Shivanand Vani

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Shivanand Vani Its a magazine to inculcate spiritual and social upliftment of the people in the society.

It also helps to strengthen brotherhood and social binding among people

18/11/2025

आप और तुम

आप और तुम मे क्या अंतर है। आप मे वो अपनापन नहीं जो तुम मे है ।आप के आगे हम रो नही सकते, दिलखोल कर बात नही कर सकते ।तुम्हारे आगे हम खुल कर रो सकते हैं, हंस सकते हैं बातें कर सकते हैं ।आप अपने होकर भी पराए से लगते हो ।तुम पुकारते ही तुम अपने ही लगते हो ।आप के आगे हम
कुछ कह नहीं सकते तुम्हारे आगे दिल खोल के रख देते हैं ।यही सच है ।

15/10/2025

व्यवहार सुंदर बनाएं

*एक सभा में गुरु जी ने प्रवचन के दौरान एक 30 वर्षीय युवक को खडा कर पूछा कि आप चल रहे हैं और सामने से एक सुन्दर लडकी आ रही है , तो आप क्या करोगे ?

युवक ने कहा - उस पर नजर जायेगी, अगर पहचान वाली हुई तो उससे बातचीत करेंगे वरना उसे देखने लगेंगे। गुरु जी ने पूछा - वह लडकी आगे बढ गयी , तो क्या पीछे मुडकर भी देखोगे ? लडके ने कहा - हाँ अगर दिल को भाई तो, गुरु जी ने फिर पूछा - जरा यह बताओ वह सुन्दर चेहरा आपको कब तक याद रहेगा ?

युवक ने कहा 5 - 10 मिनट तक, अगर अत्यधिक सुंदर हुई तो आध एक घंटे तक बस,
गुरु जी ने उस युवक से कहा - अब जरा कल्पना कीजिये.. आप जयपुर से मुम्बई जा रहे हैं और मैंने आपको एक पुस्तकों का पैकेट देते हुए कहा कि मुम्बई में अमुक महानुभाव के यहाँ यह पैकेट पहुँचा देना... आप पैकेट देने मुम्बई में उनके घर गए। उनका घर देखा तो आपको पता चला कि ये तो बडे अरबपति हैं। घर के बाहर 10 गाडियाँ और 5 चौकीदार खडे हैं।

उन्हें आपने पैकेट की सूचना अन्दर भिजवाई , तो वे महानुभाव खुद बाहर आए। आप से पैकेट लिया। आप जाने लगे तो आपको आग्रह करके घर में अंदर ले गए। पास में बैठाकर गरमा गरम लजीज व्यंजन भी खिलाएं। चलते समय आप से पूछा - भैया किस वाहन से आए हो ?

आपने कहा- लोकल ट्रेन में। उन्होंने ड्राइवर को बोलकर आपको गंतव्य तक पहुँचाने के लिए कहा और आप जैसे ही अपने स्थान पर पहुँचने वाले थे कि उस अरबपति महानुभाव का फोन आया - भैया, आप आराम से पहुँच गए..

अब आप बताइए कि आपको वे महानुभाव कब तक याद रहेंगे ? युवक ने कहा - गुरु जी ! जिंदगी में मरते दम तक उस व्यक्ति को हम भूल नहीं सकते।

गुरु जी ने युवक के माध्यम से सभा को संबोधित करते हुए कहा —*

*"यह है जीवन की हकीकत।"

*"सुन्दर चेहरा थोड़े समय ही याद रहता है, पर सुन्दर व्यवहार जीवन भर याद रहता है।"*

*बस यही है जीवन का गुरु मंत्र... अपने चेहरे और शरीर की सुंदरता से ज़्यादा अपने व्यवहार की सुंदरता पर ध्यान दें..*

हर जीव के प्रति अपना व्यवहार सुंदर बनाईए।

17/09/2025

-ईश्वर बहुत दयालु है

एक राजा का एक विशाल फलों का बगीचा था। उसमें तरह-तरह के फल होते थे और उस बग़ीचे की सारी देखरेख एक किसान अपने परिवार के साथ करता था. वह किसान हर दिन बगीचे के ताज़े फल लेकर राजा के राजमहल में जाता था।

एक दिन किसान ने पेड़ों पे देखा नारियल अमरुद, बेर, और अंगूर पक कर तैयार हो रहे हैं, किसान सोचने लगा आज कौन सा फल महाराज को अर्पित करूँ, फिर उसे लगा अँगूर करने चाहिये क्योंकि वो तैयार हैं इसलिये उसने अंगूरों की टोकरी भर ली और राजा को देने चल पड़ा! किसान जब राजमहल में पहुचा, राजा किसी दूसरे ख्याल में खोया हुआ था और नाराज भी लग रहा था किसान रोज की तरह मीठे रसीले अंगूरों की टोकरी राजा के सामने रख दी और थोड़े दूर बेठ गया, अब राजा उसी खयालों-खयालों में टोकरी में से अंगूर उठाता एक खाता और एक खींच कर किसान के माथे पे निशाना साधकर फेंक देता।

