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Kavita बचपन की स्मृतियां

।। जीवन धारा नदियां।।नदियों की जो दशा करी है तूने मानव!तू मनुष्यता रहित हो गया है खुद दानव।तूने मानव मूल्यों का जो ह्रास...
28/10/2025

।। जीवन धारा नदियां।।
नदियों की जो दशा करी है तूने मानव!
तू मनुष्यता रहित हो गया है खुद दानव।
तूने मानव मूल्यों का जो ह्रास किया है।
आनेवाली पीढ़ी का ही नाश किया है।।
जो‌ नदियां थी प्रवहमान बन जीवनधारा।
उनमें कचरा डाल उन्हें दूषित कर डाला।
बांध बनाकर नदियों की अविरलता रोकी।
शहरों की अपशिष्ट गन्दगी उनमें झोंकी।
नदियों के गर्भस्थ लोभवश भवन बनाये।
प्यासे पशु पक्षी डोलें इत उत मुंह बाये।।
इतने से भी लोभी मन खुश हुआ न तेरा।
फैक्टरियों से नि:सृत दूषित जल भी गेरा।।
वर्षा, बाढ़,सुखाड़ तेरे कर्मों का फल है।
हो जा मालामाल न जीना रहा सरल है।।
लालच की ये भूख तुझे ना जीने देगी।
शुष्क प्रदूषित नदियां जल ना पीने देगी।।
तेरी यही चतुरता तुझ पर होगी भारी।
सोच समझ जल संरक्षण की करो तैयारी।।

पं शैलेश कुमार शास्त्री
जमशेदपुर

16/10/2025

।। ज़िन्दगी एक अबूझ पहेली।।
ज़िन्दगी की मुश्किलों से तू अगर घबरा रहा है।
छोड़ दे इसकी फिकर तू ठोकरें क्यों खा रहा है।
ठोकरों से सीख लेकर मंजिलें गर पा रहा है।
मस्त रह अपनी खुदी में जन्म बीता जा रहा है।।
हैअगर तनहाइयों का ग़म किसी से व्यर्थ कहना।
कौन खुशियों को संजोए रह सका मत दु:ख सहना।
चाह चिन्ता को बढ़ाये ,है अगम इसमें न बहना।
जो मिले उसमें खुशी का भाव रख ,यह भी न रहना।।
है तेरे बस का न सब कुछ पा सके करके जतन।
जो चढ़ा ऊंचे शिखर उसका सुनिश्चित है पतन।
हार से मत डर सजल गहराइयों में हैं रतन।
खौफ से जो भर गया वह पा सका कब रत्न धन।।
जोखिमों का सिलसिला यूं ही बना रहता यहां।
उद्यमी का भाग्य भी मालुम नहीं सोता कहां?
बैठ किस्मत के भरोसे ठोकरें मिलती जहां?
किस्मती बैठे जहां खुलता खजाना है वहां।।
है तेरे पुरुषार्थ के वश हर सफलता कौन कहता?
भाग्य में अंकित पराभव वह समर में हाथ मलता।
वध जयद्रथ का सुनिश्चित सूर्य का भी अस्त टलता।
सूर्य भी मध्यान्ह के उपरान्त क्रमशः नित्य ढ़लता।।

पं शैलेश कुमार शास्त्री
जमशेदपुर

14/10/2025

।। सम्बन्धों की थाती।।
सम्बन्ध संजोकर के रखना सम्बन्ध बड़ी सौगात है।
सम्बन्ध बड़ी थाती अपनी सम्बन्धों से औकात है।।
पैदा तो एकाकी होते मां से सम्बन्ध प्रथम होता।
अपनी आवश्यकता बतलाने को स्वाभाविक ही शिशु रोता।
शैशव का काल बिता कर के ज्यों ज्यों हम बढ़ते जाते हैं।
अभिभावक पिता भाई भगिनी के नाते जुड़ते जाते हैं।
घर की चहारदीवारी से बाहर जब यौवन खिलता है।
संगी साथी सब समवयस्क लोगों से पलछिन मिलता है।।
उद्दाम जवानी का अवसर दाम्पत्य सुखद पल दिखलाता।
सारे सम्बन्ध सिमट जाते संगिनी हाथ जब मिल जाता।।
व्यवहार जगत के अनुबन्धों से बंधना बहुत जरूरी है।
निर्वाह करें दायित्व बोध पूर्वक ना ही मजबूरी है।।
आखिर कितने दिन का जीवन सम्बन्ध विसर्जन ठीक नहीं।
मानवता रक्खें बरकरार पुरखों की मेटें लीक नहीं।।

