29/05/2026
पुराने हवेली वाले घर में अकेले बैठे चाचा अर्जुन को तूफान वाली रात में पड़ोसी ने वो पुराना लिफाफा थमाया जिसमें उनकी बहन ईशा का फीका पड़ चुका लॉकेट निकला… और दमन का खत जो तीस साल से उनके दुश्मन को माफ़ी माँग रहा था…
भारी बारिश हो रही थी उस रात। बिजलियाँ गरज रही थीं और पुरानी हवेली की दीवारों पर परिवार की वो तस्वीरें टंगी थीं जो कभी पूरा परिवार था। चाचा अर्जुन अकेले रसोई की मेज पर बैठे चाय का आखिरी घूँट पी रहे थे। पत्नी गुजर चुकी थी, बच्चे शहर चले गए थे। बस खामोशी और वो घाव बचे थे जो तीस साल से नहीं भरे थे।
तभी दरवाजे पर खटखटाहट हुई। पड़ोसी भीगा हुआ अंदर आया और एक पुराना लिफाफा थमाया, “चाचा, किसी ने ये छोड़ गया है। बोला बहुत जरूरी है।”
अर्जुन ने लिफाफा लिया। कागज पुराना, हस्ताक्षर काँपते हुए। नाम लिखा था—अर्जुन सिंह। खोलते ही मेज पर एक छोटी सी चीज गिरी—ईशा का वो फीका लॉकेट। अंदर छोटी सी तस्वीर थी उनकी बहन की, जो तीस साल पहले नदी में डूबकर गुजर गई थी।
उनके सीने में आग सी लग गई। लॉकेट के साथ था दमन का खत। दमन—वो शख्स जिसे अर्जुन ने तीस साल तक बहन की मौत का जिम्मेदार माना था। अपना सबसे अच्छा दोस्त, फिर सबसे बड़ा दुश्मन।
“अर्जुन, मुझे माफ कर दो। मैं हूँ दमन।” पहली लाइन पढ़ते ही उनका हाथ सख्त हो गया।
यादें लौट आईं। जवान दिनों की। अर्जुन और दमन खेतों में, नदी किनारे, स्कूल में एक साथ सपने देखते थे। दमन गरीब था लेकिन ईमानदार। अर्जुन परिवार का बड़ा बेटा। बहन ईशा दोनों की जान थी। धीरे-धीरे दमन और ईशा के बीच प्यार हो गया। अर्जुन को गुस्सा आया। “उसके पास तुझे देने को क्या है?” उसने बहन से कहा था।
ईशा रोई थी, “भैया, मुझे दिल चाहिए, पैसा नहीं।”
फिर वो रात आई जब ईशा गायब हो गई। पुल पर दमन के साथ देखा गया। सुबह उसका शव नदी में मिला। अर्जुन ने दमन को कोसा, ढूँढा, लेकिन वो गाँव छोड़ चुका था। तीस साल तक यही विश्वास था कि दमन ने बहन को बहकाया और छोड़ दिया।
लेकिन आज लॉकेट में ईशा का खुद का छोटा सा कागज था। अर्जुन के हाथ काँप रहे थे। बाहर बारिश तेज हो गई थी, लेकिन उन्हें कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। सिर्फ बहन का खत।
“भैया अर्जुन, अगर ये पढ़ रहे हो तो जान लो… दमन ने मुझे कभी चोट नहीं पहुँचाई। वो मुझे बचाने की कोशिश कर रहा था।”
अर्जुन की आँखें भर आईं। तीस साल का गुस्सा, नफरत, कोसने… सब हिलने लगा। ईशा ने लिखा था कि एक अमीर व्यापारी उसे जबरदस्ती शादी के लिए मजबूर कर रहा था। परिवार के कर्ज के बदले। ईशा डरी हुई थी। उसने दमन को बताया। दोनों शिकायत करने शहर जा रहे थे, भाग नहीं रहे थे।
पुल पर किसी ने देख लिया। झगड़ा हुआ। ईशा डर के मारे नदी में गिर गई। दमन कूद पड़ा बचाने, लेकिन बहाव तेज था। सिर्फ लॉकेट हाथ लग सका।
अर्जुन का गला रुक गया। “तीस साल… मैंने तुझे गलत समझा दमन।”
दमन का खत भी था। उसने लिखा था कि व्यापारी के आदमियों ने उसे पीछा किया। वो भागा नहीं, परिवार को बचाने के लिए चुप रहा। सालों तक लॉकेट और ईशा का खत संभाले रखा। अब वो बीमार है, शायद आखिरी दिनों में।
अर्जुन ने लिफाफा मेज पर रखा। आँखें सूजी हुई थीं। बाहर तूफान अभी भी चल रहा था। लेकिन उनके अंदर एक और तूफान उठ चुका था—पछतावा, दर्द और वो सवाल कि अब क्या करें।
अगली सुबह नींद कम होने के बावजूद वे निकल पड़े। खत के पीछे लिखा पता था—दूर का एक छोटा सा गाँव। लॉकेट जेब में, ईशा का खत सीने से लगाए, अर्जुन बस पकड़कर चल दिए। दिल में एक ही इरादा था—दमन को ढूँढना, जो अब शायद मरने वाला हो।
जब वे उस छोटे से घर पहुँचे, बाहर सफेद चादर तनी हुई थी। दरवाजा खटखटाया। नर्स ने उदास नजरों से देखा, “क्या आप चाचा अर्जुन हैं? वो आपका इंतजार कर रहे हैं।”
अंदर जाते ही अर्जुन का दिल धक से रह गया। बिस्तर पर दमन लेटा था—दुबला, पीला, लेकिन आँखों में वही पुरानी चमक लौट आई जब उसने अर्जुन को देखा…
“अर्जुन…”