05/06/2026
रीको हटाओ-भैराणा धाम बचाओ: आंदोलन से समझौते तक, आखिर क्या निकला नतीजा?
भैराणा (बिचून)
जयपुर जिले के भैराणा धाम में प्रस्तावित रीको औद्योगिक क्षेत्र के विरोध में शुरू हुआ “रीको हटाओ-भैराणा धाम बचाओ” आंदोलन अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। करीब दो सप्ताह से अधिक चले आंदोलन में दादूपंथ के संत, स्थानीय ग्रामीण और पर्यावरण प्रेमी एकजुट होकर धाम, जंगल और धार्मिक विरासत को बचाने की मांग पर डटे रहे। आंदोलन के दौरान संतों ने जीवित समाधि तक की चेतावनी दी, जिससे पूरे प्रदेश का ध्यान भैराणा की ओर गया।
आंदोलन को उस समय बड़ा राजनीतिक समर्थन मिला जब Hanuman Beniwal खुलकर संतों के पक्ष में उतर आए। महापंचायतों और जनसभाओं के माध्यम से सरकार पर दबाव बढ़ाया गया। बढ़ते जनदबाव के बाद राज्य सरकार और संत समाज के बीच कई दौर की वार्ताएं हुईं, जिनमें विवादित क्षेत्र और धार्मिक परिसर की सुरक्षा को लेकर सहमति बनने के संकेत मिले। आंदोलन के बाद सरकार ने मामले के समाधान के लिए तीन मंत्रियों की कैबिनेट सब-कमेटी गठित कर दी है। यह समिति रीको क्षेत्र, धार्मिक धरोहर, पर्यावरणीय प्रभाव और स्थानीय जनभावनाओं का अध्ययन कर अंतिम समाधान देगी। फिलहाल सरकार ने संत समाज से संवाद का रास्ता खुला रखा है और टकराव की स्थिति टल गई है। जहां शुरुआत में संत समाज और बेनीवाल एक मंच पर दिखाई दिए, वहीं बाद में संतों ने सरकार से सीधे संवाद की राह चुनी। दूसरी ओर बेनीवाल ने सरकार के खिलाफ अपना विरोध जारी रखा। इसी बीच क्षेत्र के लगभग 15 गांवों के कुछ ग्रामीण रीको परियोजना के समर्थन में भी सामने आ गए, जिससे मामला केवल धार्मिक नहीं बल्कि विकास बनाम आस्था की बहस में बदल गया।
फिलहाल स्थिति क्या है?
संत समाज सरकार के लिखित और स्थायी समाधान का इंतजार कर रहा है। यदि धाम, जंगल और धार्मिक क्षेत्र को पूर्ण सुरक्षा नहीं मिली तो आंदोलन फिर तेज होने की चेतावनी दी गई है। फिलहाल भैराणा में संघर्ष की जगह संवाद ने ले ली है, लेकिन अंतिम फैसला सरकार की सब-कमेटी की रिपोर्ट पर निर्भर करेगा।
निष्कर्ष: भैराणा आंदोलन ने यह संदेश दिया कि राजस्थान में आस्था, पर्यावरण और जनभावनाओं से जुड़े मुद्दों पर सरकार को जनता और संत समाज की आवाज सुननी पड़ती है। अभी लड़ाई खत्म नहीं हुई है, बल्कि उसका अगला अध्याय शुरू हुआ है।