पं शैलेश कुमार शास्त्री
जमशेदपुर

12/10/2025

।।मौत की आहट।।
मत रहो निश्चिंत इतना ज़िन्दगी में
मानकर चलिए हमें जाना अभी।
मौत की आहट नहीं मिल पायेगी
आ खड़ी होगी निकट वह जब कभी।।
काम कितने भी जरुरी हों भले
छोड़कर आधे अधूरे ही चले।
क्यों बढ़ाना दोस्ती इतनी यहां
चार दिन के बाद जाने फिर कहां?।।
आपका सब कुछ नहीं संग जायेगा
जो कमाया कर्म का फल पायेगा।
ज़िन्दगी का क्या भरोसा सोच ले
बेबसी में काल लेकर जायेगा।।
हो गये कितने बली संसार में
आज उनका है नहीं कुछ भी पता
हाल तेरा भी यहां होगा वही
चिन्ह अपना अन्ततः न पायेगा।।
छल कपट धोखाधड़ी चालाकियां
काम आयेंगी नहीं कुछ भी तेरे ।
मन्दमन मतकर भरोसा सोच ले
हाथ से मौका निकलता जा रहा।।

पं शैलेश कुमार त्रिपाठी
जमशेदपुर

05/10/2025

।। मुखौटा।।
मुखौटा लगाकर जिये जा रहे हैं।
न कुछ दे रहे हैं न कुछ पा रहे हैं।।
बढा ली मुसीबत मुखौटा लगाकर।
सदा सोचना है सभी कुछ गंवाकर।
रहा बचपना दोस्त दुश्मन बनाये।
कुछ अपने बने कुछ पराये कहाये।
जवानी का आलम अजब रंग लाया।
जो अपने थे उनको भी माना पराया।
भरे ज़िन्दगी में अजब रंग चोखे।
वो खाये पिये और गये देके धोखे।
मुखौटे बदलते हुए जी रहे हम।
शुकूं न मिला और बढ़ते गये गम।
अभी ज़िन्दगी का रवैया वही है।
हमारी तरी का खेवैया नहीं है।
ये दुनिया है ऐसी अजब औ निराली।
रही जिन्दगी अन्त में भी ये खाली।
न खुलकर हंसा न ही जी‌भर के रोया।
न सोचा अभी तक क्या पाया क्या खोया।
मुखौटे लगाकर कहां तक जिओगे?।
गमों के ये आंसू कहां तक पियोगे?।
फिकर से न फीकी करो जिंदगानी।
मुखौटे उतारो ये दुनिया बेगानी।।
एस के त्रिपाठी
हिंदी शिक्षक
एम एन पी एस

03/10/2025

।।अनुभव के झरोखे से।।



बुरे काम का बुरा नतीजा सही बात यह मान लो।
नहीं कहेंगे ,नहीं सुनेंगे बुरी बात, यह ठान लो।‌।
बुरी बात सुनने से मन में आते बुरे विचार हैं।
बुरा सोचना बुरा देखना नहीं नेक व्यवहार है।।
दुनिया में अगणित लोगों ने जो बोया वह फल पाया ।
नेक कमाई थोड़ी भी हो तो भी मन में सुख छाया।।
कर्म प्रधान विश्व रचि राखा यह संतों ने गाया है।
फिर भी यदि विश्वास न हो तो देखो जग दर्शाया है ।।
थोड़े दिन का जीवन भाई मन में इतना लोभ क्यों ?
बीती बात सोचकर काहे पछतावा और क्षोभ क्यों?
यह जीवन है एक यात्रा ,निश्चित कर गंतव्य तू।
सोच समझकर अनासक्त होकर अपना कर्तव्य तू ।।
इसके लिए जरूरी ईश्वर की सत्ता स्वीकारना।
जीत मिले तो मत इतराओ दुखी न हों यदि हारना।।
संग करो सज्जन लोगों का, जीवन जीओ समता का ।
दुख से दूर रहोगे हरदम, त्याग करो यदि ममता का ।।
दीया दिखाते हम औरों को हिय में घोर अंधेरा है।
जीवन बीत सारा यूं ही करते तेरा मेरा है ‌‌।।
जैसी करनी वैसी भरनी यह सिद्धांत पुराना है।
निर्मम कर्म करो ना जब तक तब तक आना जाना है।।

