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09/09/2026
प्रेम:प्रेम को कभी किसी ने समझा ही नहीं। जिसने समझा उसने कभी जिया ही नहीं। बस उलझी उलझी सी रही ज़िन्दगी हमेशा। मैं बस उलझ...
28/04/2026

प्रेम:
प्रेम को कभी किसी ने समझा ही नहीं।
जिसने समझा उसने कभी जिया ही नहीं।
बस उलझी उलझी सी रही ज़िन्दगी हमेशा।
मैं बस उलझी रही तुममें।
और तुम उलझे रहे सबमें।
तुमको प्रेम मेरा कभी दिखा ही नहीं।
आधे अधूरे से हैं हम दोनों।
मिल जाएँ तो पूरे हैं दोनों।
पर तुमको ठहराव कभी पसंद आया ही नहीं।
भटकते कुकूर से थे तुम।
कुकूर बनना ही तुम्हें पसंद आया यहाँ।
और जो कहते हैं घर का दाल भात रोज खाता कौन है...!!
स्वाद बदलने को हर आदमी मुँह बाहर मारता जरूर है।
चरित्रार्थ तुम भी इसे कर बैठे।
और से कुछ अलग समझा था तुमको।
पर कुकूर कुकूर ही होवे है।
लाख सिंहासन पर तुम बिठा दो।
कचरे सी सोचा वाले कों कचरा ही पसंद आएगा।
चाहे जितने हीरे मोती तुम दें दो।
प्रेम तुमको मेरा दिखा नहीं।
या कहूँ दग़ाबाजी तुमसे भुलाई ना गई।
ख़बर तुम्हारी हर एक है पास मेरे।
फिर भी ना जाने कौन सी आस में हूँ।
शायद तुम आओगे...!!
हाल मेरा जानोगे।
पर मैं भूल गई...!!
इंतज़ार मेरा हमेशा इंतज़ार ही रहा।
ना तुम लौटे ना प्रेम हमें दुबारा हुआ।
किस्से तेरे मेरे प्रेम के बंद हैं अब मेरी डायरी में।
और आज भी ज़ब कभी पलटती हूँ मेरी डायरी के पन्ने।
तेरे झूठे इश्क़ की खुशबु अब भी महकाती है मेरे मन को...
चलो ठीक है मैं मानती हूँ कि हम हमसफ़र ना बन सके।
पर बोलकर सच साथ तो एक दूजे का निभा ही सकते थे।
भोंककर धोखे कि बरछी इस तरह मेरी पीठ पर...
एक बात बताओ सुकून से रह पाते हो क्या...??
भुला कर वफ़ाएँ मेरी खुद से नज़र मिला पाते हो क्या...??
तोड़कर ये बंधन फिर से किसी के हो पाते हो क्या...??
समय मिले तो जवाब जरूर देना...
तुम्हारी अंजू... ✍️

गर्मी थी। प्यास लगी।फ्रिज में आम का जूस था।उसने पी लिया।इसकी सजा उसे निर्वस्त्र करके घर से बाहर भगाना था।वो बच्चा 6 साल ...
25/04/2026

गर्मी थी। प्यास लगी।
फ्रिज में आम का जूस था।
उसने पी लिया।

इसकी सजा
उसे निर्वस्त्र करके घर से बाहर भगाना था।

वो बच्चा 6 साल से 23 साल तक
उस एक दिन को
कभी नहीं भूल पाया।

23 अप्रैल 2026। दोपहर 12 बजकर 5 मिनट।

प्रियांशु श्रीवास्तव वरुण विहार, बर्रा-8, कानपुर ने अपना आखिरी पत्र लिखा।

उसने लिखा: 'मैं प्रियांशु श्रीवास्तव, अपने पूरे होश में, बिना किसी जोर-दबाव के यह पत्र लिख रहा हूं।'

पत्र दो पन्नों का था।
17 साल का दर्द दो पन्नों में।

वो पत्र उसने अपने व्हाट्सऐप स्टेटस पर लगाया। पिता को और दोस्तों को भेजा।

जब तक लोगों ने पढ़ा
तब तक प्रियांशु कानपुर कचहरी की पांचवीं मंजिल से जा चुका था।

वो पत्र पढ़ना जरूरी है।

इसलिए नहीं कि यह एक खबर है।

इसलिए कि इसमें हर वो बात है जो हमें सुनाई नहीं देती जब तक बहुत देर न हो जाए।

प्रियांशु ने लिखा:

