14/08/2026
डॉ. बिशेश्वर प्रसाद केशरी (1 जुलाई 1933 – 14 अगस्त 2016)
शिक्षाविद्, साहित्यकार, चिंतक, झारखंड आंदोलनकारी, झारखंड के इतिहास, भाषा, साहित्य, संस्कृति और अस्मिता को समझने के लिए जिन व्यक्तित्वों का स्मरण अनिवार्य है, उनमें डॉ. बी. पी. केशरी का नाम अग्रणी है।
उन्होंने झारखंड को केवल एक भौगोलिक क्षेत्र के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे एक विशिष्ट ऐतिहासिक चेतना, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक अस्तित्व के रूप में समझा। अपने अध्यापन, लेखन और वैचारिक संघर्ष के माध्यम से उन्होंने झारखंड की भाषा, लोक-संस्कृति, इतिहास और पहचान को बौद्धिक आधार देने का महत्वपूर्ण कार्य किया। अलग झारखंड राज्य की मांग के आंदोलन में भी उनका योगदान केवल नारों और आंदोलनों तक सीमित नहीं था। उन्होंने कलम और विचार को आंदोलन का माध्यम बनाया। यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी, उन्होंने झारखंड के प्रश्न को भावनाओं के साथ-साथ इतिहास, संस्कृति और तर्क की कसौटी पर भी रखा। आज जब हम झारखंड की पहचान और उसके इतिहास की बात करते हैं, तो यह समझना आवश्यक है कि यह पहचान अचानक निर्मित नहीं हुई। इसके पीछे अनेक लोगों का दीर्घ वैचारिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संघर्ष रहा है। डॉ. बी. पी. केशरी उसी संघर्ष की एक महत्वपूर्ण आवाज थे।
पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उनके विचारों और बौद्धिक विरासत को समझना भी है।
14 अगस्त 2016 को उनका देहावसान हुआ, लेकिन झारखंड को समझने की उनकी दृष्टि आज भी जीवित है।
महान चिंतक, साहित्यकार एवं झारखंड आंदोलन के वैचारिक पुरोधा डॉ. बी. पी. केशरी जी को उनकी पुण्यतिथि पर शत्-शत् नमन।🙏
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