16/08/2026
नीमडीह से बुलंद हुई थी अंग्रेजों के खिलाफ भूमिज विद्रोह की आवाज, जन्मस्थली को राष्ट्रीय पर्यटन स्थल बनाने की मांग
सरायकेला-खरसावां/नीमडीह:
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सरायकेला-खरसावां जिले की नीमडीह धरती का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गौरवशाली स्थान है। वर्ष 1832-33 में जब अंग्रेजी हुकूमत अपनी शोषणकारी भू-राजस्व नीतियों से जनता पर जुल्म कर रही थी, तब इसी धरती के बांधडीह गांव से 'भूमिज विद्रोह' की पहली हुंकार भरी गई थी। अब इन वीर सपूतों की जन्मस्थली को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की मांग तेज हो गई है।
अत्याचार के खिलाफ उठा था हथियार:
इतिहास के पन्नों में दर्ज यह विद्रोह बड़ाभूम के तत्कालीन जमींदारी दीवान माधव सिंह के अत्याचारों और ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ था। इस ऐतिहासिक आंदोलन का कुशल नेतृत्व वीर शहीद गंगा नारायण सिंह ने किया था। बांधडीह में जन्मे गंगा नारायण सिंह और समीप के बुढ़िबासा गांव में जन्मे उनके प्रधान सेनापति जिरपा लाया के आह्वान पर हजारों स्थानीय वीरों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ हथियार उठा लिए थे।
'सरदार गोरिल्ला वाहिनी सेना' का गठन और शहादत:
अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए गंगा नारायण सिंह ने क्षेत्र के विभिन्न समुदायों को एकजुट कर 'सरदार गोरिल्ला वाहिनी सेना' का गठन किया। इस सेना ने करीब दो वर्षों तक अंग्रेजी फौज को कड़ी टक्कर दी। 6 फरवरी 1833 को इस क्रांतिकारी दल ने खरसावां के हिंदशहर थाने पर धावा बोल दिया। इसके अगले ही दिन, 7 फरवरी 1833 को अंग्रेजों से लोहा लेते हुए वीर गंगा नारायण सिंह वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी यह शहादत भूमिज विद्रोह के इतिहास में एक अमिट अध्याय बन गई।
विरासत सहेजने की कवायद: राष्ट्रीय पर्यटन स्थल बनाने की मांग -
इन महान क्रांतिकारियों के अदम्य साहस और शहादत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए अब स्थानीय स्तर पर आवाज उठ रही है। भाजपा के नीमडीह पूर्वी मंडल अध्यक्ष विपुल सिंह ने प्रशासन और सरकार से मांग की है कि शहीद गंगा नारायण सिंह की जन्मस्थली 'बांधडीह' और जिरपा लाया की जन्मस्थली 'बुढ़िबासा' को राष्ट्रीय ऐतिहासिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि इस पहल से न केवल इस ऐतिहासिक क्षेत्र का विकास होगा, बल्कि युवा पीढ़ी अपने स्थानीय वीरों के अदम्य साहस, संघर्ष और उनके सर्वोच्च बलिदान की गौरवगाथा से भी रूबरू हो सकेगी।