राजा का अंगूर जब भी किसान के माथे या शरीर पर लगता था किसान कहता था, ‘ईश्वर बड़ा दयालु है’ राजा फिर और जोर से* *अंगूर फेकता था किसान फिर वही कहता था ‘ईश्वर बड़ा दयालु है।

थोड़ी देर बाद राजा को एहसास हुआ की वो क्या कर रहा है और प्रत्युत्तर क्या आ रहा है वो सम्भल कर बैठा , उसने किसान से कहा, मै तुझे बार-बार अंगूर मार रहा हूँ , और ये अंगूर तुंम्हे लग भी रहे हैं, फिर भी तुम यह बार-बार क्यों कह रहे हो की ‘ईश्वर बड़ा दयालु है’।

किसान ने नम्रता से बोला, महाराज, बागान में आज नारियल, बेर और अमरुद भी तैयार थे पर मुझे भान हुआ क्यों न आज आपके लिये अंगूर् ले चलूं लाने को तो मैं अमरुद और बेर भी ला सकता था पर मैं अंगूर ही लाया। यदि अंगूर की जगह नारियल, बेर या बड़े बड़े अमरुद रखे होते तो आज मेरा हाल क्या होता ? इसीलिए मैं कह रहा हूँ कि ‘ईश्वर बड़ा दयालु है’!!

🌷 कथा सार 🌷
इसी प्रकार ईश्वर भी हमारी कई मुसीबतों को बहुत हल्का कर के हमें उबार लेता है पर ये तो हम ही नाशुकरे हैं जो शुकर न करते हुए उसे ही गुनहगार ठहरा देते हैं, मेरे साथ ही ऐसा क्यूँ , मेरा क्या कसूर, आज जो भी फसल हम काट रहे हैं ये दरअसल हमारी ही बोई हुई है, बोया बीज बबूल का तो आम कहाँ से होये।। और बबुल से अगर आम न मिला तो गुनहगार भी हम नहीं हैं , इसका भी दोष हम किसी और पर मढेंगे, कोई और न मिला तो ईश्वर तो है ही।

आज हमारे पास जो कुछ भी है अगर वास्तविकता के धरातल पर खड़े होकर देखेंगे तो वास्तव में हम इसके लायक भी नही हैं पर उसके बावजूद मेरे ईश्वर ने मुझे जरूरत से ज़्यादा दिया है और बजाय उनका धन्यवाद करने के हम उनहे हमेशा दोष ही देते रहते हैं। पर वो तो हमारा पिता है हमारी माता है किसी भी बात का कभी बुरा नहीं मानते और अपना आशीर्वाद हम पर बरसाते रहते है। अगर एक बार उनके तोहफों की तरफ देखेंगे तो सारी उम्र धन्यवाद दोगे तो भी कम पड़ेंगे।

15/09/2025

भगवान की आरती करने का सही तरीका

कोई भी पूजा भगवान की आरती के बाद ही संपन्न मानी जाती है. स्कंद पुराण के अनुसार आरती मुख्य रूप से सात प्रकार की होती है.

1. मंगला आरती- सुबह जल्दी की जाने वाली आरती.
2. पूजा आरती- पूजा के दौरान की जाने वाली आरती.
3. श्रृंगार आरती- भगवान के श्रृंगार के बाद की जाने वाली आरती.
4. भोग आरती- जब भगवान को भोग अर्पित किया जाता है, तब ये आरती की जाती है.
5. धूप आरती- धूप दिखाने के बाद की जाने वाली आरती.
6. संध्या आरती- शाम के समय की जाने वाली आरती.
7. शयन आरती- रात में सोने से पहले की जाने वाली आरती.

हिंदू धर्म में पूजा-पाठ का विशेष महत्व है. मान्यताओं के अनुसार, नियमित रूप से पूजा करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है. वहीं, कोई भी पूजा भगवान की आरती के बाद संपन्न मानी जाती है. यानी पूजा में देवी-देवताओं की आरती करना आवश्यक माना गया है और बिना आरती के पूजा अधूरी होती है.

आरती करने का तरीका :

आरती हमेशा श्रद्धा और भक्ति भाव से करनी चाहिए. वहीं, भाव से अलग आरती करने के 4 मुख्य नियम हैं. ये नियम कुछ इस प्रकार हैं-
1. आरती की शुरुआत भगवान के चरणों से करें और चरणों में आरती की थाल को चार बार घुमाएं. ये खुद को परमात्मा के चरणों में समर्पित करने की ओर इशारा होता है.
2. इसके बाद आरती की थाली को भगवान की नाभि के पास दो बार घुमाएं. माना जाता है कि भगवान ब्रह्मा का जन्म भगवान विष्णु की नाभि से हुआ था, ऐसे में भगवान के चरणों में नमन करने के बाद नाभि का पूजन किया जाता है.
3. इसके बाद आरती की थाल को भगवान के मुखमंडल के सामने एक बार घुमाएं.
4. आखिर में दीये को भगवान के पूरे शरीर पर सात बार घुमाते हुए आरती करें.
इस तरह कुल 14 बार आरती घुमाने से चौदह भुवनों तक आपकी भक्ति पहुंचती है.
स्कंद पुराण के अनुसार आरती के नियम
स्कंद पुराण में भी आरती के कुछ विशेष नियम बताए गए हैं. इसमें पंच प्रदीप का प्रयोग किया जाता है ।
पंच प्रदीप के लिए गाय के दूध से बने घी में डूबी हुई रुई की 5 बत्तियों का दीपक जलाएं. इसे पंच प्रदीप कहा जाता है.

