23/11/2025
भारत का चिकित्सीय क्षेत्र (Medical Sector) बहुत जल्द पतन की कगार पर है। भारतीय संसदीय समिति ने इसे स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है।
ज़ी न्यूज़ (Zee News) में हाल ही में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 44% मानव सर्जरी नकली (Bogus), गलत (Fake) या अनावश्यक होती हैं।
इसका मतलब है कि अस्पतालों में होने वाली लगभग आधी सर्जरियाँ सिर्फ़ मरीजों या सरकार से पैसे लूटने के लिए की जाती हैं।
रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि भारत में होने वाली
55% हृदय सर्जरी नकली या बनावटी,
48% गर्भाशय हटाने की सर्जरी (Hysterectomy),
47% कैंसर सर्जरी,
48% घुटने का प्रत्यारोपण (Knee Replacement),
45% सीज़ेरियन डिलीवरी,
कंधे का प्रत्यारोपण (Shoulder Replacement),
रीढ़ की हड्डी की सर्जरी (Spine Surgery) आदि भी नकली पाई गई हैं।
महाराष्ट्र की कई प्रसिद्ध अस्पतालों के सर्वे में यह पाया गया है कि बड़े अस्पतालों में वरिष्ठ डॉक्टरों की मासिक तनख्वाह एक करोड़ रुपये तक होती है।
इसका कारण यह है कि जो डॉक्टर अधिक से अधिक अनावश्यक जांच, इलाज, भर्ती और सर्जरी कराते हैं — उन्हें अधिक वेतन दिया जाता है। (स्रोत: BMJ Global Health)
टाइम्स ऑफ़ इंडिया (Times of India) ने एक रिपोर्ट में बताया कि मृत मरीजों को जीवित बताकर इलाज करने के कई मामले सामने आए हैं — जो बहुत ही घृणित अपराध है।
एक प्रसिद्ध अस्पताल में 14 वर्षीय मृत युवक को जीवित बताकर लगभग एक महीने तक वेंटिलेटर पर रखा गया, इलाज के नाम पर पैसे लिए गए, और बाद में उसे मृत घोषित कर दिया गया। शिकायत के बाद अस्पताल दोषी पाया गया। परिवार को ₹5 लाख का मुआवज़ा दिया गया, लेकिन एक महीने की मानसिक प्रताड़ना का क्या?
कई बार मृत मरीजों पर भी तत्काल सर्जरी करने का नाटक किया जाता है — परिवार से तुरंत पैसे भरने को कहा जाता है, और फिर कहा जाता है कि “सर्जरी के दौरान मौत हो गई।”
(स्रोत: Dissenting Diagnosis – Dr. Gadre & Shukla)
बीमा (Mediclaim Insurance) का घोटाला भी उतना ही भयावह है।
भारत में लगभग 68% लोगों ने मेडिक्लेम बीमा लिया है, लेकिन ज़रूरत पड़ने पर कंपनियाँ तरह-तरह के बहाने बनाकर क्लेम को अस्वीकार कर देती हैं या आंशिक राशि ही देती हैं।
बाकी खर्च परिवार को खुद उठाना पड़ता है।
करीब 3000 से अधिक अस्पतालों को बीमा कंपनियों ने ब्लैकलिस्ट किया है क्योंकि वे झूठे क्लेम कर रही थीं।
कोरोना काल में कई अस्पतालों ने नकली कोविड मरीज दिखाकर बीमा कंपनियों से करोड़ों रुपये वसूले।
मानव अंगों की तस्करी (Organ Trafficking) का गंदा धंधा भी बड़े पैमाने पर चलता है।
इंडियन एक्सप्रेस (Indian Express) ने 2019 में एक हृदयविदारक घटना उजागर की थी —
कानपुर की एक महिला, संगीता कश्यप, को दिल्ली में नौकरी का लालच देकर बुलाया गया और फोर्टिस अस्पताल (Fortis Hospital) में स्वास्थ्य जांच के लिए भेजा गया।
वहां भर्ती करने के बाद उसे ‘डोनर’ शब्द सुनकर शक हुआ और वह भाग निकली।
बाद में पुलिस जांच में एक अंतरराष्ट्रीय गैंग का पर्दाफाश हुआ — जिसमें पुलिस, डॉक्टर, मेडिकल स्टाफ सभी शामिल थे।
