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19/02/2026

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ये वाली वीडियो किस किस ने देख ली
28/01/2026

ये वाली वीडियो किस किस ने देख ली

ये चड्डी वाला करेज बहुत पॉपलर हो गया है 🤣 ♥️ सभी वायरल MMS का फुल विडियो यहां देखे ♥️👇👇👇👇👇👇👇Link profile ke bio me hainJ...
25/01/2026

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22/01/2026

बाइक कितनी साल पुरानी है ओर इसका इंजन कैसा होगा बताओ।

जैसा करोगे वैसा भरोगे, यह कहावत सदियों से कही जाती रही है और समय-समय पर जीवन के कई उदाहरण इस बात की पुष्टि भी करते हैं। ...
20/01/2026

जैसा करोगे वैसा भरोगे, यह कहावत सदियों से कही जाती रही है और समय-समय पर जीवन के कई उदाहरण इस बात की पुष्टि भी करते हैं। आज जो घटना चर्चा में है, वह केवल एक अमीर उद्योगपति के निजी जीवन की कहानी नहीं है, बल्कि सत्ता, संपत्ति, रिश्तों, अहंकार और कर्म के आपसी संबंधों पर सोचने का अवसर देती है। बात हो रही है गौतम सिंघानिया की, जिन्हें देश के बड़े बिजनेस टाइकून में गिना जाता है और जो रेमंड ग्रुप के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर हैं। उनके साथ उनकी पत्नी नवाज मोदी सिंघानिया भी इस समय सुर्खियों में हैं, क्योंकि दोनों के बीच तलाक की प्रक्रिया चल रही है। तलाक अपने आप में कोई नई या असामान्य बात नहीं है, लेकिन जिस तरह से यह मामला सामने आया है, उसने समाज का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार तलाक के सेटलमेंट में नवाज मोदी सिंघानिया ने गौतम सिंघानिया की कुल संपत्ति का पचहत्तर प्रतिशत हिस्सा मांगा है। गौतम सिंघानिया की मौजूदा नेटवर्थ लगभग एक दशमलव चार अरब डॉलर बताई जाती है, जो भारतीय मुद्रा में करीब ग्यारह हजार छह सौ साठ करोड़ रुपये के आसपास बैठती है। इस हिसाब से देखा जाए तो सेटलमेंट की मांग लगभग आठ हजार सात सौ पैंतालीस करोड़ रुपये के आसपास पहुंचती है। आंकड़े सुनने में भले ही चौंकाने वाले लगें, लेकिन इससे ज्यादा चौंकाने वाली वह पृष्ठभूमि है, जिसे अक्सर लोग भूल जाते हैं या नजरअंदाज कर देते हैं।

रेमंड ग्रुप कोई ऐसा साम्राज्य नहीं है जो एक ही पीढ़ी में खड़ा हो गया हो। इस कंपनी की नींव रखने और इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने में गौतम सिंघानिया के पिता, विजयपत सिंघानिया का सबसे बड़ा योगदान रहा है। विजयपत सिंघानिया न केवल एक सफल उद्योगपति रहे, बल्कि उन्होंने अपने जीवन में अनुशासन, परिश्रम और जोखिम उठाने की हिम्मत का परिचय दिया। उन्होंने वह दौर देखा, जब व्यापार खड़ा करना आसान नहीं था और हर कदम पर चुनौतियां थीं। अपने बेटे और परिवार के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा और जीवन इस साम्राज्य को खड़ा करने में लगा दिया।

कहा जाता है कि जब विजयपत सिंघानिया ने कारोबार की बागडोर अपने बेटे को सौंपी, तब रेमंड ग्रुप की नेटवर्थ करीब बारह हजार करोड़ रुपये के आसपास थी। यह किसी भी मायने में छोटी उपलब्धि नहीं थी। एक पिता के लिए इससे बड़ी संतुष्टि शायद ही कोई और हो सकती है कि वह अपने बेटे को एक मजबूत विरासत सौंप रहा है। लेकिन दुर्भाग्यवश, यहीं से रिश्तों में दरार की कहानी शुरू होती है। कारोबार बेटे के हाथ में आने के बाद पिता और पुत्र के बीच मतभेद बढ़ने लगे। शुरुआत में ये मतभेद सामान्य व्यावसायिक मतभेद जैसे ही रहे होंगे, लेकिन धीरे-धीरे ये इतने गहरे हो गए कि पारिवारिक रिश्तों की नींव ही हिल गई।