श्रद्धा और भक्ति :

यदि कोई व्यक्ति मंत्र और पूजा विधि नहीं जानता, लेकिन श्रद्धापूर्वक आरती करता है, तो उसकी पूजा भी स्वीकार होती है.
आरती करते समय ध्यान रखने योग्य बातें
• आरती हमेशा खड़े होकर करें- आरती के दौरान खड़े रहना शुभ माना जाता है.
• थोड़ा झुककर आरती करें- इसे भक्ति का प्रतीक माना जाता है.
• आरती की थाली सही धातु की हो- तांबे, पीतल या चांदी की थाली में आरती करें.
• थाली में पूजा सामग्री रखें- गंगाजल, कुमकुम, चावल, चंदन, अगरबत्ती, फूल और भोग में फल या मिठाई रखें.
ध्यान रखें कि आरती पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसे सही विधि से करने से न केवल पूजा पूरी होती है, बल्कि मन को शांति भी मिलती है. माना जाता है कि श्रद्धा और भक्ति से की गई आरती भगवान तक अवश्य पहुंचती है और भक्तों को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है.

13/09/2025

नाम का महत्त्व

1. जब आप स्नान करते समय भगवान का नाम लेते हैं, तो वह एक पवित्र स्नान बन जाता है।
2. जब आप खाना खाते समय नाम लेते हैं, तो वह भोजन प्रसाद बन जाता है।
3. जब आप चलते समय नाम लेते हैं, तो वह एक तीर्थ यात्रा बन जाती है।
4. जब आप खाना पकाते समय नाम लेते हैं, तो वह भोजन दिव्य बन जाता है।
5. जब आप सोने से पहले नाम लेते हैं, तो वह ध्यानमय नींद बन जाती है।
6. जब आप काम करते समय नाम लेते हैं, तो वह भक्ति बन जाती है।
*7. जब आप घर में नाम लेते हैं, तो वह घर मंदिर बन जाता है।

13/09/2025

*मृत्यु क्यों आवश्यक है?*

हर कोई मृत्यु से डरता है, लेकिन जन्म और मृत्यु सृष्टि के नियम हैं... यह ब्रह्मांड के संतुलन के लिए आवश्यक है। इसके बिना, मनुष्य एक-दूसरे पर हावी हो जाते। कैसे? इस कहानी से जानिए...
एक बार, एक राजा एक संत के पास गया, जो राज्य के बाहर एक पेड़ के नीचे बैठे थे।* राजा ने पूछा, "हे स्वामी! क्या कोई औषधि है जो अमरता दे सके? कृपया मुझे बताएं। संत ने कहा, "हे राजा! आपके सामने जो दो पर्वत हैं, उन्हें पार कीजिए। वहाँ एक झील मिलेगी। उसका पानी पीने से आप अमर हो जाएंगे।"
राजा ने पर्वत पार कर झील पाई।* जैसे ही वह पानी पीने को झुके, उन्होंने कराहने की आवाज सुनी। आवाज का पीछा करने पर उन्होंने एक बूढ़े और कमजोर व्यक्ति को दर्द में देखा। राजा ने कारण पूछा, तो उस व्यक्ति ने कहा, "मैंने इस झील का पानी पी लिया और अमर हो गया।* जब मेरी उम्र सौ साल की हुई, तो मेरे बेटे ने मुझे घर से निकाल दिया। मैं पचास साल से यहाँ पड़ा हूँ, बिना किसी देखभाल के। मेरा बेटा मर चुका है, और मेरे पोते अब बूढ़े हो चुके हैं। मैंने खाना- पीना बंद कर दिया है, फिर भी जीवित हूँ।
राजा ने सोचा, "बुढ़ापे के साथ अमरता का क्या फायदा? अगर मैं अमरता के साथ यौवन भी प्राप्त कर सकूँ तो?" राजा वापस संत के पास गए और समाधान पूछा, "कृपया मुझे अमरता के साथ यौवन प्राप्त करने का उपाय बताएं।"
संत ने कहा, "झील पार करने के बाद, आपको एक और पर्वत मिलेगा।* उसे पार करिए, और एक पेड़ मिलेगा जिस पर पीले फल लगे होंगे। उन फलों में से एक खा लीजिए, और आपको अमरता के साथ यौवन भी मिल जाएगा।"
राजा ने दूसरा पर्वत पार किया और एक पेड़ देखा, जिस पर पीले फल लगे थे। जैसे ही उन्होंने फल तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, उन्हें तेज बहस और लड़ाई की आवाजें सुनाई दीं। उन्होंने सोचा, इस सुनसान जगह में कौन झगड़ सकता है?राजा ने चार जवान आदमियों को ऊंची आवाज़ में झगड़ते देखा।* राजा ने पूछा, "तुम लोग क्यों झगड़ रहे हो?" उनमें से एक बोला, "मैं 250 साल का हूँ और मेरे दाहिने वाले व्यक्ति की उम्र 300 साल है। वह मुझे मेरी संपत्ति का हिस्सा नहीं दे रहा।
जब राजा ने दाहिने वाले व्यक्ति से पूछा, उसने कहा, "मेरा पिता, जो 350 साल का है, अभी भी जीवित है और उसने मुझे मेरा हिस्सा नहीं दिया। तो मैं अपने बेटे को कैसे दूं?" उस आदमी ने अपने 400 साल के पिता की ओर इशारा किया, जिन्होंने भी वही शिकायत की।* उन्होंने राजा से कहा कि संपत्ति के इस अंतहीन झगड़े की वजह से गांववालों ने उन्हें गांव से निकाल दिया है।
राजा हैरान होकर संत के पास लौटे और बोले, "धन्यवाद, आपने मुझे मृत्यु का महत्व समझाया। संत ने कहा, "मृत्यु के कारण ही इस संसार में प्रेम है।"*
मृत्यु के बारे में चिंता करने के बजाय, हर दिन और हर पल को खुशी से जियो। खुद को बदलो, दुनिया बदल जाएगी।