"कक्षा 9 में प्रवेश के दौरान पापा ने शर्त रखी अगर कंप्यूटर विषय नहीं लिया तो निर्वस्त्र करके घर से निकाल दूंगा। उनके दबाव में आकर मैंने वह विषय चुना जिसमें मेरी रुचि नहीं थी।"

एक बच्चे का चुनाव नहीं था वो।
वो डर था।

"हाईस्कूल में नंबर कम आएंगे इस डर से मैं घर से भागकर ट्रेन से मथुरा स्टेशन पहुँच गया था।"

एक किशोर अपने ही घर से भागा।
मथुरा तक।
क्योंकि घर सेफ नहीं लगता था।

और फिर वो लिखता है जो सबसे तकलीफ देता है।

"इंटर के बाद मैंने ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया।
फिर अपना ऑनलाइन काम शुरू किया।
इससे मैंने पापा का मोबाइल दिलाया। बहन का मोबाइल दिलाया। स्कूटी दिलाई। घर के दैनिक खर्च, बिजली का बिल सब खुद उठाया।

बावजूद इसके पापा मुझे नामर्द, अपंग, विकलांग तरह-तरह की गंदी गालियां देकर मोहल्ले में बेइज्जत करते हैं।"

एक बेटे ने घर का खर्च उठाया।
पिता को मोबाइल दिया।
बहन को स्कूटी दिलाई।
पूरे दिन पिता के दफ्तर का काम किया।

और बदले में गालियां मिलीं।
मोहल्ले में बेइज्जती मिली।
हर मिनट का हिसाब मांगा गया।
"कहां गए? किसका फोन आया? क्या बातें की?"

यह प्यार नहीं था।
यह कंट्रोल था।

हार्वर्ड के शोध का एक तथ्य है:

जब कोई बच्चा बार-बार अपमान झेलता है उसके मस्तिष्क में कोर्टिसोल का स्तर लगातार बढ़ा रहता है। कोर्टिसोल तनाव का रासायनिक पदार्थ।

और जब यह लंबे समय तक बढ़ा रहे तो हिप्पोकैंपस यानी स्मृति और भावनात्मक नियंत्रण का केंद्र सिकुड़ता है।

यानी जो बच्चे ऐसे घरों में पलते हैं उनका मस्तिष्क शाब्दिक अर्थ में अलग तरह से विकसित होता है।

प्रियांशु 23 साल का था। विधि स्नातक था। पंजीकृत अधिवक्ता था।

पर उसका मस्तिष्क अभी भी उस 6 साल के बच्चे की तरह रिएक्ट कर रहा था जिसे घर से निकाल दिया गया था।

उसने अपने पत्र में लिखा:

"बचपन में चुराए गए एक-दो रुपये के सिक्के की बात आज तक किसी भी बहस में पापा चिल्लाकर मोहल्ले में बताते हैं।"

एक बचपन की गलती।
जो हर बड़े इंसान से होती है।
जो भूल जानी चाहिए थी।

पर वो हथियार बन गई।
17 साल तक।
बार-बार।
सबके सामने।

और पत्र की आखिरी पंक्तियां।

"सभी मां-बाप से अपील है अपने बच्चों पर उतना ही दबाव डालें जितना वो सह सकें।

मेरा निवेदन है मेरी लाश को पापा छू भी न पाएं।

मैं हार गया। पापा जीत गए।

लव यू मम्मी।"

"लव यू मम्मी।"

यह आख़िरी शब्द थे।

एक बेटे के।

जिसने दुनिया से जाते वक्त भी मां को याद किया।

"पर वो पिता थे-
उनका इरादा तो अच्छा रहा होगा।"

यह सोच भी हमारे दिमाग में आता है

पर इरादा और असर दो अलग चीजें हैं।

एक पिता अपने बेटे को "मजबूत" बनाना चाहता था।
उसका इरादा शायद अच्छा रहा होगा।

पर असर?

