12/05/2026
धिक्कार है ऐसी सोच पर और शर्मनाक है वह आचरण, जो समाज के मार्गदर्शक कहलाने वाले पद को कलंकित कर दे
समाज में शिक्षक का स्थान सबसे ऊपर होता है, क्योंकि वह भविष्य का निर्माण करता है। लेकिन जब एक सेवानिवृत्त अध्यापक—जिसे उम्र के इस पड़ाव पर समाज को अनुभव और सत्य की राह दिखानी चाहिए थी—वही अगर अपराध की 'ट्रेनिंग' देने लगे, तो समझ लीजिए कि नैतिक मूल्यों का अंत हो चुका है।
साजिश की पराकाष्ठा देखिए : - बेर गांव के रिटायर्ड अध्यापक सुरेन्द्र नेहरा का जो पक्ष सामने आ रहा है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। एक 16 साल के बच्चे के साथ हुई मारपीट से पहले ही इंसानियत शर्मसार थी, लेकिन उस पर पर्दा डालने के लिए जो 'कुटिल सलाह' दी गई, वह किसी पेशेवर अपराधी की सोच से कम नहीं है:
"मशीन तोड़ दो..." (सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की उकसाहट
"पैसे इधर-उधर कर दो..." (गबन और बेईमानी का पाठ)
"क्रॉस केस लगा दो और बोल दो लड़का चोरी कर रहा था..." (एक मासूम का भविष्य बर्बाद करने की साजिश)
क्या यही एक शिक्षक का संस्कार है?
एक अध्यापक का जीवन सत्य, निष्ठा और न्याय पर आधारित होना चाहिए। लेकिन यहाँ एक गरीब परिवार की आवाज को दबाने और एक बेगुनाह बच्चे को अपराधी सिद्ध करने के लिए पद और रसूख का नंगा नाच किया जा रहा है। क्या सरकारी नौकरी से रिटायर होने का मतलब यह है कि आप कानून को अपनी जेब में समझेंगे?
सोचिए, जो व्यक्ति समाज में 'आदर्श' माना जाता है, जब वह खुलेआम फरेब और झूठे केस बनाने की वकालत करता है, तो युवाओं पर क्या असर पड़ेगा? यह हमला सिर्फ उस 16 साल के बच्चे पर नहीं है, यह हमला हमारे न्याय तंत्र और सामाजिक भरोसे पर है।
पद और पेंशन किसी को भी कानून से ऊपर होने का लाइसेंस नहीं देते। सम्मान हमेशा 'कर्म' से मिलता है, 'पद' से नहीं। जो व्यक्ति सच को कुचलकर झूठ का साम्राज्य खड़ा करना चाहता है, उसे समाज कभी माफ नहीं करेगा।
न्याय की इस लड़ाई में हम उस पीड़ित परिवार के साथ खड़े हैं। ऐसे 'कलंकित' चेहरों का सामाजिक बहिष्कार और कानूनी घेराव अनिवार्य है।
#हनुमानगढ़ #भादरा ी_जंग #इंसानियत_जिंदा_है