18/08/2025

*शंका समाधान*

क्या भगवान हमारे द्वारा चढ़ाया गया भोग खाते हैं ? यदि खाते हैं , तो वह वस्तु समाप्त क्यों नहीं हो जाती और यदि नहीं खाते हैं , तो भोग लगाने का क्या लाभ ?" - एक लड़के ने पाठ के बीच में अपने गुरु से प्रश्न किया । गुरु ने तत्काल कोई उत्तर नहीं दिया । वे पूर्ववत् पाठ पढ़ाते रहे । उस दिन उन्होंने पाठ के अन्त में एक श्लोक पढ़ाया -
*पूर्णमदःपूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥*

पाठ पूरा होने के बाद गुरु ने सभी शिष्यों से कहा कि वे पुस्तक देखकर श्लोक कंठस्थ कर लें ।

एक घंटे बाद गुरु ने प्रश्न करने वाले शिष्य से पूछा कि उसे श्लोक कंठस्थ हुआ कि नहीं । उस शिष्य ने पूरा श्लोक शुद्ध-शुद्ध गुरु को सुना दिया । फिर भी गुरु ने सिर 'नहीं' में हिलाया , तो शिष्य ने कहा कि - " वे चाहें , तो पुस्तक देख लें ; श्लोक बिल्कुल शुद्ध है ।” गुरु ने पुस्तक दिखाते हुए कहा - “ श्लोक तो पुस्तक में ही है , तो तुम्हें कैसे याद हो गया ?” शिष्य कुछ नहीं कह पाया ।

गुरु ने कहा - “ पुस्तक में जो श्लोक है , वह स्थूल रूप में है । तुमने जब श्लोक पढ़ा , तो वह सूक्ष्म रूप में तुम्हारे अंदर प्रवेश कर गया । उसी सूक्ष्म रूप में वह तुम्हारे मन में रहता है । इतना ही नहीं , जब तुमने इसको पढ़कर कंठस्थ कर लिया , तब भी पुस्तक के स्थूल रूप के श्लोक में कोई कमी नहीं आई । इसी प्रकार पूरे विश्व में व्याप्त परमात्मा हमारे द्वारा चढ़ाए गए निवेदन को सूक्ष्म रूप में ग्रहण करते हैं और इससे स्थूल रूप के वस्तु में कोई कमी नहीं होती । उसी को हम प्रसाद के रूप में स्वीकार करते हैं ।

शिष्य को उसके प्रश्न का उत्तर मिल चुका था ।

07/06/2025

एक दिन का पुण्य ही क्यूँ.......?

निर्जला एकादशी से अगले दिन एक भिखारी एक सज्जन की दुकान पर भीख मांगने पहुंचा। सज्जन व्यक्ति ने 1 रुपये का सिक्का निकाल ककिर उसे दे दिया।

भिखारी को प्यास भी लगी थी, वो बोला बाबूजी एक गिलास पानी भी पिलवा दो, गला सूखा जा रहा है।
सज्जन व्यक्ति ने गुस्से में कहा: तुम्हारे बाप के नौकर बैठे हैं क्या हम यहां, पहले पैसे, अब पानी, थोड़ी देर में रोटी मांगेगा, चल भाग यहाँ से।

