बना रहता है।
धोला (भतीजा): एक समझदार और आध्यात्मिक सोच रखने वाला बालक।
सासू माँ (दादी): घर की बुजुर्ग, जो सही-गलत की समझ रखती हैं।
दृश्य: रसोईघर की राजनीति
एक दिन की बात है, कीर्ति रसोई में रात का खाना बना रही थी। रोटी बनाते समय उसके मन में भेदभाव आ गया। उसने अपने और अपने पति (राजू) के लिए तो बहुत अच्छी, गोल और मुलायम 5-7 रोटियाँ सेक कर अलग रख लीं। लेकिन जब बाकी परिवार के सदस्यों की बारी आई, तो उसने बेहद अजीब-गरीब ढंग की, बेमन से बनी रोटियाँ तैयार कीं।
कीर्ति को लगा कि उसे कोई नहीं देख रहा, लेकिन रसोई के बाहर खड़े होकर धोला और उसकी सासू माँ यह सब देख रहे थे।
संवाद: मन की निराशा और ज्ञान की सीख
अपनी बहू की ऐसी संकीर्ण सोच और भेदभाव देखकर सासू माँ का मन बहुत उदास हो गया। वे निराश होकर वहीं बैठ गईं। अपनी दादी को इस तरह दुखी देख, भतीजा धोला उनके पास गया और उन्हें समझाते हुए एक बहुत ही गहरी और ज्ञान की बात कही।
धोला ने कहा:
"दादी जी, आप निराश मत होइए। इस संसार में जब भगवान को कुछ देखना या परखना होता है ना, तो वे खुद सामने नहीं आते। वे किसी भी आम इंसान के अंदर (उसकी आँखों के जरिए) समाकर सब कुछ देख लेते हैं।"
उसने बात को आगे बढ़ाते हुए एक सुंदर उदाहरण दिया:
"उदाहरण के लिए, अभी-अभी जो नज़ारा रसोई में हम दोनों देख रहे थे... वह सिर्फ हमने ही नहीं देखा। उस वक्त हमारे और चाची के भीतर विराजमान 'परमात्मा' भी चुपचाप सब कुछ देख रहे थे। इंसान से तो चालाकी की जा सकती है दादी, लेकिन उस सर्वव्यापी ईश्वर से कुछ नहीं छिपता।"
कहानी की सीख (Moral)
हम एकांत में जो भी अच्छा या बुरा कर्म करते हैं, उसे कोई और देखे या न देखे, हमारे भीतर बैठा परमात्मा हमेशा देख रहा होता है। इसलिए हमारी नीयत हमेशा साफ़ होनी चाहिए।
लेखक= देव आशीष