14/07/2026
क्या हो अगर मैं कहूँ कि हिमालय में दशकों से बर्फबारी का हिसाब ही गलत लगाया जा रहा था?
शोधकर्ताओं ने पाया कि हिमालय में दशकों से बर्फबारी का आकलन कम किया जा रहा था। इसका मुख्य कारण यह था कि पारंपरिक वर्षामापी तेज़ हवा में गिरने वाली बर्फ का बड़ा हिस्सा माप ही नहीं पाते थे। नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने झीलों के तल में लगाए गए जल-दाब (Water Pressure) सेंसर का उपयोग करके बर्फबारी मापने की एक नई तकनीक विकसित की,जिससे कहीं अधिक सटीक अनुमान मिले।
मुख्य बातें:
* पुराने उपकरण मूल रूप से बारिश मापने के लिए बनाए गए थे,इसलिए हिमालय की तेज़ हवाओं और भारी बर्फबारी में वे अक्सर कम माप दर्ज करते थे।
* शोध के अनुसार, हिमाचल प्रदेश के लेक हम्पटा क्षेत्र में केवल एक सर्दी के मौसम में पुराने अनुमानों ने कुल मौसमी बर्फबारी को लगभग 37% कम आंका। कुछ पर्वतीय क्षेत्रों में जल संसाधनों का अनुमान वर्षों से 50–100% तक कम लगाया जाता रहा है।
* नई तकनीक में वैज्ञानिकों ने झीलों के तल में वॉटर-प्रेशर सेंसर लगाए। जब जमी हुई झील पर बर्फ जमा होती है तो उसका भार नीचे पानी के दबाव को बदल देता है। इसी बदलाव से बर्फ का वास्तविक जल-समतुल्य अधिक सटीक रूप से मापा जा सकता है।
* यह तकनीक भारत,नेपाल और पूरे पश्चिमी-मध्य हिमालय में पानी की उपलब्धता,सिंचाई,जलविद्युत उत्पादन और बाढ़/सूखे के पूर्वानुमान को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है।
यह शोध यह नहीं कहता कि हिमालय में पहले जितनी सोची गई उससे ज़्यादा बर्फ गिर रही है बल्कि यह बताता है कि हम उसे सही तरीके से माप नहीं पा रहे थे। नई तकनीक से हिमालय के हिम संसाधनों का कहीं अधिक विश्वसनीय आकलन संभव होगा,जो दक्षिण एशिया के करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा और जलवायु अध्ययन के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
Research, Nature, Snow, Mountain, Geology, Environment, Climate, HindiFacts, SpaceAndScience, ScienceReels, ViralReels, Facts, TrendingNews