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प्लूटो पर बह रहा है तरल नाइट्रोजन? NASA के New Horizons ने खोजे हैरान करने वाले संकेत!प्लूटो को हमेशा एक ठंडी और जमी हुई...
17/09/2026

प्लूटो पर बह रहा है तरल नाइट्रोजन? NASA के New Horizons ने खोजे हैरान करने वाले संकेत!

प्लूटो को हमेशा एक ठंडी और जमी हुई दुनिया माना जाता रहा है लेकिन नासा के New Horizons मिशन के पुराने डेटा की नई जांच ने इसे और रहस्यमयी बना दिया है। वैज्ञानिकों को प्लूटो की सतह पर हाल में तरल नाइट्रोजन के बहने के संकेत मिले हैं।

ये संकेत प्लूटो के Sputnik Planitia नाम के विशाल बर्फीले क्षेत्र में मिले हैं। यह प्लूटो के प्रसिद्ध दिल जैसी दिखाई देने वाली सतह का हिस्सा है और मुख्य रूप से नाइट्रोजन की बर्फ से बना है।

New Horizons की 2015 में ली गई तस्वीरों में इस क्षेत्र की बर्फ पर कुछ गहरे रंग के निशान दिखाई दिए। वैज्ञानिकों के अनुसार इन निशानों की बनावट ऐसी है,जैसे किसी तरल पदार्थ ने बर्फ को गीला करके वहां से बहाव किया हो। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल है,इतनी ठंडी जगह पर तरल नाइट्रोजन आया कहां से?

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह नाइट्रोजन बर्फ की मोटी परत के नीचे से ऊपर आया हो सकता है। प्लूटो के वातावरण और तापमान को देखते हुए वहां बारिश के रूप में तरल नाइट्रोजन का गिरना संभव नहीं माना जाता। इसलिए वैज्ञानिकों ने बर्फ के नीचे पिघलने और दरारों के रास्ते तरल नाइट्रोजन के सतह तक पहुंचने की संभावना बताई है।

यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि प्लूटो की सतह आज भी पूरी तरह निष्क्रिय और जमी हुई नहीं है। वहां बर्फ और संभवतः तरल पदार्थों की गतिविधियां अभी भी हो सकती हैं। हालांकि वैज्ञानिकों ने तरल नाइट्रोजन को अपनी आंखों से बहते हुए नहीं देखा है। यह निष्कर्ष New Horizons की तस्वीरों में दिखाई देने वाली सतह की बनावट और उनके वैज्ञानिक विश्लेषण पर आधारित है। इसलिए इसे अभी तरल नाइट्रोजन के बहने का प्रमाण या मजबूत संकेत कहना ज्यादा सही है।

ऊनी गैंडे की सच्ची कहानी: ठंडे साइबेरिया से नहीं बल्कि नरम मौसम वाले इलाकों से मिली सफलता?पुराने DNA और प्लीस्टोसीन काल ...
17/09/2026

ऊनी गैंडे की सच्ची कहानी: ठंडे साइबेरिया से नहीं बल्कि नरम मौसम वाले इलाकों से मिली सफलता?

पुराने DNA और प्लीस्टोसीन काल के रहने की जगहों के एक नए अध्ययन से एक चौंकाने वाली बात सामने आई है। आइस एज के प्रसिद्ध ऊनी गैंडे (woolly rhinoceros) की विकासवादी सफलता का सबसे बड़ा कारण शायद साइबेरिया के जमे हुए इलाके नहीं थे बल्कि यूरेशिया के हल्के और नरम मौसम वाले इलाके ही उनके पनपने का मुख्य आधार रहे।

लंबे समय से लोग मानते थे कि ऊनी गैंडा ठंडे और बर्फीले इलाकों का जानवर है। साइबेरिया से उसके सबसे ज्यादा अवशेष मिलने के कारण यही धारणा बनी हुई थी। लेकिन नए शोध ने इस धारणा को बदल दिया है।

वैज्ञानिकों ने यूरेशिया के अलग-अलग हिस्सों से मिले 183 जीवाश्मों की जाँच की। इनमें से 29 माइटोकॉन्ड्रियल और 14 न्यूक्लियर जीनोम निकाले गए। इनके विश्लेषण से पता चला कि ऊनी गैंडे की आनुवंशिक विविधता मुख्य रूप से मध्य-अक्षांश वाले समशीतोष्ण क्षेत्रों में विकसित हुई। यह लगभग 4 लाख 60 हजार से 4 लाख 20 हजार साल पहले की बात है। उस समय हिमनद और अंतर-हिमनद काल का लंबा संक्रमण चल रहा था।