आरोप लगाए जाते हैं कि गौतम सिंघानिया ने अपने ही पिता को न केवल कंपनी से अलग किया, बल्कि उनके अधिकार भी छीन लिए। यहां तक कहा जाता है कि उन्हें उनके ही बनाए हुए घर से बाहर निकाल दिया गया। जिस जेके हाउस का निर्माण विजयपत सिंघानिया ने अपने परिवार के लिए कराया था, वह देश के सबसे महंगे और भव्य आवासों में गिना जाता है। सैंतीस मंजिला इस इमारत को उन्होंने अपने परिश्रम और सपनों से खड़ा किया था, लेकिन उसी घर से उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया गया। जिन सुविधाओं के साथ उन्होंने अपना जीवन जिया था, वे एक-एक करके उनसे छिनती चली गईं।

कभी निजी जेट में सफर करने वाले विजयपत सिंघानिया को लेकर यह भी कहा गया कि एक समय ऐसा आया जब वे साधारण जीवन जीने को मजबूर हो गए। आज उनकी उम्र पचासी वर्ष के आसपास बताई जाती है और वे किराए के मकान में रहते हैं। यह स्थिति किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को सोचने पर मजबूर कर सकती है कि जीवन कितना अनिश्चित है। आज जो व्यक्ति अरबों की संपत्ति का मालिक था, वही परिस्थितियों के चलते साधारण जीवन जीने को विवश हो गया। यह कहानी केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता का आईना भी है, जिसमें सत्ता और धन के आगे रिश्तों को गौण समझ लिया जाता है।

ऐसे में जब आज गौतम सिंघानिया के निजी जीवन में उथल-पुथल मची हुई है और तलाक के दौरान संपत्ति का बड़ा हिस्सा मांगा जा रहा है, तो समाज के एक वर्ग में यह चर्चा स्वाभाविक है कि क्या यह वही कर्मों का फल है, जिसकी बात हमारे बुजुर्ग अक्सर किया करते थे। यह सवाल किसी के प्रति नफरत या दुर्भावना से नहीं, बल्कि जीवन के नैतिक पहलुओं पर सोचने के लिए उठता है। जब एक व्यक्ति अपने ही पिता के साथ कठोर व्यवहार करता है, उनके त्याग और योगदान को नजरअंदाज करता है, तो क्या जीवन कभी न कभी उससे इसका हिसाब नहीं मांगता।

यहां यह भी समझना जरूरी है कि किसी भी घटना को केवल एक ही दृष्टिकोण से देखना सही नहीं होता। हर कहानी के कई पहलू होते हैं और बाहर से देखने वालों के पास पूरी सच्चाई नहीं होती। फिर भी, जो तथ्य सार्वजनिक रूप से सामने आए हैं, वे यह जरूर बताते हैं कि धन और शक्ति के साथ अगर संवेदनशीलता और कृतज्ञता न हो, तो जीवन का संतुलन बिगड़ सकता है। रिश्ते केवल कानूनी दस्तावेजों या संपत्ति के बंटवारे से नहीं चलते, बल्कि सम्मान, संवाद और समझ से चलते हैं।

आज जब कुछ लोग इस पूरे मामले में केवल पुरुष बनाम महिला या पति बनाम पत्नी के नजरिए से बात कर रहे हैं, तब यह भी जरूरी है कि व्यापक तस्वीर देखी जाए। यह मामला केवल तलाक या संपत्ति के बंटवारे का नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक सोच को भी दर्शाता है, जिसमें सफलता के शिखर पर पहुंचकर इंसान अपने मूल्यों को भूल जाता है। जब मूल्यों की जगह अहंकार ले लेता है, तब परिवार टूटते हैं, रिश्ते बिखरते हैं और अंत में व्यक्ति अकेला रह जाता है।

कई बार लोग कहते हैं कि माता-पिता बच्चों के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देते हैं, लेकिन भविष्य में वही बच्चे उनके साथ कैसा व्यवहार करेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं होती। यह कहानी उसी कड़वी सच्चाई की याद दिलाती है। विजयपत सिंघानिया ने अपने बेटे के लिए साम्राज्य खड़ा किया, लेकिन बदले में उन्हें वह सम्मान और सुरक्षा नहीं मिली, जिसके वे हकदार थे। आज जब उनके बेटे के जीवन में संकट आया है, तो कुछ लोग इसे कर्मों का परिणाम मान रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम से समाज को सीख लेने की जरूरत है। धन, पद और प्रतिष्ठा स्थायी नहीं होते। जो आज ऊंचाई पर है, वह कल नीचे भी आ सकता है। ऐसे में अगर रिश्तों को सहेज कर नहीं रखा गया, तो संकट के समय साथ देने वाला कोई नहीं रहता। यह बात केवल एक उद्योगपति के जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए प्रासंगिक है, जो सफलता के नशे में अपने अपनों को नजरअंदाज कर देता है।

