16/08/2025
20कि वह बंदियों का कराहना सुनें और उन्हें मुक्त कर दें,
जिन्हें मृत्यु दंड दिया गया है.”
21कि मनुष्य ज़ियोन में याहवेह की महिमा की घोषणा कर सकें
तथा येरूशलेम में उनका स्तवन,
22जब लोग तथा राज्य
याहवेह की वंदना के लिए एकत्र होंगे.
23मेरी जीवन यात्रा पूर्ण भी न हुई थी, कि उन्होंने मेरा बल शून्य कर दिया;
उन्होंने मेरी आयु घटा दी.
24तब मैंने आग्रह किया:
“मेरे परमेश्वर, मेरे जीवन के दिनों के पूर्ण होने के पूर्व ही मुझे उठा न लीजिए;
आप तो पीढ़ी से पीढ़ी स्थिर ही रहते हैं.
25प्रभु, आपने प्रारंभ में ही पृथ्वी की नींव रखी,
तथा आकाशमंडल आपके ही हाथों की कारीगरी है.
26वे तो नष्ट हो जाएंगे किंतु आप अस्तित्व में ही रहेंगे;
वे सभी वस्त्र समान पुराने हो जाएंगे.
आप उन्हें वस्त्रों के ही समान परिवर्तित कर देंगे
उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा.
27आप न बदलनेवाले हैं,
आपकी आयु का कोई अंत नहीं.
28आपके सेवकों की सन्तति आपकी उपस्थिति में निवास करेंगी;
उनके वंशज आपके सम्मुख स्थिर रहेंगे.”
स्तोत्र 102
HSS