भिखारी बोला: बाबूजी गुस्सा मत कीजिये मैं आगे कहीं पानी पी लूंगा। पर जहां तक मुझे याद है, कल आपने निर्जला एकादशी व्रत कथा का पाठ किया था, तथा कल इसी दुकान के बाहर मीठे पानी की छबील लगी थी और आप स्वयं लोगों को रोक रोक कर जबरदस्ती अपने हाथों से गिलास पकड़ा रहे थे, मुझे भी कल आपके हाथों से दो गिलास शर्बत पीने को मिला था। मैंने तो यही सोचा था,आप बड़े धर्मात्मा आदमी है, पर आज मेरा भरम टूट गया।

कल की छबील तो शायद आपने लोगों को दिखाने के लिये लगाई होगी?
मुझे आज आपने कड़वे वचन बोलकर अपना कल का सारा पुण्य खो दिया। मुझे छमा करना अगर मैं कुछ ज्यादा बोल गया हूँ तो।

सज्जन व्यक्ति को बात दिल पर लगी, उसकी नजरों के सामने बीते दिन का प्रत्येक दृश्य घूम गया। उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था। वह स्वयं अपनी गद्दी से उठा और अपने हाथों से गिलास में पानी भरकर उस बाबा को देते हुए उसे क्षमा प्रार्थना करने लगा।

भिखारी: बाबूजी मुझे आपसे कोई शिकायत नही, परन्तु अगर मानवता को अपने मन की गहराइयों में नही बसा सकते तो एक-दो दिन किये हुए पुण्य कार्य व्यर्थ ही हैं। *मानवता का मतलब तो हमेशा शालीनता से मानव व जीव की सेवा करना है।*

आपको अपनी गलती का अहसास हुआ, ये आपके व आपकी सन्तानों के लिये अच्छी बात है। आपका परिवार हमेशा स्वस्थ व दीर्घायु बना रहे ऐसी मैं कामना करता हूँ, यह कहते हुए भिखारी आगे बढ़ गया।

सेठ ने तुरंत अपने बेटे को आदेश देते हुए कहा: कल से दो घड़े पानी दुकान के आगे-आने जाने वालों के लिये जरूर रखे रहो। उसे अपनी गलती सुधारने पर बड़ी खुशी हो रही थी।

जय जय श्रीराधे

कहते हैं: "हर कहानी सिर्फ शब्दों का मेल नहीं होती, बल्कि कई गहरी अनुभव और आत्मिक सीख से भरी होती है।

1. धर्म दिखावे का नहीं, व्यवहार का होना चाहिए*

निर्जला एकादशी का व्रत करना या छबील लगाना एक दिन का पुण्य है, लेकिन असली धर्म रोज़मर्रा के *व्यवहार में झलकता है।* अगर व्रत करने के बाद हम किसी प्यासे को पानी देने में भी गुस्सा दिखाएं, तो वो धर्म अधूरा रह जाता है।

2. शब्दों की मिठास ही सच्ची सेवा है*

*भोजन, पैसा और वस्त्र* बाँटना बहुत बड़ी बात नहीं है। अगर हमारे *शब्दों में नम्रता और प्रेम* नहीं है, तो हमारी सेवा अधूरी है। किसी को झिड़ककर किया गया उपकार भी अपमान सा लगता है।

3. एक भूल भी पुण्य को मिटा सकती है*

एक बुरा व्यवहार, क्रोध में निकले कुछ शब्द, हमारे द्वारा कमाए हुए पूरे *पुण्य को व्यर्थ कर सकते हैं।* इसलिए विनम्रता और संयम हमेशा बनाए रखें।

4. मानवता का धर्म सबसे ऊपर है*

किसी की जात, रूप, या हैसियत देखकर व्यवहार करना *धर्म की आत्मा के खिलाफ है।* हर इंसान एक आत्मा है, और उसकी सेवा करना सच्ची भक्ति है।

5. गलती स्वीकार करना ही सच्चा बड़प्पन है*

सेठ जी ने जब अपनी गलती मानी और सुधार किया, तो वही क्षण उनके जीवन का *पुनर्जन्म* बन गया। अपनी भूल मान लेना कायरता नहीं, *सच्चा साहस* है।

निष्कर्ष :
*"सेवा करो, लेकिन सम्मान से

03/06/2025

भक्त के भाव को रखने का मान, हनुमानजी ने दिया स्वयं प्रमाण

एक समय अयोध्या के पहुंचे हुए संत श्री रामायण कथा सुना रहे थे। रोज एक घंटा प्रवचन करते कितने ही लोग आते और आनंद विभोर होकर जाते।

साधु महाराज का नियम था रोज कथा शुरू करने से पहले "आइए हनुमंत जी बिराजिए"कहकर हनुमानजी का आहवान करते थे, फिर एक घण्टा प्रवचन करते थे। एक वकील साहब हर रोज कथा सुनने आते। वकील साहब के भक्तिभाव पर एकदिन तर्कशीलता हावी हो गई उन्हें लगा कि महाराज रोज "आइए हनुमंत बिराजिए" कहते है तो क्या हनुमानजी सचमुच आते होंगे !