खास बात यह है कि पूर्वी एशिया का एक लगभग 1 लाख 70 हजार साल पुराना नमूना बाद की सभी आबादियों का पूर्वज निकला। इससे लगता है कि लेट प्लीस्टोसीन काल की वंशावली का एक बड़ा स्रोत पूर्वी एशिया ही रहा। अल्ताई क्षेत्र गर्म समय में इनके लिए एक सुरक्षित शरणस्थल और फैलाव का केंद्र बना रहा।

यह बात ऊनी मैमथ से अलग है। मैमथ की आनुवंशिक विविधता ज्यादातर ठंडे उत्तरी साइबेरिया में विकसित हुई थी। ऊनी गैंडे का मामला उलटा है। उनकी ज्यादातर विविधता और सफलता नरम मौसम वाले इलाकों से जुड़ी रही।

इस अध्ययन से एक और दिलचस्प बात सामने आई। ऊनी गैंडों ने मर्क के गैंडे नामक एक अन्य प्रजाति के साथ भी संकरण किया था। यह प्रजाति गर्म जलवायु के अनुकूल थी।

कुल मिलाकर यह शोध बताता है कि ठंडे अनुकूलित जानवरों की भी आनुवंशिक विविधता अक्सर निचले अक्षांशों में पैदा होती है और वहीं बनी रहती है। पहले शोध ज्यादातर उत्तरी ठंडे इलाकों पर केंद्रित थे क्योंकि वहाँ DNA बेहतर संरक्षित रहता है। अब मध्य-अक्षांश क्षेत्रों पर ध्यान देने से नई तस्वीर साफ हुई है।

यह खोज ऊनी गैंडे की कहानी को और गहराई से समझने में मदद करती है। यह भी याद दिलाती है कि विलुप्त प्रजातियों के अध्ययन में सिर्फ ठंडे इलाकों तक सीमित रहना पर्याप्त नहीं है।

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पृथ्वी का आकार बदल रहा है? पृथ्वी एक साथ ज़्यादा गोल और कम गोल हो रही है!हमारी पृथ्वी पूरी तरह गोल नहीं है। यह थोड़ी सी ...
17/09/2026

पृथ्वी का आकार बदल रहा है? पृथ्वी एक साथ ज़्यादा गोल और कम गोल हो रही है!

हमारी पृथ्वी पूरी तरह गोल नहीं है। यह थोड़ी सी चपटी है। ध्रुवों पर थोड़ी पिचकी हुई और बीच में (भूमध्य रेखा पर) थोड़ी उभरी हुई। इसे वैज्ञानिक भाषा में ओब्लेट स्फेरॉयड कहते हैं।

अब नया अध्ययन बताता है कि पृथ्वी का आकार बदल रहा है। और मज़े की बात यह है कि यह एक ही समय में दो तरह से बदल रहा है। एक तरफ ज़्यादा गोल हो रही है,दूसरी तरफ कम गोल।

क्या हो रहा है?
ग्रीस के वैज्ञानिक क्रिस्टोफर कोत्साकिस ने 1997 से 2015 तक के आंकड़ों का अध्ययन किया। उन्होंने पृथ्वी की सतह पर लगे सैटेलाइट स्टेशनों (जीएनएसएस) के आंकड़े देखे।

उनके अनुसार:
* ध्रुवों पर ज़मीन ऊपर उठ रही है। पहले यह उठान साल में आधा मिलीमीटर था,बाद में एक मिलीमीटर हो गया।
* भूमध्य रेखा के आसपास ज़मीन थोड़ी नीचे धंस रही है।
इससे पृथ्वी की ठोस चट्टानी सतह कम चपटी हो रही है यानी ठोस पृथ्वी थोड़ी ज़्यादा गोल हो रही है लेकिन गुरुत्वाकर्षण से जुड़े आकार (जिसे जियोइड कहते हैं) में उलटा हो रहा है। वह ज़्यादा चपटा हो रहा है।

