17/04/2026
1913 में दादा साहब फाल्के ने अपनी बुद्धि-बल, जी-जान, खून-पसीना सब झोंककर, 6 महीने में क़रीब 15000 की लागत के साथ राजा हरिश्चंद्र बनाई थी।
अब फ़िल्म तो बना ली, तब मुंबई के कोरोनेशन सिनेमा की ये पहली फ़िल्म थी जो शायद 23 दिनों तक चली, पर तब 40 मिनट्स की फ़िल्म चलाने का खर्च इतना था कि इतनी मेहनत के बाद भी, दादा साहबफाल्के को हरिश्चंद्र से मात्र 3 रुपये की कमाई हुई।
इससे फाल्के साहब निराश उदास परेशान थे कि उनको एक आइडिया आया, उन्होंने गुजराती अखबारों में अपनी फ़िल्म का इश्तेहार छपवा दिया कि 1 आने में इत्ती बड़ी फ़िल्म दिखाएंगे, इत्ती सारी (कोई 57 हज़ार) तस्वीरें दिखाएंगे कि दंग रह जाओगे।
सारे गुजराती जोइए छे जोइए छे करते राजा हरिश्चंद्र देखने आने लगे और जिस फ़िल्म की कमाई 23 दिन में मात्र 3 रुपये पर पहुँची थी, वो प्रति दिन 300 रुपये कमाने लगी। मुझे तो पूरा यकीन है कि इस आइडिया के पीछे राजा हरिश्चंद्र के राइटर रणछोड़भाई उदयराम गुजराती का ही दिमाग था। राजा हरिश्चंद्र की कमाई से ही दादा साहब ने फ़िल्म इंडस्ट्री की नींव रखी थी।
इसके 18 साल बाद, 1931 में जब आलम आरा आई, तो उसने भी 2 और दायरे तोड़ डाले। पहला दायरा तो ये टूटा कि वो भारत की पहली ‘बोलती फ़िल्म बनी’ उसमें dialogues आए। दूसरा ये कि उस फ़िल्म ने तब, 1931 में क़रीब 30 लाख की कमाई कर डाली! जिसकी लागत मात्र 40 हज़ार रुपए थी।
इसके 12 साल बाद, अशोक कुमार की किस्मत में किस्मत नाम की ऐसी फ़िल्म आई कि वो भारत की पहली 1 करोड़ रुपये कमाने वाली फ़िल्म बन गई! 1 करोड़! इसकी लागत मात्र 2 लाख रुपये थी!
यहाँ मैं नेट कलेक्शन की बात कर रहा हूँ ग्रॉस की नहीं
अब एक करोड़ के आगे एक और ज़ीरो लगाने में, यानी 10 करोड़ तक पहुँचने में, 32 साल लग गए। 1975 में शोले वो फ़िल्म रही कि जिसने 3 करोड़ के बजट में 10 नहीं बल्कि 15 करोड़ रुपये की कलेक्शन की थी।
अब 10 के आगे ज़ीरो लगाने में फिर 32 साल लग गए और 2008 में आई ग़जिनी, भारत से 100 करोड़ नेट कलेक्शन करने वाली पहली फ़िल्म बनी।
अब 18 साल बाद एक और ज़ीरो लगा है, अपनी धुरंधर सिर्फ भारत-भारत से 1000 करोड़ की कलेक्शन पार कर चुकी है। सोचिए, कहाँ 15000 की रकम कवर करने से ये सफ़र शुरु हुआ था, आज एक हज़ार करोड़ भी काबू में आ चुका है।
अँग्रेज़ लोग बड़े काम को पाथ ब्रेकिंग कहते हैं, मैं कहता हूँ कि तब दादा साहब फाल्के की हिम्मत और बुद्धि के सदके जो path बनाया गया, उसी पर आगे आर्देशिर ईरानी, ज्ञान मुखर्जी, रमेश सिप्पी, मुर्गदास और अब आदित्य धर चलकर हज़ार करोड़ तक पहुँच पाए हैं।
अगर दादा साहब गुजराती अखबार में विज्ञापन न देते तो क्या आज आदित्य धर 1000 करोड़ तक पहुँच पाते? नहीं न!
बहरहाल, अगला माइलस्टोन – 10 हज़ार करोड़ – नेट कलेक्शन कितने साल में होगा? क्या लगता है?
#सहर