अत - वकील ने महात्माजी से एक दिन पूछ ही लिया - महाराजजी आप रामायण की कथा बहुत अच्छी कहते है हमें बड़ा रस आता है परंतु आप जो गद्दी प्रतिदिन हनुमानजी को देते है उस पर क्या हनुमानजी सचमुच बिराजते है ?

साधु महाराज ने कहा… हाँ यह मेरा व्यक्तिगत विश्वास है कि रामकथा हो रही हो तो हनुमानजी अवश्य पधारते है।

वकील ने कहा - महाराज ऐसे बात नहीं बनगी। हनुमानजी यहां आते है इसका कोई सबूत दीजिए! वकील ने कहा - आप लोगों को प्रवचन सूना रहे है सो तो अच्छा है लेकिन अपने पास हनुमानजी को उपस्थिति बताकर आप अनुचित तरीके से लोगों को प्रभावित कर रहे है। आपको साबित करके दिखाना चाहिए कि

हनुमानजी आपकी कथा सुनने आते है महाराजजी ने बहुत समझाया कि भैया आस्था को किसी सबूत की कसौटी पर नहीं कसना चाहिए यह तो भक्त और भगवान के बीच का प्रेम रस है व्यक्तिगत श्रद्घा का विषय है आप कहो तो मैं प्रवचन बंद कर दूँ या आप कथा मेंआना छोड़ दो ?

लेकिन वकील नहीं माना, कहता ही रहा कि आप कई दिनो से दावा करते आ रहे है यह बात और स्थानों पर भी कहते होगे इसलिए महाराज आपको तो साबित करना होगा कि हनुमानजी कथा सुनने आते है।

इस तरह दोनों के बीच वाद-विवाद होता रहा मौखिक संघर्ष बढ़ता चला गया हारकर साधु ने कहा - हनुमानजी है या नहीं उसका सबूत कल दिलाऊंगा। कल कथा शुरू हो तब प्रयोग करूंगा ?

जिस गद्दी पर मैं हनुमानजी को विराजित होने को कहता हूं आप उस गद्दी को अपने घर ले जाना कल अपने साथ उस गद्दी को लेकर आना फिर मैं कल गद्दी यहाँ रखूंगा मैं कथा से पहले हनुमानजी को बुलाऊंगा फिर आप गद्दी ऊँची करना, यदि आपने गद्दी ऊँची कर ली तो समझना कि हनुमान जी नहीं है । वकील इस कसौटी के लिए तैयार हो गया

महाराज ने कहा - हम दोनों में से जो पराजित होगा वह क्या करेगा, इसका निर्णय भी कर लें ? यह तो सत्य की परीक्षा है।

वकील ने कहा - मैं गद्दी ऊँची न कर सका तो वकालत छोड़कर आपसे दीक्षा लूंगा। आप पराजित हो गए तो क्या करोगे ?

साधु ने कहा - मैं कथावाचन छोड़कर आपके ऑफिस का चपरासी बन जाऊंगा। अगले दिन कथापंडाल में भारी भीड़ हुई जो लोग कथा सुनने रोज नही आते थे वे भी भक्ति, प्रेम और विश्वास की परीक्षा देखने आए।

काफी भीड़ हो गई। पंडाल भर गया, श्रद्घा और विश्वास का प्रश्न जो था। साधु महाराज और वकील साहब कथा पंडाल में प्यारे गद्दी रखी गई। महात्माजी ने सजल नेत्रों से मंगलाचरण किया और फिर बोले - आइए हनुमानजी पधारिए

ऐसा बोलते ही साधुजी की आंखे सजल हो उठी। मन ही मन साधु बोले… प्रभु! आज मेरा प्रश्न नहीं बल्कि रघुकुल रीति की पंरपरा का सवाल है मैं तो एक साधारण जन हूं। मेरी भक्ति और आस्था की लाज रखना। फिर वकील साहब को निमंत्रण दिया… आइए गद्दी ऊँची कीजिए। लोगों की आँखे जम गई। वकील साहब खड़ेे हुये। उन्होंने गद्दी लेने के लिए हाथ बढ़ाया पर गद्दी को स्पर्श भी न कर सके ?

जो भी कारण हो उन्होंने तीन बार हाथ बढ़ाया किन्तु तीनों बार असफल रहे। महात्माजी देख रहे थे गद्दी को पकड़ना तो दूर वो गद्दी की छू भी न सके तीनों बार वकील साहब पसीने से तर - बतर हो गए। वह वकील साधु के चरणों में गिर पड़े और बोले -… महाराजा उठाने का मुझे मालूम नहीं पर मेरा हाथ गद्दी तक भी पहुंच नहीं सकता, अत: मैं अपनी हार स्वीकार करता हूं।

मित्रों कहते है कि श्रद्घा और भक्ति के साथ की गई आराधना में बहुत शक्ति होती है मानों तो देव नहीं तो पत्थर। प्रभु की मूर्ति तो पाषाण की ही होती है लेकिन भक्त के भाव से उसमें प्राण प्रतिष्ठा होती है और प्रभु बिराजते है।

तुलसीदासजी कहते है - साधु चरित सुभ चरित

कषासू निरस बिसद गुनमय फल जासू

साधु का स्वभाव कपास जैसा होना चाहिए जो दूसरों के अवगुण को ढककर ज्ञान को अलख जगाए। जो ऐसा भाव प्राप्त कर ले वही साधु है श्रद्घा और विश्वास मन को शक्ति देते है संसार में बहुत कुछ ऐसा है जो हमारी तर्कशक्ति से,बुद्धि को सीमा से परे है..!!