29/09/2025

।। होड़ (प्रतिस्पर्धा)।।

एक दूसरे से अच्छा दिखने की होड़ लगी है।
झूठी शान दिखाकर मन में क्या अभिलाष जगी है।
खाने के लाले हैं घर में बाहर यूं चमकाते हैं।
मानो अभी फ्लाइट से उतरे खुद विदेश से आते हैं।
अपनी नहीं हैसियत वैसी मन में भरा घमंड है।
शाख दिखाने की फितरत का पाले वे पाखंड है।
नहीं आपसी प्रेम पराई पीड़ा पर हंसते रहते।
दुखद बोलते बोल कहें हम तो कड़वा सच ही कहते।
खबर पड़ोसी की न पता है लन्दन की बतियाते हैं।
गड्ढा खोद गिरा देने की हरदम घात लगाते हैं।
चिकनी चुपड़ी बातें करके आपस में उकसाते हैं।
मौका पा औरों घर जाकर मुफ्त का माल उड़ाते हैं।।
जर जमीन बेचें पुश्तैनी शहर में भवन सजाते हैं।
खुश होते परिवार देख निज अपनों से कतराते हैं।।
हों समर्थ तो करें ठीक पर सच्चाई झुठलाते हैं।
आमद भले अठन्नी की हो खर्ची नोट दिखाते हैं।।
ऐसी झूठी शान दिखाकर जाने क्या मिल जाता है।
ओंठ चाटकर यूं दिखलाता जैसे रबड़ी खाता है।।
पैर पसारें उतने जितनी लम्बी अपनी चादर हो।
झूठी शान नहीं पालो जिससे घनघोर अनादर हो।।

पं शैलेश कुमार शास्त्री
जमशेदपुर

28/09/2025

।।नयी पीढ़ी को चेतावनी।।
चिरागों पर नजर रक्खो इन्हीं से होंगे घर रोशन।
हवा का रुख बदलते ही यही घर को जला देंगे।
हमारी पीढियां हर दम सुशासन का करें पालन
तो सोशल मीडिया से ये सदा ही बाखबर होंगी।
हवायें दूर देशों से धुआं लाई है जहरीला
न खोलो खिड़कियां घर की घुटन महसूस होती है।
गुजर जायेगा ये मौसम समय कुछ सब्र कर देखो
तरक्की के लिए अपना वतन मत छोड़ कर जाओ।
ये खुशबू अपनी मिट्टी की न पाओगे जुदा होकर
प्रवासी बन परिन्दों की तरह पर फड़फड़ाओगे।।
नज़र दुश्मन की है तुमपर तुम्हें अहसास हो न हो
नशीली नींद सोते ही तुम्हें बर्बाद कर देंगे।।
ये गुलशन उल्लुओं द्वारा उजाड़ा जायेगा तो फिर
वो मीठी कूक कोयल की सदा को रूठ जायेगी।।
बंटोगे तो कटोगे ही न फिर कुछ हाथ आयेगा
सुकूं होगा नहीं घर में गले किसको लगायेगा।।
नहीं शिकवा शिकायत से बरक्कत घर में होती है
गले लगकर गिरे आंसू असल में वे ही मोती है।।

पं शैलेश कुमार शास्त्री
जमशेदपुर

19/06/2025

।।बरसात।।

आ गया बरसात का मौसम सुहाना।
हो रहा हर शख्स है इसका दिवाना।।
छा रही चारों दिशाओं में घटाएं।
झूम कर हैं आ रहीं ठंडी हवाएं।।
दादुरों का शोर सुनने को मिला है।
डाल पर है फूल मुस्काता खिला है।।
है प्रणय उन्मत्त आकुल को मिला सुख।
किन्तु प्रोषितभर्तृका के मन भरा दुख।।
वृक्ष सुख से झूमते लहरी लताएं।
मिल रहीं मनमीत से देतीं दुआएं।।
ले सलिल नदियां मचलतीं बढ़ रही हैं।
कूल पर निर्मित घरों पर चढ़ रही हैं।।
दृश्य है वीभत्स मन भी कांपता है।
दुर्दशा को झेल थककर हांफता है।।
हर समस्या के लिए सन्नद्ध हैं हम।
चित्त में संवेदना भी है नहीं कम।।

