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दारू पीना स्वास्थ्य और समाज दोनों के लिए अहितकर है     #
17/03/2026

दारू पीना स्वास्थ्य और समाज दोनों के लिए अहितकर है #

देखते हैं आप की आंखें कितनी तेज हैं गोले के अंदर क्या लिखा है
14/03/2026

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फसल को पहचानो और बताइए कि कौन सी फसल है
22/02/2026

फसल को पहचानो और बताइए कि कौन सी फसल है

गांव के बाहर फैला वह सूखा सा खेत आज भी उम्मीद से भरा था। धूप तेज थी, मिट्टी भुरभुरी थी, लेकिन किसानों के चेहरों पर थकान ...
22/02/2026

गांव के बाहर फैला वह सूखा सा खेत आज भी उम्मीद से भरा था। धूप तेज थी, मिट्टी भुरभुरी थी, लेकिन किसानों के चेहरों पर थकान से ज़्यादा हौसला था। बैलों की जोड़ी हल खींचकर खेत जोत चुकी थी, और अब सब किसान थोड़ी देर के विश्राम के लिए गोल घेरा बनाकर बैठ गए थे।
रामू काका ने अपनी पगड़ी ठीक करते हुए कहा, “भाइयों, इस बार बारिश समय पर हो जाए तो फसल लहलहा उठेगी।”
भीतर से सबके मन में यही दुआ थी। मोहन ने मिट्टी की ढेली उठाकर देखा और बोला, “मिट्टी तो तैयार है, बस आसमान का साथ चाहिए।”
सबने अपने-अपने लोटों से पानी पिया, कोई गुड़ खा रहा था, कोई रोटी का टुकड़ा। बातें सिर्फ खेती की नहीं थीं—बच्चों की पढ़ाई, घर की जिम्मेदारियाँ, और आने वाले त्योहारों की भी चर्चा हो रही थी। कठिन मेहनत के बीच यही छोटे-छोटे पल उन्हें ताकत देते थे।
उधर बैल शांत खड़े थे, मानो वे भी किसानों की उम्मीदों को समझते हों। खेत में चारों ओर फैली शांति में बस हवा की सरसराहट और दूर पेड़ों की हल्की हिलती टहनियाँ सुनाई दे रही थीं।
थोड़ी देर बाद रामू काका उठे और बोले, “चलो भाइयों, मेहनत फिर से शुरू करें। पसीना गिरेगा तभी अन्न उगेगा।” सबने एक-दूसरे की ओर मुस्कुराकर देखा और फिर अपने काम में लग गए।
उस सूखी मिट्टी में सिर्फ बीज ही नहीं बोए जा रहे थे—वहाँ बोई जा रही थी उम्मीद, एक बेहतर कल की। 🌾

कंचा खेलने वालो आ जाओ मैदान में
20/02/2026

कंचा खेलने वालो आ जाओ मैदान में

एक ऊँची, खड़ी पहाड़ी पर एक सफेद बकरी चट्टान के छोटे से किनारे पर खड़ी थी। नीचे से एक तेंदुआ धीरे-धीरे चढ़ता हुआ उसकी ओर ...
19/02/2026

एक ऊँची, खड़ी पहाड़ी पर एक सफेद बकरी चट्टान के छोटे से किनारे पर खड़ी थी। नीचे से एक तेंदुआ धीरे-धीरे चढ़ता हुआ उसकी ओर बढ़ रहा था। बकरी ने खतरा भाँप लिया, लेकिन घबराने के बजाय उसने धैर्य से काम लिया।
तेंदुआ बोला, “अब तुम्हारा बचना मुश्किल है।”
बकरी मुस्कुराई और शांत स्वर में बोली, “ऊपर आने की कोशिश तो कर लो, लेकिन याद रखो, यहाँ एक ही के लिए जगह है।”
तेंदुआ तेज़ी से छलांग लगाने की सोच ही रहा था कि उसका पैर फिसला। बड़ी मुश्किल से वह खुद को संभाल पाया। उसे समझ आ गया कि जल्दबाज़ी उसकी जान भी ले सकती है। नीचे गहरी खाई थी।
बकरी ने साहस और समझदारी से काम लिया। वह धीरे-धीरे दूसरी ओर सुरक्षित रास्ते से उतर गई। तेंदुआ खाली पंजों और झुकी नज़र के साथ वापस लौट गया।
शिक्षा:
मुसीबत के समय घबराने के बजाय धैर्य और बुद्धिमानी से काम लेना चाहिए। कई बार साहस और समझदारी, ताकत से भी बड़ी होती है।

