28/07/2026
देव आनंद के इकलौते बेटे सुनील आनंद के आज लंदन में 70 साल की उम्र में न रहने की ख़बर आई तो यूं लगा, जैसे हिंदी सिनेमा का एक ऐसा दरवाज़ा चुपचाप बंद हो गया, जिसके पीछे अभी तक नवकेतन की यादें सांस ले रही थीं।
सुनील आनंद, यानी वह बेटा, जिसकी पहचान देव आनंद के बेटे से आगे बढ़ ही नहीं सकी..!
■ सिनेमा में कुछ सितारे बनते हैं। बाक़ी कुछ इन सितारों की विरासत संभालते हैं। सुनील आनंद की पूरी ज़िंदगी एक ऐसी रोशनी के साथ चली, जिसकी चमक इतनी तेज़ थी कि उसमें उनका अपना चेहरा अक्सर दिखाई ही नहीं दिया।
■ देव आनंद का बेटा होना किसी भी कलाकार के लिए सबसे कठिन परिचय है। जिस पिता ने छह दशकों तक भारतीय सिनेमा को अपनी मुस्कान, अपनी चाल, अपने अंदाज़ और अपने सपनों से रोशन रखा हो, उसके बेटे से दुनिया सिर्फ़ अभिनय नहीं, चमत्कार की उम्मीद करती है।
■ उनकी कहानी जन्म लेते ही असाधारण जो हो चुकी थी। 1956 में उनका जन्म स्विट्ज़रलैंड के ज़्यूरिख़ शहर में हुआ, जब देव आनंद, अपनी पत्नी कल्पना कार्तिक के साथ, चेकोस्लोवाकिया के प्रतिष्ठित कार्लोवी वेरी फ़िल्म महोत्सव में भाग लेने जा रहे थे।
कहा जा सकता है कि उस प्रतिनिधिमंडल के सबसे कम उम्र के सदस्य सुनील ही बने।
■ आगे चलकर उन्होंने वॉशिंगटन डी.सी. स्थित अमेरिकन यूनिवर्सिटी से बिज़नेस एडमिनिस्ट्रेशन की पढ़ाई की। चेतन आनंद और विजय आनंद उनके चाचा थे, जबकि केतन आनंद, विवेक आनंद, शेखर कपूर, नीलू और अरुणा उनके रिश्ते के भाई-बहन। ऐसे परिवार में जन्म लेने वाले किसी भी युवक के लिए सिनेमा केवल पेशा नहीं, विरासत भी होता है।
लेकिन, चमत्कार विरासत में कहाँ मिलते हैं।
■ सुनील आनंद को देव आनंद ने बड़े विश्वास के साथ फ़िल्म 'आनंद और आनंद' (1984) में लाँच किया था, फ़िल्म का नाम ही जैसे पिता-पुत्र के रिश्ते का उत्सव था। मगर दर्शकों ने उस उत्सव को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद 'कार थीफ़' आई। फिर 'मैं तेरे लिए', जिसमें उनकी नायिका मीनाक्षी शेषाद्रि थीं। अभिनय का सफ़र बस इन तीन फ़िल्मों में सिमट गया।
उन्होंने निर्देशन की ओर भी कदम बढ़ाया और फ़िल्म 'मास्टर' बनाई।
■ इसके बाद उन्होंने शायद समझ लिया कि हर इंसान का मुक़द्दर परदे पर लिखा हुआ नहीं होता। वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार इंदर मोहन पन्नू एक दिलचस्प प्रसंग सुनाते हैं। वह अक्सर मुंबई के खिरा नगर स्थित सुनील आनंद के दफ़्तर जाया करते थे। उन्होंने एक दिन उनसे यूँ ही पूछ लिया, "आजकल ख़ुद को व्यस्त कैसे रखते हैं?"
■ सुनील ने मुस्कराकर जवाब दिया, "कराटे और दूसरे मार्शल आर्ट्स की प्रैक्टिस करता हूँ।" इस एक जवाब में शायद उनके व्यक्तित्व का सबसे शांत परिचय छिपा था। फ़िल्मों की विफलताओं के बाद भी उन्होंने अपने भीतर अनुशासन बनाए रखा। शोर से दूर, शिकायतों से दूर।
■ शायद बहुत कम लोगों को मालूम था कि मार्शल आर्ट्स उनके लिए केवल शौक़ नहीं था। उन्होंने हांगकांग में विंग चुन (Wing Tsun) का बाक़ायदा प्रशिक्षण लिया था। अभिनय की दुनिया ने उन्हें जितनी पहचान नहीं दी, आत्मानुशासन ने उतना ही संबल दिया। कैमरों की चमक से दूर, उन्होंने अपने व्यक्तित्व को एक साधक की तरह गढ़ना जारी रखा। यह उनकी प्रकृति भी थी, शांत, संयमित और प्रचार से हमेशा दूर रहने वाली।
■ पन्नू जी को एक और दृश्य याद है। फ़िल्म 'मास्टर' का एक प्रेस शो अलंकार थिएटर में था। सुनील आनंद ख़ुद पत्रकारों के बीच आए। हर चेहरे पर प्रतिक्रिया पढ़ने की कोशिश कर रहे थे। जैसे कोई विद्यार्थी परीक्षा की कॉपी जाँचे जाने का इंतज़ार करता है। उस दृश्य में न कोई स्टार था, न स्टार पुत्र। बस एक फ़िल्मकार था, जिसे उम्मीद थी कि शायद इस बार दर्शक उसे स्वीकार कर लेंगे।
और फिर एक घटना, जो शायद उनके पूरे जीवन का सबसे मार्मिक रूपक है।
■ देव आनंद की एक फ़िल्म का प्रीमियर गेयटी गैलेक्सी में था। पिता और पुत्र साथ खड़े थे। फ़ोटोग्राफ़रों के कैमरे लगातार चमक रहे थे। तभी किसी फ़ोटोग्राफ़र ने मुस्कराकर कहा, "आनंद और आनंद!" देव साहब अपनी चिर-परिचित अदा में हँस पड़े और उनके मुँह से बेसाख़्ता निकल गया, "आपको वह फ़िल्म अभी भी याद है? मैं तो भूल चुका हूँ।"
■ यह देव आनंद का सहज विनोद था। लेकिन समय के साथ यह वाक्य एक गहरी विडंबना बन गया। दुनिया शायद उस फ़िल्म को इसलिए याद रखती रही क्योंकि उसमें पहली बार देव आनंद अपने बेटे के साथ पर्दे पर थे। और, सुनील आनंद शायद इसलिए याद रखे जाएँगे कि उन्होंने उस स्मृति को कभी अपने लिए बोझ नहीं बनने दिया।
■ हर बेटा अपने पिता जैसा नहीं बनता। और, हर पिता की विरासत सिर्फ़ सफल बेटे ही नहीं सँभालते। कुछ बेटे अपनी विफलताओं के बावजूद अपने पिता की स्मृतियों की आख़िर तक चौकीदारी करते रहने की कोशिश में रहते हैं। सुनील आनंद उन्हीं में से एक थे।
■ उनके जाने के साथ ऐसा लगता है जैसे नवकेतन के आँगन में रखा एक आख़िरी दीपक भी बुझ गया है। देव आनंद, चेतन आनंद, विजय आनंद और अब सुनील आनंद..., एक पूरा अध्याय अब इतिहास बन चुका है।