01/06/2025

🌹श्री राम नाम की महिमा🌹

लंकापति रावण के वध के बाद जब अयोध्यापति प्रभु श्री राम की कीर्ति दूर-दूर तक फैल रही थी और वह मर्यादा पुरूषोतम कहलाने लगे थे।

तब एक दिन महादेव शिव की इच्छा भी मर्यादा पुरूषोतम श्रीराम से मिलने की हुई। पार्वती जी को संग लेकर महादेव कैलाश पर्वत से उतर कर अयोध्या नगरी के रास्ते पर चल पड़े।

भगवान शिव और मां पार्वती को अयोध्या आया देखकर श्री सीताराम जी बहुत खुश हुए। माता जानकी ने उनका उचित आदर सत्कार किया और स्वयं भोजन बनाने के लिए रसोई में चली गई। इस बीच भगवान शिव ने श्री राम जी से पूछाः-"आपके सेवक हनुमानजी दिखाई नहीं पड़ रहे हैं।" श्री राम बोलेः- "वे बगीचे में हैं।"

शिवजी ने श्रीराम जी से बगीचे में जाने की अनुमति मांगी और पार्वती जी का हाथ थाम कर बगीचे में आ गए। बगीचे की खूबसूरती देख कर उनका मन मोहित हो गया। आम के एक घने वृक्ष के नीचे हनुमान जी दीन-दुनियां से बेखबर गहरी नींद में सोए थे और एक लय में खर्राटों से राम नाम की ध्वनि उठ रही थी।

चकित होकर शिव जी और माता पार्वती एक दूसरे की ओर देखने लगे। माता पार्वती मुस्करा उठी और वृक्ष की डालियों की ओर इशारा किया। राम नाम सुनकर पेड़ की डालियां भी झूमने लगी थी और इनके बीच से भी राम नाम उच्चारित हो रहा था।

शिव जी इस राम नाम की धुन में मस्त मगन होकर खुद भी राम राम कहकर नाचने लगे। माता पार्वती जी ने भी अपने पति का अनुसरण किया और अपने कोमल पांव थिरकाने लगी। शिव जी और पार्वती जी के नृत्य से ऐसी झनकार उठी कि स्वर्गलोक के देवतागण भी आकर्षित होकर बगीचे में आ गए और राम नाम की धुन में सभी मस्त हो गए।

माता जानकी भोजन तैयार करके प्रतिक्षारत थीं परंतु संध्या घिरने तक भी अतिथि नहीं पधारे तब अपने देवर लक्ष्मण जी को बगीचे में भेजा। लक्ष्मण जी तो स्वयं को श्री राम का सेवक ही मानते थे, अत बगीचे में आकर जब उन्होंने धरती पर स्वर्ग का नजारा देखा तो खुद भी राम नाम की धुन में झुम उठे।

महल में माता जानकी परेशान हो रही थी की अभी तक भोजन ग्रहण करने कोई भी क्यों नहीं आया। उन्होंने श्री राम जी से कहा भोजन ठंडा हो रहा है चलिये हम ही जाकर बगीचे में से सभी को ले लाएं।

जब सीताराम जी बगीचे में गए तो वहां राम नाम की धूम मची हुई थी। हुनमान जी गहरी नींद में सोए हुए थे और उनके खर्राटों से अभी तक राम नाम निकल रहा था।

श्रीसियाराम भाव विहल हो उठे, राम जी ने हनुमान जी को नींद से जगाया और प्रेम से उनकी तरफ निहारने लगे।
हनुमान जी प्रभु को आया देख शीघ्रता से उठ खड़े हुए, नृत्य का समा भंग हो गया।

शिव जी खुले कंठ से हनुमान जी की राम भक्ति की सराहना करने लगे। हनुमान जी संकुचाए लेकिन मन ही मन खुश हो रहे थे।श्री सियाराम ने भोजन करने का आग्रह भगवान शिव जी से किया।सभी लोग महल में भोजन करने के लिए चल पड़े। माता जानकी भोजन परोसने लगी। हनुमान जी को भी श्री राम जी ने पंक्ति में बैठने का आदेश दिया। हनुमान जी बैठ तो गए पंरतु आदत ऐसी थी की राम जी के भोजन करने के उपरांत ही सभी लोग भोजन करते थे।