पं शैलेश कुमार शास्त्री
जमशेदपुर

18/06/2025
18/06/2025

।। युग धर्म।।
युगधर्म बताकर जो करते हैं कदाचार।
वे कलिस्वरुप पातकी लोग पापावतार।।
चोरी,व्यभिचार,जुआ, कामुकता का विचार।
नित ही चलता मन में है उनके बार बार।।
मन में घमंड आदर देने का भाव नहीं।
अनुचित जो भी करता सब लगता उसे सही।।
सत्पथ की बात सोचते ना सपने में भी।
ठगने का रहता भाव सदा अपने से भी।।
दिन-रात यही चिंतन रहता है मनभावन।
कर्तव्य बोध से दूर लोभ का संवर्धन।।
किसका कितना लें लूट फंसाकर जालों में।
है भेष बनाकर घूम रहे नक्कालों में।।
नेतागीरी, चमचागीरी, का धंधा है ।
उनका करता विश्वास सकल जग अंधा है।।
बनते समाज के सेवक हैं पर अपनी सेवा का जुनून।
ऐसे खटिया के खटमल हैं पीते समाज का सदा खून ।।
फोटो खिंचवा बनते उदार मन में बैठी मक्कारी है।
करते रहते मौका तलाश ऐसे सेवा व्रतधारी हैं ।।
जो न्याय सत्य विश्वासी हैं उन पर आते संकट हजार।
जो दुष्ट ,मूढ़ अघरासी हैं लड्डू पूरी खाते उधार।।
निंदा में रहते सदा लीन वे सज्जन साधु कहाते हैं।
आपस में फूट डालकर के दोनों से माल उड़ाते हैं।।
आभूषण भूषित गात सदा मुख पर मुस्कान निराली है।
वंचकता मन में रची बसी इस युग के प्रतिभाशाली हैं।।
प्रतिभाएं आत्मघात करतीं दाने-दाने को तरस रहीं।
धोखेबाजों की पौ बारह घर में है लक्ष्मी बरस रही।।
इसको कलि का युगधर्म बता पापों से ना जो डरते हैं।
वे ही आनंदित होते हैं सज्जन कुढ़ कुढ़ कर मरते हैं।।
‌ एस के त्रिपाठी
हिंदी शिक्षक
एम एन पी एस

15/06/2025

।। सूरदास जी महाराज।।
जन्म हुआ तब मां को खोया नाम "सुरेश"धराया।
रामप्रताप शुक्ल जी का वह ज्येष्ठ पुत्र कहलाया।
नेत्र ज्योति से हीन किन्तु प्रज्ञा प्रकाश था पाया।
जन्मभूमि "तूरी"में कुछ दिन बचपन खेला खाया।1।
स्वामी योगेश्वरानंद जी की पा स्नेहिल छाया।
वह बालक "डलमऊ"आ गया जीवन था सरसाया।
गुरुदीक्षा मिल गयी नाम "गीता चैतन्य" धराया।
सभी गुरुजनों ने मिलकर "गीता"कण्ठस्थ कराया।2।
खुली प्रगति की राह नियति ने उन्नति पथ दरशाया।
राधेश्याम कथक ने इनको हार्मोनियम सिखलाया।
गीत और संगीत वाद्य में निज कौशल प्रगटाया।
गायन वादन में रुचि जागी भजनानन्द उठाया।3।
छोटा मठ डलमऊ गंग तट आश्रम हुआ बसेरा।
संस्कृत विद्यालय के बच्चों ने था हर पल घेरा।
चुम्बकीय व्यक्तित्व का धनी बना मित्र था मेरा।
भ्रातृ भाव , गुरु भाव जोड़ कर किया न मेरा तेरा।4।
जीवन में उन्नति अवनति के दिन सबही के आते।
स्वारथवश जुड़ते आपस में अथवा हैं ठुकराते।
किन्तु साधु के जीवन से हम जैसे जो जुड़ जाते।
आद्योपांत सगे बन जाते एक राम के नाते।5।
श्रद्धांजलि वाचिक देकर भी हृदय शून्य में खोया।
हर उसने वह ही काटा,था जीवन में जो बोया।
सदा रहा, निरपेक्ष आज तक एकभुक्त रह सोया।
उस अभिन्न व्यक्तित्व के लिए आज बहुत मैं रोया।6।

प्रज्ञा चक्षु गीता चैतन्य (सूरदास जी)को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं एवं उनकी सद्गति हेतु परमात्मा से प्रार्थना करता हूं। ॐ शान्ति:🙏❤️🌹

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