ऐसा क्यों हो रहा है?
मुख्य वजह है ध्रुवों पर बर्फ का पिघलना। ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की बर्फ तेज़ी से पिघल रही है। बर्फ का वजन कम होने से नीचे की ज़मीन ऊपर उठने लगती है। यह प्रक्रिया पहले से चल रही थी,अब तेज़ हो गई है।
पिघला पानी समुद्र में जाकर फैल जाता है। यह पानी भूमध्य रेखा की तरफ ज़्यादा इकट्ठा होता है। इससे वहाँ वजन बढ़ जाता है और ज़मीन थोड़ी धंसती है। ठोस ज़मीन एक कहानी बता रही है और पानी-बर्फ का द्रव्यमान दूसरी कहानी। इसलिए दोनों माप अलग-अलग दिशा में जा रहे हैं।

कितना बदलाव है?
यह बदलाव बहुत छोटा है,साल में कुछ मिलीमीटर। आँखों से दिखने वाला नहीं है। लेकिन आधुनिक मशीनें इसे माप लेती हैं। अध्ययन बताता है कि यह प्रक्रिया पहले से तेज़ हो रही है। बर्फ पिघलने की रफ्तार बढ़ने से यह बदलाव और तेज़ हो सकता है।

निष्कर्ष
पृथ्वी स्थिर नहीं है। उसकी सतह और उसके अंदर का द्रव्यमान लगातार थोड़ा-थोड़ा बदल रहा है। बर्फ पिघलना,पानी का फैलना और ज़मीन का ऊपर-नीचे होना,ये सब मिलकर पृथ्वी के आकार को प्रभावित कर रहे हैं। एक तरफ ठोस पृथ्वी थोड़ी गोल हो रही है,दूसरी तरफ गुरुत्वाकर्षण वाला आकार थोड़ा चपटा। दोनों एक साथ हो रहे हैं। यही नई खोज का मुख्य बिंदु है।

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11309 अरब टन बर्फ पिघल गईं है! ग्रीनलैंड-अंटार्कटिका ने समुद्र का जलस्तर 31.4 मिमी बढ़ गया?1979 से 2023 के बीच ग्रीनलैंड...
17/09/2026

11309 अरब टन बर्फ पिघल गईं है! ग्रीनलैंड-अंटार्कटिका ने समुद्र का जलस्तर 31.4 मिमी बढ़ गया?

1979 से 2023 के बीच ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका से बहुत बड़ी मात्रा में बर्फ पिघल गई है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस दौरान कुल 11309 अरब टन बर्फ खत्म हो गई।

इस बर्फ के पिघलने से समुद्र का जलस्तर 31.4 मिलीमीटर यानी करीब 3 सेंटीमीटर बढ़ गया है। ज्यादातर नुकसान ग्लेशियरों की वजह से हुआ है। लगभग 84% बर्फ ग्लेशियरों के तेज गति से समुद्र में गिरने से खत्म हुई। बाकी 16% बर्फ सतह पर पिघलने से गई।

ग्रीनलैंड में बर्फ का नुकसान अंटार्कटिका से ज्यादा रहा। अंटार्कटिका में लगभग सारा नुकसान ग्लेशियरों की गति बढ़ने से हुआ जबकि ग्रीनलैंड में ग्लेशियर और सतह पर पिघलाव दोनों की भूमिका रही। 1990 के दशक के बाद यह नुकसान तेज हो गया। पहले साल में कम बर्फ जाती थी लेकिन बाद के वर्षों में नुकसान काफी बढ़ गया।

यह जानकारी उपग्रहों से मिले आंकड़ों पर आधारित है। वैज्ञानिकों ने कई सालों के आंकड़ों को जोड़कर यह निष्कर्ष निकाला है। समुद्र का जलस्तर बढ़ने से तटीय इलाकों में बाढ़ और कटाव का खतरा बढ़ता है। इसलिए यह विषय बहुत महत्वपूर्ण है।

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12 साल का यह बच्चा 130 पक्षियों की आवाज़ें निकालता है,बर्ड ऐप भी खा जाता है धोखा!अमेरिका के ओक्लाहोमा राज्य में सैमुअल ह...
16/09/2026

12 साल का यह बच्चा 130 पक्षियों की आवाज़ें निकालता है,बर्ड ऐप भी खा जाता है धोखा!