‘हॉस्पिटल रेफरल स्कैम’ (Hospital Referral Scam) तो आम बात हो गई है।
कई डॉक्टर मरीज को गंभीर बीमारी बताकर बड़े अस्पतालों — जैसे अपोलो (Apollo), फोर्टिस (Fortis), एपेक्स (Apex) — में भेजते हैं।
इन अस्पतालों के पास रेफरल प्रोग्राम होते हैं, जिनमें डॉक्टरों को मरीज भेजने पर कमीशन मिलता है।
उदाहरण के लिए, मुंबई की कोकिलाबेन अस्पताल (Kokilaben Hospital) ने लिखा था —
40 मरीज भेजने पर ₹1 लाख,
50 मरीजों पर ₹1.5 लाख,
75 मरीजों पर ₹2.5 लाख दिए जाएंगे।
‘डायग्नोसिस स्कैम’ (Diagnosis Scam) भी करोड़ों की लूट का तरीका है।
बेंगलुरु की कुछ प्रसिद्ध पैथोलॉजी लैब्स पर आयकर विभाग के छापों में ₹100 करोड़ नकद और 3.5 किलो सोना मिला।
यह रकम डॉक्टरों को कमीशन देने के लिए रखी गई थी।
डॉक्टर मरीजों को अनावश्यक जांच के लिए भेजते हैं और 40–50% तक कमीशन लेते हैं।
अधिकांश रिपोर्टें फर्जी होती हैं — केवल 1–2 टेस्ट असली होते हैं।
देश में लगभग 2 लाख से अधिक लैब्स हैं, लेकिन सिर्फ़ 1000 से थोड़ी अधिक ही प्रमाणित (Certified) हैं।
फार्मा कंपनियाँ (Pharma Companies) भी बड़े घोटाले करती हैं।
भारत की 20–25 बड़ी दवा कंपनियाँ हर साल डॉक्टरों पर लगभग 1000 करोड़ रुपये खर्च करती हैं ताकि वे उनकी दवाएँ लिखें।
कोविड काल में Dolo गोली बेचने वाली कंपनी ने डॉक्टरों को ₹1000 करोड़ देने का मामला उजागर हुआ था।
डॉक्टरों को नकद, विदेश यात्रा, 5-Star होटल में ठहरने की सुविधाएँ दी जाती हैं।
जैसे USV Ltd. कंपनी हर डॉक्टर को ₹3 लाख नकद और ऑस्ट्रेलिया/अमेरिका यात्रा देती है।
कुछ फार्मा कंपनियाँ अस्पतालों को दवाएँ बहुत कम दाम पर देती हैं लेकिन MRP कई गुना ज़्यादा रखती हैं।
इंडिया टुडे (India Today) की रिपोर्ट के अनुसार, EMCURE कंपनी अपनी कैंसर दवा Temikure अस्पताल को ₹1950 में देती है,
जबकि अस्पताल मरीज से ₹18,645 वसूलता है।
मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया (MCI) — जो डॉक्टरों और अस्पतालों की सर्वोच्च नियामक संस्था है — उस पर भी लापरवाही के आरोप हैं।
2016 में केंद्र सरकार की जांच समिति ने पाया कि MCI नई मेडिकल कॉलेजों को मंज़ूरी देने में तो सक्रिय है, लेकिन डॉक्टरों व अस्पतालों पर नियंत्रण में जानबूझकर ढिलाई बरतती है।
MCI के कुछ मुख्य नियम जो रोज़ तोड़े जाते हैं:
1. डॉक्टर को किसी कंपनी की ब्रांडेड दवा नहीं, बल्कि उसका Generic Name लिखना चाहिए।
2. इलाज से पहले डॉक्टर को पूरी फीस बतानी चाहिए।
3. जांच/इलाज से पहले मरीज की लिखित सहमति लेनी चाहिए।
4. हर मरीज का मेडिकल रिकॉर्ड 3 साल तक सुरक्षित रखना चाहिए।
5. भ्रष्ट या अनैतिक डॉक्टरों को बिना डर समाज के सामने लाना चाहिए।
सरकारी योजनाओं में भी घोटाले हो रहे हैं।
उदाहरण के लिए, कोई पूर्व सैनिक मामूली सर्दी लेकर सरकारी अस्पताल जाता है — उसे भर्ती कर लिया जाता है।
उसके कार्ड पर उसकी जानकारी के बिना सरकारी योजना में फर्जी बिलिंग की जाती है।
7–8 दिन बाद छुट्टी दे दी जाती है, लेकिन तब तक डॉक्टरों और भ्रष्ट अधिकारियों के खातों में लाखों रुपये जमा हो जाते हैं।