आज श्री राम के आदेश से पहले भोजन करना पड़ रहा था। माता जानकी हनुमान जी को भोजन परोसती जा रही थी पर हनुमान का पेट ही नहीं भर रहा था। सीता जी कुछ समय तक तो उन्हें भोजन परोसती रही फिर समझ गई इस तरह से तो हनुमान जी का पेट नहीं भरेगा।

उन्होंने तुलसी के एक पत्ते पर राम नाम लिखा और भोजन के साथ हनुमान जी को परोस दिया। तुलसी पत्र खाते ही हनुमान जी को संतुष्टी मिली और न
भगवान शिव शंकर ने प्रसन्न होकर हनुमान जी को आशीर्वाद दिया कि आप की राम भक्ति युगों-युगों तक याद की जाएगी और आप संकट मोचन कहलाएंगे।

संकट हरै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।

28/05/2025

शंका समाधान

क्या भगवान हमारे द्वारा चढ़ाया गया भोग खाते हैं ? यदि खाते हैं , तो वह वस्तु समाप्त क्यों नहीं हो जाती और यदि नहीं खाते हैं , तो भोग लगाने का क्या लाभ ?" - एक लड़के ने पाठ के बीच में अपने गुरु से प्रश्न किया । गुरु ने तत्काल कोई उत्तर नहीं दिया । वे पूर्ववत् पाठ पढ़ाते रहे । उस दिन उन्होंने पाठ के अन्त में एक श्लोक पढ़ाया -
*पूर्णमदःपूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥*

पाठ पूरा होने के बाद गुरु ने सभी शिष्यों से कहा कि वे पुस्तक देखकर श्लोक कंठस्थ कर लें ।

एक घंटे बाद गुरु ने प्रश्न करने वाले शिष्य से पूछा कि उसे श्लोक कंठस्थ हुआ कि नहीं । उस शिष्य ने पूरा श्लोक शुद्ध-शुद्ध गुरु को सुना दिया । फिर भी गुरु ने सिर 'नहीं' में हिलाया , तो शिष्य ने कहा कि - " वे चाहें , तो पुस्तक देख लें ; श्लोक बिल्कुल शुद्ध है ।” गुरु ने पुस्तक दिखाते हुए कहा - “ श्लोक तो पुस्तक में ही है , तो तुम्हें कैसे याद हो गया ?” शिष्य कुछ नहीं कह पाया ।

गुरु ने कहा - “ पुस्तक में जो श्लोक है , वह स्थूल रूप में है । तुमने जब श्लोक पढ़ा , तो वह सूक्ष्म रूप में तुम्हारे अंदर प्रवेश कर गया । उसी सूक्ष्म रूप में वह तुम्हारे मन में रहता है । इतना ही नहीं , जब तुमने इसको पढ़कर कंठस्थ कर लिया , तब भी पुस्तक के स्थूल रूप के श्लोक में कोई कमी नहीं आई । इसी प्रकार पूरे विश्व में व्याप्त परमात्मा हमारे द्वारा चढ़ाए गए निवेदन को सूक्ष्म रूप में ग्रहण करते हैं और इससे स्थूल रूप के वस्तु में कोई कमी नहीं होती । उसी को हम प्रसाद के रूप में स्वीकार करते हैं ।

शिष्य को उसके प्रश्न का उत्तर मिल चुका था ।

30/04/2025

मूल्यांकन

“मैं तुझसे श्रेष्ठ हूँ “ को लेकर दी शिष्यों में झगड़ा हो रहा था ।झगड़ा बढ़ने लगा तो एक सेवक दौड़कर गुरु जी के पास गया और बोला, गुरु जी वहाँ दो शिष्यों में झगड़ा हो रहा है । गुरु जी वहाँ से उठकर गए और उन दोनों शिष्यों से बोले, “क्या हुआ “? तुम दोनों किस बात पर उतना झगड़ रहे हो? पहला शिष्य बोला- गुरु जी मैं इससे अधिक श्रेष्ठ हूँ, मेरे कमान से निकला हर तीर निशाने पर जा कर लगता है ।
दूसरा शिष्य बोला कि मैं इससे अधिक श्रेष्ठ हूँ क्योंकि मेरा भला एक ही बार में चार पेड़ों को चीर देता है । गुरु जी बोले- ठीक है में तुम दोनों की परीक्षा लेता हूँ, जिसने वह पास कर ली वही श्रेष्ठ है । उन्होंने दोनों के शस्त्र बदल दिए और बोले, “ अब तुम अचूक निशाना लगाओ और तुम एक भाले से चार पेड़ चीर कर दिखाओ । दोनों शिष्य फेल हो गए । un दोनों को देख कर गुरु जी बोले “ बेटा, इस संसार में हर व्यक्ति अपने आप में श्रेष्ठ है । इसलिए हमें कभी खुद को किसी से श्रेष्ठ नहीं आंकना चाहिए क्योंकि जो तुम कर सकते हो ऐसा दूसरा नहीं कर सकता है। और जो दूसरा कर सकता है वह तुम नहीं कर सकते । महत्त्व दोनों का ही है ।
शिष्यों को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन दोनों ने गुरु जी से क्षमा माँगी ।

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