अमेरिका के ओक्लाहोमा राज्य में सैमुअल हेंडरसन नाम का एक 12 साल का लड़का रहता है। ये लड़का 130 से ज्यादा पक्षियों की आवाज़ इतनी अच्छी तरह से निकालता है कि सुनने वाले हैरान हो जाते हैं।

सैमुअल ने ये कला 4 साल की उम्र में शुरू की थी। एक दिन वो चिड़ियाघर गया था। वहाँ एक पक्षी (ग्रेट-टेल्ड ग्रैकल) की आवाज़ सुनी। उसने वही आवाज़ निकालकर जवाब दिया। पक्षी ने भी उसकी आवाज़ पर जवाब दिया। तब से सैमुअल पक्षियों की आवाज़ें सीखने लगा।

वो घर के बाहर पक्षियों को सुनता है और यूट्यूब पर वीडियो देखकर प्रैक्टिस करता है। अब वो उल्लू,हॉक,कबूतर,सीगल और कई दूसरे पक्षियों की आवाज़ें निकाल लेता है। उसकी आवाज़ें इतनी असली लगती हैं कि Merlin Bird ID नाम का ऐप भी कई बार धोखा खा जाता है। ये ऐप पक्षियों की आवाज़ पहचानने के लिए बनाया गया है। जब सैमुअल आवाज़ निकालता है तो ऐप उसे असली पक्षी की आवाज़ बता देता है।

स्कूल के टैलेंट शो में जब सैमुअल ने पक्षियों की आवाज़ें निकालीं तो वीडियो वायरल हो गया। लोग सोशल मीडिया पर उसकी तारीफ करने लगे। सैमुअल को ऑटिज़्म और टॉरेट सिंड्रोम है। लेकिन उसने इसे अपनी ताकत बना लिया है। वो भविष्य में पक्षियों का विशेषज्ञ या आवाज़ का कलाकार बनना चाहता है।

ये कहानी बताती है कि अगर किसी चीज़ में दिलचस्पी हो तो मेहनत से बड़ी चीज़ हासिल की जा सकती है।

आंसू की बूंद जैसा दिखता है यह आइलैंड,रात होते ही पानी में चमकती है नीली रोशनी?लक्षद्वीप का बंगाराम द्वीप प्रकृति का एक ऐ...
16/09/2026

आंसू की बूंद जैसा दिखता है यह आइलैंड,रात होते ही पानी में चमकती है नीली रोशनी?

लक्षद्वीप का बंगाराम द्वीप प्रकृति का एक ऐसा कोना है जो दिन में जितना शांत और खूबसूरत दिखता है,रात में उतना ही जादुई हो जाता है।

आंसू की बूंद जैसा आकार
ऊंचाई या हवाई जहाज से देखने पर बंगाराम द्वीप बिल्कुल पानी की एक बूंद या आंसू की बूंद जैसा दिखाई देता है। इसके चारों तरफ सफेद मखमली रेत और कांच जैसा पारदर्शी नीला पानी फैला है। यह द्वीप इतना साफ और शांत है कि पानी के नीचे तैरती मछलियां और मूंगे ऊपर से ही साफ नजर आते हैं।

रात में चमकते नीले 'तारे'
रात होते ही इस द्वीप का समुद्र एक अलग ही रूप ले लेता है। जब लहरें किनारे से टकराती हैं तो पानी में नीले रंग की तेज रोशनी चमकने लगती है। ऐसा लगता है मानो आसमान के तारे टूटकर समंदर की लहरों पर तैर रहे हों।
* यह चमक क्यों होती है? पानी में बहुत छोटे-छोटे समुद्री जीव (फाइटोप्लांकटन) होते हैं,जिन्हें हम खुली आंखों से सीधे नहीं देख सकते।
* रोशनी कैसे निकलती है? जब लहरों के हिलने-डुलने या किनारे से टकराने से इन जीवों में हलचल होती है तो उनके शरीर के अंदर एक प्राकृतिक रासायनिक क्रिया होती है। इसी हलचल के कारण वे नीली रोशनी छोड़ते हैं।
* बायोल्यूमिनेसेंस: विज्ञान की भाषा में जीव-जंतुओं से निकलने वाली इस रोशनी को बायोल्यूमिनेसेंस कहा जाता है।

अगर रात के समय इस पानी में हाथ डाला जाए या भीगी रेत पर कदम रखा जाएं तो कदमों के निशान भी कुछ पलों के लिए नीले रंग में चमक उठते हैं। कुदरत का यह अनोखा संगम बंगाराम द्वीप को दुनिया के सबसे खूबसूरत द्वीपों में शामिल करता है।

धरती गर्म करने वाली गैस को ज्वालामुखी के बादल ने नष्ट कर दिया?साल 2022 में दक्षिण प्रशांत महासागर में टोंगा ज्वालामुखी क...
16/09/2026

धरती गर्म करने वाली गैस को ज्वालामुखी के बादल ने नष्ट कर दिया?

