Juned khan

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बग़दाद में तातारी फ़ौज की जीत के बाद, हलाकू ख़ान की बेटी बग़दाद में गश्त कर रही थी। उसी वक़्त एक भीड़ पर उसकी नज़र पड़ी। भीड़क...
29/10/2025

बग़दाद में तातारी फ़ौज की जीत के बाद, हलाकू ख़ान की बेटी बग़दाद में गश्त कर रही थी। उसी वक़्त एक भीड़ पर उसकी नज़र पड़ी। भीड़कर देखकर उसने पूछा- यह लोग यहां क्यों इकट्ठे हैं? जवाब आया- 'यह लोग एक आलिम के पास खड़े हैं'
हलाकू ख़ान की बेटी ने आलिम को अपने सामने पेश होने का आदेश दिया। आलिम को तातारी राजकुमारी के सामने ला खड़ा किया गया। राजकुमारी मुस्लिम आलिम से सवाल करने लगी। पूछा- 'क्या तुम लोग अल्लाह पर ईमान नहीं रखते?'
आलिम- बेशक हम ईमान रखते हैं।
राजकुमारी- क्या तुम्हें यक़ीन नहीं कि अल्लाह जिसे चाहे ताक़तवर बना देता है?
आलिम- बेशक हमारा इसपर यक़ीन है।
राजकुमारी- तो क्या अल्लाह ने हमें तुम पर ग़ालिब नहीं कर दिया है?
आलिम- यक़ीन ग़ालिब कर दिया है।
राजकुमारी- तो क्या यह इस बात की दलील नहीं कि अल्लाह हमें आप से ज़्यादह चाहता है?
आलिम- बिल्कुल नहीं।
राजकुमारी- कैसे?
आलिम- आप ने कभी चरवाहे को देखा है?
राजकुमारी- हाँ बिल्कुल देखा है।
आलिम- क्या भेड़ झुंड के पीछे चरवाहे ने अपने कुछ कुत्ते भी रख रहे होते हैं?
राजकुमारी- हां रखे होते हैं।
आलिम- अच्छा तो अगर कुछ भेड़ें चरवाहे को छोड़ किसी दूसरी तरफ़ निकल पड़ी हों और चरवाहे की बुलाने आवाज़ सुनकर ना आएं तो चरवाहा क्या करता है?
राजकुमारी- वह उनके पीछे अपने कुत्ते दौड़ाता है ताकि वह उन्हें वापस उसकी कमान में ले आएं।
आलिम- वह कुत्ते कबतक उन भेड़ों के पीछे पड़े रहते हैं?
राजकुमारी- जब तक वह फ़रार रहें और चरवाहे के सत्ता में वापस न आ जाएं।
आलिम- तो तातारी लोग ज़मीन पर हम मुसलमानों के पीछे छोड़े हुए कुत्ते हैं, जब तक हम अल्लाह पाक के दर से भागे रहेंगे और उसकी नाफ़रमानी करेंगे और उसकी कही बातों पर नहीं आएंगे, तब तक अल्लाह तुम्हें हमारे पीछे दौड़ाये रखेगा, तब तक हमारा अमन-चैन तुम हम पर हराम किए रखोगी, हाँ जब हम अल्लाह पाक के दर पर वापस आ जाएंगे उस दिन तुम्हारा काम ख़त्म हो जाएगा।
मुस्लिम आलिम के इस जवाब में आज हमारे मुआशरे के लिये बहुत कुछ छिपा हुआ है। cpy
#हक़_की_आवाज

दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है क्या यह सूरज की नई सुबह की आहट नहीं है?
23/09/2025

दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है क्या यह सूरज की नई सुबह की आहट नहीं है?

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