असर यह था
कि 23 साल का एक होनहार वकील
अपने ही पिता की कोर्ट से
पांचवीं मंजिल से हमेशा के लिए चला गया।

इरादा अच्छा होना काफी नहीं।
उसके असर के बारे में भी सोचना होगा।

डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट भारत में हर साल 2 लाख से ज्यादा लोग आत्महत्या से जाते हैं। 15-29 आयु वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित। और इनमें से बड़ा हिस्सा "पारिवारिक समस्याओं" को कारण बताता है।

पारिवारिक समस्याएं।

वो घर जो सबसे सुरक्षित होना चाहिए अक्सर सबसे बड़ा कारण बन जाता है।

गीता में उल्लेख है
"दम्भो दर्पोऽभिमानश्च"
(अहंकार, दंभ और अभिमान यह तीनों विनाश के द्वार हैं।)

जो पिता अपने बेटे को
सबके सामने बार-बार अपमानित करता रहा
शायद उसे यह नहीं पता था।

या पता था और परवाह नहीं थी।

दोनों ही दुखद हैं।

मैं हर पाठक से कह रहा हूं
यह पोस्ट किसी को जज करने के लिए नहीं है।
पर एक ईमानदार आईना दिखाने के लिए है।

अनुशासन और यातना में एक लंबी दीवार है।
अनुशासन कहता है:
"तुमसे गलती हुई। यह सीखो।"

यातना कहती है:
"तुम ही गलत हो। हमेशा से। हमेशा रहोगे।"

अनुशासन बच्चे को बेहतर बनाता है।
यातना बच्चे को तोड़ती है।

और जो टूटे हुए हैं वो एक दिन बिखर जाते हैं।

मैं युवाओं से कहूंगा
तो एक बात याद रखो

हर मर्ज का इलाज है।
रास्ता है।

विक्टर फ्रैंकल जो हिटलर के यातना शिविर (कंसंट्रेशन कैंप) से बच निकले थे
उन्होंने लिखा:
"When we are no longer able to change a situation
we are challenged to change ourselves."

जब घर बदलना संभव नहीं
तो खुद को बदलो।
घर से दूर कहीं सार्थक कार्य में खुद को व्यस्त रखो। जो आपना भविष्य बनाए।
अगर शारीरिक रूप से दूर रहना संभव है तो रहो।
मानसिक रूप से तो जरूरी है ही।

ऐसी परिस्थिति में थेरेपी लेनी चाहिए। थेरेपी लेना कमजोरी नहीं।
किसी शिक्षक, किसी डॉक्टर से बात करनी चाहिए।

प्रियांशु को शायद किसी थेरापिस्ट या समझानेवाले की जरूरत थी।
जो उसे आईना दिखाता, दुनिया में उससे भी बदतर हाल में जी रहे लोगों का हाल बताता।

"यह अज्ञानता थी। गलती नहीं।"

और अगर घर में रहना ही है
तो एक "मनोवैज्ञानिक दूरी" बनाओ।
जो कहा जाए वो सब को खुद पर हावी नहीं होने दो।
"यह उनकी समस्या है। आपकी नहीं।"
आपको अपनी मानसिक स्थिति को बेहतर रखना है।

प्रियांशु ने लिखा: "पापा जीत गए।"

नहीं।
कोई नहीं जीता।

इस लड़ाई में दोनों तरफ हार है।

--
अगर यह पोस्ट पढ़कर
कोई चेहरा मन में आया
जो शायद अभी ठीक नहीं है
तो आज उसे एक मैसेज भेजो।

बस इतना: "यार तू ठीक है?"

बस यही।

वो दो शब्द किसी की जिंदगी बचा सकते हैं।


iCall (Free Mental Health): 9152987821
Vandrevala Foundation (24×7): 1860-2662-345
Snehi (Hindi): 044-24640050
जब तनाव हद से अधिक हो तो ऊपर के नंबर्स पर कॉल कर सकते हैं।
यहां कोई आपको जज नहीं करेगा। यहां एक बातचीत आपको बहुत बेहतर कर सकता है।

हमारे गाँव मे एक मुसलमान हैं। पिताजी से उनकी मित्रता थी। उनकी लड़की निकाह के लायक हो गयी थी। गरीबी थी तो परेशान भी थे। उ...
18/03/2026

