30/08/2026
“आखिरी सलाम” — एक सच्ची घटना से प्रेरित कहानी
साल 1999 था। कारगिल की बर्फीली पहाड़ियों पर रात का अंधेरा छाया हुआ था। तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे था, लेकिन भारतीय सेना के जवानों के हौसले उससे भी ज्यादा गर्म थे।
एक छोटी-सी चौकी पर तैनात एक जवान को अपने घर से चिट्ठी मिली। चिट्ठी उसकी माँ ने लिखी थी—
“बेटा, जल्दी घर आ जाना… इस बार तेरे लिए तेरी पसंद की खीर बनाऊँगी।”
जवान ने चिट्ठी पढ़कर मुस्कुराते हुए उसे अपनी जेब में रख लिया।
उसी रात उनकी यूनिट को एक बेहद खतरनाक चोटी पर कब्जा करने का आदेश मिला। रास्ता सीधा नहीं था—ऊंची बर्फीली चट्टानें, दुश्मन की गोलाबारी और नीचे सैकड़ों फीट गहरी खाई।
जवान आगे बढ़ते रहे।
कुछ घंटों बाद गोलियों की आवाज़ के बीच एक साथी जवान घायल होकर गिर पड़ा। बाकी जवान आगे बढ़ चुके थे, लेकिन वह जवान वापस लौटा।
उसने घायल साथी को अपने कंधे पर उठाया और कहा—
“तू घर जाएगा भाई… माँ इंतज़ार कर रही होगी।”
वह उसे सुरक्षित जगह तक लेकर आया।
सुबह होते-होते भारतीय सैनिकों ने उस चोटी पर तिरंगा फहरा दिया।
लेकिन उस जवान की किस्मत में घर लौटना नहीं था।
उसकी वर्दी की जेब से वही चिट्ठी मिली—
“बेटा, जल्दी घर आ जाना… तेरी पसंद की खीर बनाऊँगी।”
जब यह खबर उसके घर पहुँची, उसकी माँ कई मिनट तक कुछ नहीं बोली।
फिर उसने बेटे की तस्वीर को सीने से लगाया और सिर्फ इतना कहा—
“मेरा बेटा घर तो नहीं आया… लेकिन तिरंगे को घर ले आया।”
उस दिन पूरे गाँव ने उस जवान को अंतिम सलाम किया।
और उसकी माँ ने खीर बनाई…
लेकिन इस बार अपने बेटे के लिए नहीं—
उस हर जवान के लिए, जो देश की रक्षा करते हुए अपने घर लौट नहीं पाया।
जय हिन्द, जय भारत, जय जवान , जय किसान 🇮🇳🫡
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