05/08/2026
फिर डांगावास में छह लोगों को किसने मारा ?
डांगावास हत्याकांड में सभी आरोपियों के बरी होने का फैसला केवल एक मुकदमे का अंत नहीं है,बल्कि यह दलितों के न्याय के अधिकार पर एक गहरा प्रश्नचिह्न है.सवाल सीधा है कि क्या उन छह निर्दोष लोगों को किसी ने नहीं मारा? क्या वे अपने आप मर गए थे?
जब छह लोगों की निर्मम हत्या हुई,पूरा देश उस बर्बरता का साक्षी बना.वर्षों तक पीड़ित परिवार न्याय की उम्मीद में अदालतों के चक्कर लगाते रहे.लेकिन अंततः यदि कोई भी दोषी नहीं ठहराया जाता,तो यह केवल अभियोजन की नहीं, बल्कि पूरी न्यायिक प्रक्रिया की विफलता का संकेत है.
निष्पक्ष जांच,निर्भीक साक्ष्य और निष्पक्ष सुनवाई के अभाव में यदि ऐसे मामलों में आरोपी बरी होते हैं,तो इसका सबसे बड़ा संदेश यह जाता है कि दलितों के लिए न्याय पाना लगातार कठिन होता जा रहा है.इससे न्यायपालिका में वंचित समुदायों का भरोसा कमजोर पड़ता है.
अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम का उद्देश्य पीड़ितों को प्रभावी न्याय दिलाना था,लेकिन यदि इतने जघन्य मामलों में भी दोषसिद्धि नहीं हो पाती,तो यह कानून के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करता है.
डांगावास के पीड़ितों को न्याय नहीं मिला.यह केवल पीड़ित परिवारों की हार नहीं,बल्कि भारतीय लोकतंत्र के उस वादे की भी हार है जिसमें कहा गया था कि कानून सबके लिए समान है.
यह फैसला हमें आत्ममंथन के लिए मजबूर करता है कि आख़िर दलितों के लिए न्याय का रास्ता कहाँ है?
Copy past by -@भंवर मेघवंशी