28/08/2026
🚨 जहाँ मराठों के भी छूट गए थे पसीने: जानिए करौली के 'शहर किले' का गौरवशाली इतिहास 🚩
राजस्थान के करौली जिले की नादौती तहसील में स्थित शहर का किला (जिसे सहर दुर्ग भी कहा जाता है) ऐतिहासिक, स्थापत्य और सामरिक दृष्टिकोण से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और समृद्ध दुर्ग है।
किले के इतिहास और मुख्य विशेषताओं से जुड़े प्रमुख पहलू निम्नलिखित हैं:
1. प्रारम्भिक इतिहास और राजवंश
मीणा शासन से शुरुआत: ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, कछवाहा राजपूतों के आगमन से पहले इस क्षेत्र पर मीणा शासकों का आधिपत्य था।
पच्याणोत कछवाहा ठिकाना: आंबेर (जयपुर) के प्रतापी कछवाहा राजा पृथ्वीराज के पुत्र पच्याण (पचचन) हुए। पच्याण के पौत्र तथा विट्ठलदास के पुत्र हरिदास से शहर के जागीरदारों का वंशक्रम चला। आगे चलकर यह दुर्ग पच्याणोत कछवाहों का प्रमुख ताजीमी ठिकाना बन गया।
2. सामरिक और सैन्य इतिहास (प्रमुख युद्ध)
शहर का किला अपनी प्राकृतिक और दुर्गम सुरक्षा प्रणाली के कारण एक अभेद्य दुर्ग माना जाता था, जिस पर कब्जे के लिए कई बार आक्रमण हुए लेकिन शत्रुओं को असफलता मिली।
मांवडा मंढोली का युद्ध (1767 ई.): जयपुर और भरतपुर रियासत के मध्य हुए ऐतिहासिक 'मांवडा मंढोली' युद्ध में शहर के राजा उम्मेदसिंह पच्याणोत ने जयपुर राज्य की ओर से भाग लिया और वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की।
मरहाठा (होल्कर) आक्रमण: ठाकुर रघुनाथ सिंह पच्याणोत के समय मराठा शासक होल्कर की सेना ने शहर दुर्ग की घेराबंदी की। पच्याणोत वीरों ने इसका प्रबल विरोध किया, किले की रक्षा की और मराठा सैनिकों के अस्त्र-शस्त्र तक छीन लिए।
'कूर्मविलास' ग्रंथ में उल्लेख: चंद कवि द्वारा रचित ग्रंथ 'कूर्मविलास' में शहर के शासकों (जैसे भारमल पच्याणोत) की अद्वितीय वीरता और रणकौशल की प्रशंसा मिलती है।
3. दुर्ग का स्थापत्य और सुरक्षा व्यवस्था
भौगोलिक श्रेणी: यह किला अरावली पर्वतमाला की एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित गिरि दुर्ग की श्रेणी में आता है।
16 बुर्ज व परकोटा: दुर्ग 16 विशाल बुर्जों से घिरा हुआ है। इसके चारों ओर पक्की काली मिट्टी और मोरिंडे का बना परकोटा तथा सुरक्षात्मक गहरी खाई थी।
घुमावदार मार्ग और मुख्य द्वार: किले के ऊपर पहुंचने के लिए आमेर किले की तर्ज पर एक विशाल घुमावदार रास्ता बना है। मुख्य प्रवेश द्वार उत्तर दिशा में था; सोप दरवाजा, कैमा दरवाजा और खूड़ा दरवाजा इसके प्रमुख प्रवेश द्वार थे।
तीन गुप्त सुरंगें: आपातकाल में किले से सुरक्षित बाहर निकलने के लिए तीन अलग-अलग दिशाओं में गुप्त सुरंगें बनाई गई थीं, जिनमें से एक मंदिर की ओर और दूसरी सुरक्षित स्थान पर निकलती थी।
जल और अन्न प्रबंधन: किले परिसर में जनाने और मरदाने महल, सिलहखाना (शस्त्रागार), अन्न भंडार और वर्षा जल संचयन के लिए दो विशाल टांके बनाए गए थे।
4. धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व
सेहरा माता (शहरा माता) मंदिर: किले के परिसर में एक छोटी चट्टान पर सेहरा माता का अति प्राचीन मंदिर स्थापित है, जिनके नाम पर इस कस्बे का नाम 'शहर' या 'सहर' पड़ा। यह आसपास के क्षेत्रों के लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है, जहाँ चैत्र और आश्विन नवरात्रों में विशाल मेला भरता है।
अन्य मंदिर: माता मंदिर के समीप श्री सीताराम जी, शिवजी तथा कस्बे में लक्ष्मीनाथ जी व मदनमोहन जी आदि के प्राचीन मंदिर भी विद्यमान हैं।
अपनी ऐतिहासिकता, समृद्ध स्थापत्य शैली और पच्याणोत राजपूतों के शौर्य की कहानियों के कारण नादौती तहसील का शहर दुर्ग करौली जिले की एक ऐतिहासिक विरासत के रूप में पहचाना जाता है।
आप क्या जानते है इस किले के बारे कमेंट्स करके बताइए ।