यह भी सच है कि किसी के दुख पर खुश होना या किसी के संकट को तमाशा बनाना सही नहीं है। सहानुभूति और संवेदनशीलता मानवता के मूल गुण हैं। लेकिन साथ ही, यह सवाल उठाना भी गलत नहीं है कि समाज किस दिशा में जा रहा है। जब हम अपने माता-पिता, परिवार और मूल्यों को पीछे छोड़ देते हैं, तब अंत में हमारे पास केवल खालीपन बचता है।

यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि असली संपत्ति क्या है। क्या वह करोड़ों की नेटवर्थ है, आलीशान घर हैं, महंगी कारें हैं, या फिर वह रिश्ते हैं जो हमें मुश्किल वक्त में सहारा देते हैं। इतिहास और अनुभव बताते हैं कि अंत में वही लोग सुखी रहते हैं, जो संतुलन बनाकर चलते हैं। जिन्होंने केवल धन को ही सब कुछ समझा, वे अक्सर जीवन के किसी मोड़ पर खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं।

आज यह कहानी सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय है, लेकिन कल यह किसी और की भी हो सकती है। इसलिए जरूरी है कि हम इससे सबक लें और अपने जीवन में रिश्तों, सम्मान और मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता दें। क्योंकि अंत में इंसान वही लेकर जाता है, जो उसने अपने कर्मों से कमाया होता है। धन यहीं रह जाता है, लेकिन कर्मों का फल हर किसी को भोगना पड़ता है।

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12/01/2026

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05/01/2026

जय माता दी 🤣🤣

05/01/2026

फूल गोभी में कीड़े
बनाने से पहले सावधान हो जाए और इस वीडियो को ज्यादा से ज्यादा शेयर करे। आपके एक शेयर से किसी की जान बच सकती हैं 🙏

कभी ऐसा हुआ के आप ठुकाई कर रहे हो और अचानक कोई आ गया हो
05/01/2026

कभी ऐसा हुआ के आप ठुकाई कर रहे हो और अचानक कोई आ गया हो

जोधपुर: युवती को भगाकर ले जाने वाले युवक की नाक काट ले गये, एसयूवी में तोड़-फोड़,,,लूनी थाना क्षेत्र के शुभदण्ड गांव में...
05/01/2026

जोधपुर: युवती को भगाकर ले जाने वाले युवक की नाक काट ले गये, एसयूवी में तोड़-फोड़,,,
लूनी थाना क्षेत्र के शुभदण्ड गांव में युवती को भगा ले जाने के आरोपी युवक दिनेश बिश्नोई पर शुक्रवार को ग्रामीणों ने हमला कर दिया।
लाठी-सरियों व धारदार हथियार से मारपीट में उसके हाथ-पांव फ्रैक्चर हो गए और नाक काट दी गई। हमलावरों ने उसकी एसयूवी के शीशे तोड़ दिए और लहूलुहान हालत में छोड़कर फरार हो गए।
घायल को मथुरादास माथुर अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
प्यार की कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी
कई लोग कह रहे हैं सही किया तो कई लोग कह रहे हैं गलत किया अपनी अपनी राय





पंजाब के छोटे से गांव नसराली में 1935 में जन्मे धर्मेंद्र ने संघर्षों की आग में तपकर बॉलीवुड का 'ही-मैन' बनने का सपना पू...
04/01/2026

पंजाब के छोटे से गांव नसराली में 1935 में जन्मे धर्मेंद्र ने संघर्षों की आग में तपकर बॉलीवुड का 'ही-मैन' बनने का सपना पूरा किया। मुंबई पहुंचे तो नाकामी ने उन्हें वापस धकेल दिया, ड्रिलिंग कंपनी में मजदूरी की, लेकिन फिल्मफेयर टैलेंट हंट में दूसरा स्थान पाकर लौटे और 'दिल भी तेरा हम भी तेरे' से डेब्यू किया। 'फूल और पत्थर', 'शोले' में वीरू का किरदार और 'मेरा गाँव मेरा देश' ने उन्हें सुपरस्टार बनाया, जहां उनकी मास्कुलिन एनर्जी और डायलॉग डिलीवरी दिल जीत ली।
प्रकाश कौर से शादीशुदा होने पर भी हेमा मालिनी से प्यार ने सबको चौंका दिया; इस्लाम कबूल कर 1980 में शादी की, सनी-बॉबी, ईशा-अहाना को जन्म दिया। उम्र और बीमारी के बावजूद आखिरी फिल्म 'इक्कीस' में चमके, पद्म भूषण और फिल्मफेयर लाइफटाइम अवॉर्ड से सम्मानित हुए। 24 नवंबर 2025 को 89 बरस की उम्र में दुनिया छोड़ गए, लेकिन 'जो डर गया, समझो मर गया' जैसे डायलॉग अमर हैं। उनका जीवन सिखाता है- सपने जियो तो हिम्मत से, प्यार करो तो बेखौफ। दिलों में बसेंगे हमेशा।

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