हरे-भरे खेतों के बीच एक छोटा-सा गाँव था। गाँव के किनारे एक केला का पेड़ था, जिस पर मीठे और सुनहरे केले लटक रहे थे। उसी प...
19/02/2026

हरे-भरे खेतों के बीच एक छोटा-सा गाँव था। गाँव के किनारे एक केला का पेड़ था, जिस पर मीठे और सुनहरे केले लटक रहे थे। उसी पेड़ से लिपटा हुआ एक विशाल अजगर रहता था। लोग उसे देखकर डर जाते और उस रास्ते से जाना छोड़ चुके थे।
गाँव में चिंटू नाम का एक साहसी लड़का रहता था। उसने देखा कि अजगर किसी को नुकसान नहीं पहुँचा रहा, बस पेड़ से लिपटकर शांत बैठा रहता है। एक दिन चिंटू धीरे-धीरे उसके पास गया। उसने देखा कि अजगर की आँखों में डर था, गुस्सा नहीं। दरअसल, कुछ शरारती लोग उसे पकड़ने की कोशिश कर रहे थे, इसलिए वह पेड़ के पास छिपकर रहता था।
चिंटू ने गाँव वालों को समझाया कि हर बड़ा और डरावना दिखने वाला जीव खतरनाक नहीं होता। उसने सबको बताया कि अजगर बस अपने लिए सुरक्षित जगह ढूँढ रहा है। गाँव वालों ने फैसला किया कि वे उसे परेशान नहीं करेंगे।
धीरे-धीरे अजगर भी इंसानों से डरना छोड़कर जंगल की ओर लौट गया। केला का पेड़ फिर से सबके लिए सुरक्षित हो गया।
इस घटना से गाँव वालों ने सीखा कि डर के पीछे कभी-कभी एक मासूम सच्चाई छिपी होती है।

गाँव के कच्चे रास्ते पर उस दिन बड़ा अनोखा नज़ारा था। सब लोग हैरान थे, क्योंकि एक बुजुर्ग अंकल हरे-भरे बाँस से बनी मोटरसा...
19/02/2026

गाँव के कच्चे रास्ते पर उस दिन बड़ा अनोखा नज़ारा था। सब लोग हैरान थे, क्योंकि एक बुजुर्ग अंकल हरे-भरे बाँस से बनी मोटरसाइकिल पर शान से बैठे चले आ रहे थे। ऊपर से किसी ने मज़ाक में लिख दिया था—“मोदी जी फन्नी”!
असल में कहानी ये थी कि गाँव में पेट्रोल के दाम बढ़ने की चर्चा चल रही थी। तब इन अंकल ने कहा, “जब जंगल में इतना बाँस है, तो पेट्रोल की क्या ज़रूरत?” बस फिर क्या था! उन्होंने कारीगरों को बुलाया और पूरी बाइक बाँस की बनवा डाली—हैंडल, सीट, यहाँ तक कि डिक्की भी टोकरी जैसी!
पहले दिन जब वे स्टार्ट करने लगे, तो सब बच्चे हँस रहे थे—“अंकल, ये चलेगी भी या बकरी की तरह मे-मे करेगी?” अंकल मुस्कुराए और बोले, “ये बाइक नहीं, प्रकृति एक्सप्रेस है!”
जैसे ही उन्होंने पैडल मारा (क्योंकि इंजन तो था ही नहीं), बाइक सरसराती हुई चल पड़ी। हवा चलती तो लगता जैसे बाँसुरी बज रही हो। रास्ते में गाय भी एक पल को रुककर देखने लगी।
गाँव के चाचा बोले, “भाई, ये बाइक है या सब्ज़ी रखने की टोकरी?”
अंकल हँसकर बोले, “दोनों! जाते-जाते सब्ज़ी भी ले आऊँगा।”
उस दिन से गाँव में जब भी कोई नई अजीब चीज़ दिखती, लोग कहते—“लगता है फिर से फन्नी बाइक का आइडिया आ गया!”
और अंकल? वे अब भी मुस्कुराते हुए अपनी बाँस वाली बाइक पर घूमते हैं, बिना पेट्रोल और बिना टेंशन! 😄 🔥🔥🔥

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16/02/2026

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16/02/2026

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