27/10/2025
असदुद्दीन ओवैसी का साथ क्यों दें: इत्तेहाद (एकता) की ज़रूरत
अस्सलाम-ओ-अलैकुम,
आज हमारे सामने एक अहम सियासी (राजनीतिक) सवाल है: क्या हम असदुद्दीन ओवैसी साहब का समर्थन करें, जबकि कुछ लोग मानते हैं कि कैंडिडेट (उम्मीदवार) उनकी व्यक्तिगत पसंद के मुताबिक नहीं हैं?
इस बात को समझें: ओवैसी साहब सिर्फ एक पार्टी के मुखिया नहीं हैं; वह कौम (समुदाय) की ज़ुबान हैं।
* कैंडिडेट बनाम लीडरशिप (Candidate vs. Leadership):
* हम मानते हैं कि हर ज़िले में हमारा पसंदीदा उम्मीदवार हो सकता है। यह लोकतंत्र (Democracy) है और राय का फ़र्क होना स्वाभाविक है।
* मगर, हमें यह याद रखना होगा कि हमारी लड़ाई एक गली या एक सीट के लिए नहीं, बल्कि दिल्ली तक हमारी आवाज़ पहुँचाने के लिए है।
* हमारी आवाज़, हमारी ताकत:
* जब संसद (Parliament) में CAA/NRC, वक्फ संपत्ति या मुसलमानों से जुड़े किसी भी बड़े मुद्दे पर कोई आवाज़ नहीं उठाता, तो असदुद्दीन ओवैसी अकेले खड़े होते हैं और बिना किसी डर के हक़ (सत्य) बोलते हैं।
* वह एकमात्र नेता हैं जो बेशकियत (fearlessly) और पूरी तैयारी के साथ मुसलमानों के हर संवैधानिक (Constitutional) अधिकार के लिए लड़ते हैं।
* मकसद पर ध्यान दें (Focus on the Goal):
* अगर हम सिर्फ इसलिए वोट नहीं देंगे क्योंकि उम्मीदवार हमारी पसंद का नहीं है, तो हम अपनी सबसे मज़बूत आवाज़ को कमज़ोर कर देंगे।
* कमज़ोर उम्मीदवार के बहाने घर बैठने का मतलब है ओवैसी साहब की ताकत को कम करना, और यह सियासी नुकसान (political loss) पूरी कौम का होगा।
इत्तिहाद का वक्त है (It is time for Unity):
याद रखें, हमारा वोट उम्मीदवार को नहीं, बल्कि उस बुनियाद (Foundation) को मज़बूत करेगा जिस पर ओवैसी साहब खड़े हैं। हमें अपनी व्यक्तिगत पसंद को किनारे रखकर, ओवैसी साहब को इतनी ताक़त देनी है कि वह मज़बूती से हर मंच पर हमारी बात रख सकें।
हर मुसलमान का वोट ओवैसी साहब की आवाज़ को एक नया दम देगा। एकजुट हो जाएँ, क्योंकि आज अगर हम अपनी आवाज़ को खुद कमज़ोर करेंगे, तो कल हमें सुनने वाला कोई नहीं रहेगा।
वोट दें, और ओवैसी साहब की आवाज़ को बुलंद करें!