साल 2022 में दक्षिण प्रशांत महासागर में टोंगा ज्वालामुखी का भयंकर विस्फोट हुआ था। यह विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि राख,गैस और समुद्री पानी का विशाल बादल आसमान की ऊँचाई तक पहुँच गया। वैज्ञानिकों ने जब इस बादल का अध्ययन किया तो उन्हें एक हैरान करने वाली बात पता चली। ज्वालामुखी से निकले मीथेन गैस का कुछ हिस्सा उसी के बादल ने खुद नष्ट कर दिया।

मीथेन एक खतरनाक गैस है जो धरती को गर्म करने में बहुत योगदान देती है। आमतौर पर ज्वालामुखी फटने पर मीथेन बाहर निकलती है लेकिन इस बार बादल ने उसका कुछ भाग साफ भी कर दिया।

वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों में फॉर्मल्डिहाइड नामक पदार्थ की बहुत ज्यादा मात्रा देखी। यह पदार्थ तभी बनता है जब मीथेन टूटती है। आम तौर पर फॉर्मल्डिहाइड कुछ घंटों में गायब हो जाता है लेकिन यह बादल 10 दिनों तक दिखाई देता रहा। इससे साफ हुआ कि मीथेन लगातार नष्ट हो रही थी।

अनुमान के मुताबिक ज्वालामुखी से करीब 3 लाख टन मीथेन निकली थी। उसी में से हर दिन लगभग 900 टन मीथेन खत्म हो रही थी।

यह काम कैसे हुआ? विस्फोट में समुद्री खारा पानी और ज्वालामुखी की राख ऊपर चली गई। सूरज की रोशनी पड़ने पर इनमें से क्लोरीन नामक तत्व बना। क्लोरीन ने मीथेन को तोड़ दिया। वैज्ञानिकों के लिए यह खोज पूरी तरह नई और हैरान करने वाली है। पहले ऐसा निचले आसमान में देखा गया था लेकिन ऊँचे आसमान में ज्वालामुखी के बादल में यह पहली बार नजर आया।

यह खोज बताती है कि प्रकृति कभी-कभी खुद ही प्रदूषण साफ करने का तरीका निकाल लेती है। इससे जलवायु परिवर्तन को समझने और मीथेन कम करने के नए तरीकों पर सोचने में मदद मिल सकती है।

कुल मिलाकर टोंगा का यह विस्फोट सिर्फ तबाही नहीं लाया बल्कि वैज्ञानिकों को एक नई और रोचक जानकारी भी दे गया।

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अमेरिका ने पहली बार माना,अंतरिक्ष में हथियार तैनात कर दिए?अमेरिका ने हाल ही में एक बड़ा खुलासा किया है। अमेरिकी वायुसेना...
16/09/2026

अमेरिका ने पहली बार माना,अंतरिक्ष में हथियार तैनात कर दिए?

अमेरिका ने हाल ही में एक बड़ा खुलासा किया है। अमेरिकी वायुसेना के सचिव ट्रॉय मींक ने कहा कि अमेरिका ने पृथ्वी की कक्षा में हथियार तैनात कर रखे हैं। यह पहली बार है जब अमेरिका ने खुद स्वीकार किया है कि उसके पास अंतरिक्ष में हथियार मौजूद हैं।

मींक ने 14 सितंबर 2026 को एक सम्मेलन में यह बात कही। उन्होंने बताया कि अमेरिका के पास ऑन-ऑर्बिट स्पेस कंट्रोल वेपन्स यानी कक्षा में तैनात हथियार हैं। ये हथियार दुश्मन की किसी भी हमले या कार्रवाई से अमेरिकी सेना की सुरक्षा कर सकते हैं।