हमारे गाँव मे एक मुसलमान हैं। पिताजी से उनकी मित्रता थी।

उनकी लड़की निकाह के लायक हो गयी थी। गरीबी थी तो परेशान भी थे।

उन्होंने अपनी व्यथा पिताजी से कही तो पिताजी ने किसी दूसरे गाँव के परिचित एक संपन्न मुसलमान परिवार में उसकी बात चलाई।

वे लोग पिताजी की बात टाल न सके और उसका निकाह हो गया।

लड़की के पिता जब भी मेरे घर की ओर आते, इसका जिक्र करके हमेशा शुक्रिया अदा करते।

निकाह के दो साल बाद वह लड़की गाँव (मायके) आई थी। सूखे सूखे मुँह वाली वह पीली सी लड़की संपन्नता भोगकर भरी- पूरी हो गयी थी और रंग भी लाल टेस हो गया था। सुख के सारे चिन्ह चेहरे से ही प्रतिबिंबित हो रहे थे।

पिताजी ने औपचारिकतावश उससे पूछ लिया कि कैसी है तो वह बोल पड़ी:

चाचा तुहरे असिरवाद से बहुत सुखी बाटी लेकिन बियहवा शादिया में जौन तोहरे घरवां से पत्तलवा में चूरा दहिया और सब्जिया एक्के में जात रहल है, ओकर स्वाद नाहीं कौनों चीज मे मिलल।

पिताजी हतप्रभ रह गए। उनको लगा कि जिसने दुख दरिद्रता एक बार देख लिया हो, उसका प्रभाव उसपर से जाने में बड़ा समय लगता है।

अब मूल विषय पर आते हैं। स्वतंत्रता मिले सत्तर साल हो गए। दलितों को आरक्षण मिले भी लगभग उतना ही समय हो गया। स्कॉलरशिप, आयु में छूट, आपराधिक मामलों में उनकी तीव्र और एकपक्षीय सुनवाई, सारी योजनाओं के प्राथमिक लाभार्थी, परीक्षाओं में छूट जैसे विशेषाधिकार मिलने के बाद भी इनके मन से हीनताबोध नहीं जा रहा। बल्कि और भी विष ही बढ़ रहा।

सब कुछ के बाद भी अन्याय और अत्याचार की झूठी गाथा, अस्पृश्यता की आड़ लेकर तरह-तरह के प्रपंच रोज हो रहे हैं।

यह चित्र देखिये। यह किसी ब्राह्मण या राजपूत ने करने को बाध्य तो किया नहीं है। इसने खुद ही ऐसा रूप धारण किया हुआ है।

बाद में ऐसे चित्र और वीडियो जब इतिहास का हिस्सा बनेंगे तो यही कहा जायेगा कि इक्कीसवीं शताब्दी में भी दलितों के गले में घड़ा और गाँड़ में झाड़ू पहनाया जाता था।

राकेश मिश्र 'सरयूपारीण'

 #अश्वत्थामा की नसों में दौड़ता  #मैंगनीज (Manganese) या नियति का  #श्राप.....?महाभारत के युद्ध का वह अंतिम अध्याय, जिसम...
08/03/2026

#अश्वत्थामा की नसों में दौड़ता #मैंगनीज (Manganese) या नियति का #श्राप.....?
महाभारत के युद्ध का वह अंतिम अध्याय, जिसमें द्रोण पुत्र अश्वत्थामा ने उत्तरा के गर्भ पर ब्रह्मास्त्र का प्रहार किया, इतिहास की सबसे क्रूर घटनाओं में से एक माना जाता है। लेकिन आज के दौर में, जब विज्ञान और अध्यात्म का संगम हो रहा है, अश्वत्थामा की अमरता को लेकर एक अजीबोगरीब दावा सोशल मीडिया और छद्म विज्ञान (Pseudo-science) के गलियारों में तैर रहा है। दावा यह है कि अश्वत्थामा के रक्त में आयरन (Iron लोहा) के स्थान पर मैंगनीज (Manganese मैंगनीज) आधारित हीमोग्लोबिन था, जिसने उन्हें पांच हजार वर्षों तक जीवित रखा।

अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषण:।
कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन:॥
भावार्थ: अश्वत्थामा, राजा बलि, महर्षि व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और भगवान परशुराम—ये सात महापुरुष 'चिरजीवी' माने जाते हैं, जो युगों-युगों तक जीवित रहेंगे।

अश्वत्थामा का रहस्य दरअसल विज्ञान और धर्म के बीच की कड़ी है। अश्वत्थामा की अमरता कोई वरदान नहीं, बल्कि एक अंतहीन पीड़ा है। आइए इसे बहुत सरल भाषा में समझते हैं कि मैंगनीज (Manganese मैंगनीज) की कहानी और श्री कृष्ण का श्राप असल में क्या है।

रक्त की कहानी: लोहा (Iron) बनाम मैंगनीज (Manganese)
सरल शब्दों में कहें तो हमारा शरीर एक मशीन है और रक्त उसका ईंधन।

-इंसानी हकीकत क्या है ? हमारे खून में आयरन (Iron लोहा) होता है। यह ऑक्सीजन (Oxygen प्राणवायु) को पकड़कर शरीर के हर हिस्से तक पहुंचाता है। जैसे बिना पेट्रोल के गाड़ी नहीं चलती, वैसे ही बिना आयरन के इंसान जीवित नहीं रह सकता।
यदि हम जीव विज्ञान (Biology जीव विज्ञान) की दृष्टि से देखें, तो मानव शरीर का अस्तित्व ही आयरन (Iron) पर टिका है। हमारे रक्त में मौजूद हीमोग्लोबिन (Hemoglobin हीमोग्लोबिन) के केंद्र में आयरन होता है, जो फेफड़ों से ऑक्सीजन (Oxygen ऑक्सीजन) लेकर पूरे शरीर में पहुंचाता है।

मैंगनीज का भ्रम क्या है इसे समझते हैं। कुछ लोग तर्क देते हैं कि अश्वत्थामा का खून मैंगनीज आधारित था। विज्ञान के हिसाब से मैंगनीज ऑक्सीजन को वैसे नहीं पकड़ सकता जैसे आयरन। अगर खून में मैंगनीज बढ़ जाए, तो इंसान को 'मैंगनिज्म' (Manganism मानसिक विकार) हो जाता है, जिससे उसकी याददाश्त और चलने-फिरने की शक्ति खत्म हो जाती है।
इसलिए, 5000 साल जीने के लिए खून का बदलना वैज्ञानिक रूप से संभव नहीं दिखता। यह सिर्फ एक कल्पना है जो प्राचीन कहानियों को आधुनिक रूप देने के लिए गढ़ी गई है।
मैंगनीज (Manganese) शरीर के लिए एक आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrient सूक्ष्म पोषक तत्व) तो है, लेकिन यह ऑक्सीजन के परिवहन का काम नहीं कर सकता। यदि रक्त में आयरन को मैंगनीज से बदल दिया जाए, तो कोशिकाएं ऑक्सीजन के अभाव में तुरंत मृत हो जाएंगी। इसके अलावा, रक्त में मैंगनीज की उच्च मात्रा 'मैंगनिज्म' (Manganism मैंगनिज्म) नामक गंभीर बीमारी पैदा करती है, जो तंत्रिका तंत्र (Nervous System तंत्रिका तंत्र) को पूरी तरह नष्ट कर देती है। इसलिए, मैंगनीज आधारित रक्त की थ्योरी (Theory सिद्धांत) वैज्ञानिक धरातल पर कोरी कल्पना ही सिद्ध होती है।

2. श्राप का 'बायोलॉजिकल' (Biological जैविक) असर
महाभारत के अनुसार, अश्वत्थामा ने जब पांडवों के वंश को नष्ट करने की कोशिश की, तब श्री कृष्ण ने उन्हें दंड दिया।

