03/03/2026
📌 एक ऐसे #डॉक्टर की #दर्दनाक कहानी, जिसने अपना जीवन लोगों को समर्पित किया… और अंत में #अकेलेपन से हार गया 🕊️🖤
हम सब डॉक्टरों को समाज के सच्चे सेवक और जीवनदानी माना करते हैं, लेकिन क्या होता है जब वही सेवा करने वाले समाज द्वारा ही भूले-बिसरे हो जाएँ
#करनाल (हरियाणा) से आई यह खबर हर किसी के दिल को झकझोर देती है।
👨⚕️ डॉ. #हरिकिशन — एक पुराने जमाने के होम्योपैथिक चिकित्सक — जिनका नाम कई लोग “डॉक्टर हरिकृष्ण/हरनेल/हरनेल सिंह” के रूप में भी जानते थे, इनकी उम्र 82 वर्ष थी। जीवन के अंतिम दिनों तक उन्होंने नि:शुल्क #इलाज और सेवा का काम किया, लेकिन आज वही सेवक अकेलापन, बीमारी, और उपेक्षा से जूझते हुए इस दुनिया को अलविदा कह गए।
🏡 अकेलापन और उपेक्षा: उनके अंतिम साल
डॉ. हरिकिशन पिछले कई वर्षों से करनाल के सेक्टर 7 में अकेले रह रहे थे। उनकी पत्नी करीब चार साल पहले और दो बेटियाँ लगभग 12 साल से ऑस्ट्रेलिया में रह रहे थे। पति-पत्नी और बच्चों के बीच रिश्तों की दूरी इतनी बढ़ गई थी कि किसी ने उनके पास वापस आकर उनका हाल-चाल तक नहीं लिया।
उनके घर की हालत बेहद खराब थी — अंदर गंदगी और बदबू का आलम था, उनके कपड़े लंबे समय (लगभग डेढ़ साल से) नहीं बदले गए थे, और वे काफी कमजोर और बीमार हालत में थे। कुछ पड़ोसियों ने पिछले हफ्ते ही उनसे संपर्क किया और उनकी सहायता के लिए सामाजिक संगठनों को सूचित किया।
🤝 आज भी इंसानियत जिंदा है — लेकिन क्या समाज के लिए?
स्थानीय *अपना आशियाना* की टीम ने उन्हें उनके नाजुक हालात से बाहर निकालने की कोशिश की। कई लोगों को उनके जीवन की यह दयनीय स्थिति देखकर गहरा दुख और गुस्सा भी महसूस हुआ। लोगों ने सोशल मीडिया पर लिखा कि:
💬 “जो डॉक्टर कभी लोगों की जान बचाते थे, वही आज अपने घर में भुला दिए गए…”
💬 “क्या बेटियों और पत्नी को नहीं पता था कि उनके पिता अकेले और बीमार हैं?”
💬 “हम अपने बुजुर्गों का ख्याल रखने में इतनी असफल हो चुके हैं?”
दुर्भाग्यवश, #दयनीय हालत से उन्हें rescue किए कुछ ही दिनों बाद उनका देहांत हो गया, जब उनकी सेहत और भी बिगड़ गई। उनका शरीर अस्पताल में अंतिम समय तक इलाज के बावजूद संभल नहीं पाया और उन्होंने अंतिम सांस ली।
🕯️ सोचने वाली बात: अकेलापन, परिवार और समाज
यह कहानी सिर्फ एक अकेले बुज़ुर्ग डॉक्टर की दुखद मृत्यु नहीं है — यह है:
🔹 हमारे बदलते मूल्यों की कहानी
🔹 बुज़ुर्गों के प्रति उदासीनता का दर्दनाक सच
🔹 परिवार और रिश्तों की वह ख़ामोशी, जो हमें अक्सर दिखाई नहीं देती
हम ऐसे समाज में रहते हैं जहाँ बुज़ुर्ग अपने जीवन के आखिरी पड़ाव में अकेलापन महसूस करते हैं, जहाँ रिश्तों की दूरी इंसान को मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ देती है। कितने ही लोग हैं जिनके पास परिवार है, पर फिर भी वह अकेलापन महसूस करते हैं — यह सोचने और समझने की बात है। 💔
🙏 डॉ. हरिकिशन को श्रद्धांजलि
हम सबको चाहिए कि हम अपने बुज़ुर्गों, अपने माता-पिता, दादा-दादी, रिश्तेदारों को प्यार, समय, और सम्मान दें। सम्मान केवल शब्दों में नहीं — बल्कि समय, मिलन, और साथ देने में है।
🕯️ *डॉ. हरिकिशन — आपकी सेवा और समर्पण को हमारा सलाम। आपके जीवन की अंतिम राह ने हमें यह सिखाया कि इंसानियत का मतलब सिर्फ देने में नहीं, बल्कि साथ में जीने और साथ में निभाने में है।*
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👉 कृपया इस पोस्ट को साझा करें ताकि हम सब सोचें कि कैसे हम अपने बुज़ुर्गों को अकेला और उपेक्षित नहीं छोड़ सकते।
#मानवता