हालांकि उन्होंने हथियारों के बारे में कोई विस्तार नहीं बताया। किस तरह के हथियार हैं,कब भेजे गए और कितने हैं,इस बारे में नहीं बताया। बस इतना कहा गया कि ये हथियार दुश्मन की गतिविधियों को रोकने या नुकसान पहुंचाने में सक्षम हैं।

अमेरिका का कहना है कि चीन और रूस अंतरिक्ष में अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहे हैं। इसलिए अमेरिका को भी अपनी सुरक्षा के लिए ये कदम उठाना पड़ा। अमेरिका का मानना है कि अब अंतरिक्ष भी युद्ध का हिस्सा बन सकता है,इसलिए तैयारी जरूरी है।

इस बयान के बाद चीन और रूस ने प्रतिक्रिया दी है। चीन ने कहा कि अंतरिक्ष को युद्ध का मैदान न बनाया जाए और हथियारों की होड़ न बढ़ाई जाए। रूस ने भी कहा कि अंतरिक्ष को हथियारों से सुरक्षित क्षेत्र रखा जाए।

यह खुलासा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब तक कोई भी देश इतने खुले तौर पर अंतरिक्ष में हथियार होने की बात नहीं मानता था लेकिन अमेरिका ने यह बात खुद ही स्वीकार कर लिया है। इससे अंतरिक्ष में शक्ति संतुलन और प्रतिस्पर्धा बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

#अमेरिकाकाखुलासा #चीनरूस #ऑर्बिटलवेपन्स

धरती के नीचे 1800 मील गहराई में दुनिया के सभी समुद्रों से 3 गुना ज्यादा पानी छुपा है लेकिन यह पानी बहता नहीं है!धरती के ...
15/09/2026

धरती के नीचे 1800 मील गहराई में दुनिया के सभी समुद्रों से 3 गुना ज्यादा पानी छुपा है लेकिन यह पानी बहता नहीं है!

धरती के सीने में 1800 मील (लगभग 2900 किलोमीटर) गहराई तक पानी की मौजूदगी आधुनिक भूविज्ञान की सबसे बड़ी खोजों में से एक है। यह कोई तैरता हुआ दरिया नहीं बल्कि ठोस पत्थरों के भीतर छुपा एक विशाल भंडार है।

इस खोज से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण तथ्य:
* पत्थरों में जकड़ा अदृश्य पानी: पाताल में हजारों डिग्री तापमान और भयंकर दबाव के कारण पानी तरल रूप में नहीं रह सकता। यहाँ पानी खनिजों के क्रिस्टल ढांचे (परमाणुओं) के बीच रासायनिक रूप से फंसा हुआ है,ठीक वैसे ही जैसे किसी सूखे स्पंज के भीतर नमी समाई रहती है।
* महासागरों से तीन गुना बड़ा भंडार: जमीन से 400 से 660 किमी नीचे 'रिंगवुडाइट' नाम का खनिज पाया जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस परत के पत्थरों में सतह के सभी महासागरों के कुल जल से 1 से 3 गुना अधिक पानी समाया हुआ है।
* 1800 मील नीचे रासायनिक प्रक्रिया: यह गहराई धरती के मेंटल और लोहे से बने बाहरी कोर की सीमा है। जब टेक्टोनिक प्लेटें नीचे धंसती हैं तो वे सतह की नमी को इस सीमा तक ले जाती हैं। हालिया शोध बताते हैं कि यह पानी कोर के पिघले लोहे के साथ मिलकर सिलिका और हाइड्रोजन की एक नई रासायनिक परत बनाता है।
* पृथ्वी का इंजन चालू रखने वाला ईंधन: अगर गहराई में यह पानी न हो तो मेंटल की चट्टानें सूखकर सख्त हो जाएंगी। पानी की मौजूदगी ही चट्टानों को जरूरी लचीलापन देती है,जिससे टेक्टोनिक प्लेट्स खिसकती हैं,ज्वालामुखी सक्रिय रहते हैं और वायुमंडल में गैसों का संतुलन बना रहता है।
1800 मील नीचे पत्थरों के भीतर कैद यह पानी धरती के आंतरिक संतुलन और सतह पर जीवन के बने रहने की मुख्य कड़ी है।

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15/09/2026

Does Earth's atmosphere also stabilize small bodies coming from space?

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