श्लोक:
यस्मात्त्वं पापकृत्तमस्तस्मात्त्वं कुरुनन्दन।
अपरिचाय्य: सर्वभूतानां व्याधिभिः परिपीडितः॥
(हे पापी! तूने जो अपराध किया है, उसके कारण तू दुनिया की नजरों से ओझल होकर व्याधियों और रोगों से तड़पता हुआ युगों-युगों तक भटकेगा।)
यह श्राप किसी धातु (Metal धातु) के बदलने जैसा नहीं था, बल्कि शरीर की 'रिपेयरिंग' (Repairing मरम्मत) शक्ति को रोकने जैसा था। आज का विज्ञान कहता है कि हमारी कोशिकाएं (Cells कोशिकाएं) मरती हैं और नई बनती हैं। श्री कृष्ण का श्राप शायद अश्वत्थामा की कोशिकाओं को ऐसी स्थिति में ले गया जहाँ वे मरती तो हैं पर शरीर खत्म नहीं होता—एक ऐसा घाव जो कभी भरता नहीं।
पुराणों के अनुसार, अश्वत्थामा की दीर्घायु का कारण कोई रासायनिक बदलाव नहीं, बल्कि भगवान श्री कृष्ण का वह भयानक श्राप है जिसने उन्हें कलयुग के अंत तक व्याधियों के साथ भटकने पर मजबूर कर दिया।

अश्वत्थामा हतो हतः, नरो वा कुञ्जरो वा।

यह वह पंक्ति थी जिसने द्रोणाचार्य का अंत किया, लेकिन अश्वत्थामा का अंत कभी हुआ ही नहीं। उनके माथे से मणि निकाल ली गई, जिससे उनका घाव कभी नहीं भरता। यदि हम इसे आज के संदर्भ में देखें, तो यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ शरीर की कोशिकाएं (Cells कोशिकाएं) न तो मर रही हैं और न ही पूरी तरह स्वस्थ हो रही हैं। यह 'बायोलॉजिकल इमॉर्टिलिटी' (Biological Immortality जैविक अमरता) नहीं, बल्कि एक शाश्वत दंड है।
50 वर्षों का रहस्य और असीरगढ़ का किला
अश्वत्थामा के दिखने के सबसे अधिक दावे मध्य प्रदेश के असीरगढ़ किले और नर्मदा नदी के तटों से आते हैं। स्थानीय लोग कहते हैं कि वह आज भी शिव मंदिर में पूजा करने आते हैं। पिछले 50 वर्षों में उनके न दिखने की बात इसलिए कही जा रही है क्योंकि आधुनिक कैमरों और तकनीक के इस युग में कोई भी ठोस प्रमाण सामने नहीं आया है।
अश्वत्थामा के असीरगढ़ के किले या नर्मदा किनारे दिखने की बातें केवल सुनी-सुनाई हैं।
पिछले 50 सालों में सीसीटीवी (CCTV), सैटेलाइट (Satellite उपग्रह) और मोबाइल कैमरे हर जगह पहुँच गए हैं। इस दौर में किसी भी दिव्य पुरुष का छिपना आसान है, लेकिन प्रमाण मिलना मुश्किल।

भटकती आत्मा या शरीर: कुछ लोग उन्हें शरीर के रूप में देखते हैं, तो कुछ एक ऊर्जा के रूप में। विज्ञान के पास इसका कोई जवाब नहीं है क्योंकि 'अमरता' प्रयोगशाला (Laboratory प्रयोगशाला) का विषय नहीं, बल्कि अध्यात्म का रहस्य है।

रहस्यमयी कहानियों का अपना एक आकर्षण होता है, लेकिन जब हम विज्ञान की कसौटी पर कसते हैं, तो अश्वत्थामा का अस्तित्व रक्त की रसायन शास्त्र (Chemistry रसायन शास्त्र) से नहीं, बल्कि कर्मों के फल और ईश्वरीय विधान से जुड़ा नजर आता है। मैंगनीज वाली बात संभवतः प्राचीन ज्ञान को आधुनिक शब्दावली से जोड़ने का एक असफल प्रयास मात्र है। मैंगनीज वाली बात एक आधुनिक कहानी है, जबकि अश्वत्थामा का जीवित रहना एक आध्यात्मिक सत्य या लोककथा। वे आज भी हमारे बीच हैं या नहीं, यह शोध से अधिक श्रद्धा का विषय है।

इस प्रश्न अथवा दावे पर विश्लेषण समाप्त हुआ.....। अगले प्रश्न पर फिर से बातचीत होगी।

आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ.....। अगली कड़ी जल्द...।

अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज

#कृष्ण #महाभारत

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