29/05/2026
रात के अंधेरे में ऑटो चलाते चाचा सुरेश ने सोचा था कि आज की आखिरी सवारी घर ले जाएगी… लेकिन सड़क के किनारे रोती हुई छोटी सी प्रिया को देखकर उन्होंने बिना सोचे उसे गोद में उठा लिया—और उसी पल पता चला कि उसकी माँ अस्पताल में आखिरी साँस ले रही है, जबकि पापा कहीं खो गए हैं…
रात गहरा चुकी थी।
चाचा सुरेश की पुरानी ऑटो हाईवे से घर की ओर लौट रही थी। पूरे दिन की थकान कमर में दर्द बनकर बस रही थी। हल्की बारिश ने सड़क को चमका दिया था और स्ट्रीट लाइटों की पीली रोशनी में सब कुछ उदास लग रहा था।
तभी उनकी नजर सड़क के किनारे एक छोटी सी आकृति पर पड़ी। पाँच-छह साल की लड़की, गंदे कपड़ों में खुद को गले लगाए, सिसक-सिसक कर रो रही थी। आस-पास कोई नहीं। कोई दुकान खुली नहीं। सिर्फ उसकी सिसकियाँ हवा में घुल रही थीं।
चाचा सुरेश ने तुरंत ब्रेक मारा। ऑटो रुकते ही वे नीचे उतरे।
“बेटी, तुम यहाँ क्या कर रही हो?” प्यार से पूछा।
बच्ची ने ऊपर देखा। सूजी आँखें, काँपते होंठ। “मैं खो गई हूँ…” रोते हुए बोली।
चाचा ने बिना एक पल सोचे उसे उठाया, अपनी सीट पर बिठाया और पुरानी गमछे से उसका मुँह पोंछा। “डरो मत बेटी। मैं तुम्हारे साथ हूँ। नाम क्या है तुम्हारा?”
“प्रिया…”
“प्रिया, तुम्हारे माँ-बाप कहाँ हैं?”
बच्ची का रोना और तेज़ हो गया। उसने चाचा सुरेश के कपड़े को जकड़ लिया जैसे यही दुनिया की आखिरी सहारा हो। चाचा के मन में अजीब सा डर समा गया। उन्होंने कई रातें ऑटो चलाई थीं—नशेड़ी, बीमार, थके हुए लोग—but इस छोटी सी बच्ची का बोझ कुछ और ही था।
उन्होंने पास की खुली दुकान से बिस्किट और पानी मँगवाया। प्रिया को खिलाते हुए धीरे-धीरे पूछा, “बेटी, आखिरी बार पापा को कहाँ देखा था?”
प्रिया ने आँसू पोंछते हुए बताया, “हम अस्पताल गए थे… माँ को साँस लेने में तकलीफ हो रही थी। पापा ने कहा—वेटिंग शेड में इंतज़ार करो, मैं पैसे उधार लाता हूँ। फिर कुछ लोग आए… मुझे डर लग गया… पापा कहीं चले गए…”
चाचा सुरेश का कलेजा कस गया।
फिर प्रिया ने वो शब्द बोले जो रात की सारी योजना बदल गए—
“भैया… माँ ने कहा था, अगर मैं चली गई तो पापा का ख्याल रखना। मुझे अकेला पापा मत छोड़ना…”
उस छोटी सी गुजारिश ने चाचा सुरेश के सीने में कुछ तोड़ दिया। उन्हें अपनी पत्नी की याद आ गई—जिस रात वह अस्पताल में चली गई थी और वे अकेले घर लौटे थे। उसी पल उन्होंने “फॉर हायर” की लाइट बंद कर दी।
“कोई और सवारी नहीं, प्रिया। हम तुम्हारे पापा को ढूँढेंगे। भले रात कितनी भी लंबी हो जाए।”
ऑटो प्रांतीय अस्पताल की ओर दौड़ पड़ी। रास्ते भर चाचा प्रिया से बात करते रहे, उसे ब्रेड-दूध खिलाया—वो पैसे जो अगले दिन के नाश्ते के लिए थे। अस्पताल पहुँचते ही माहौल भारी था। गलियारों में रोने की आवाज़ें, प्रार्थनाएँ, इंतज़ार।
रिसेप्शन पर पता चला—सुनीता को प्रांतीय अस्पताल शिफ्ट कर दिया गया है। और एक आदमी घंटों से अपनी बेटी को ढूँढ रहा है।
चाचा सुरेश प्रिया को गोद में लिए चैपल के पीछे गए। अंधेरे गलियारे के अंत में एक आदमी फर्श पर बैठा, सिर झुकाए, बार-बार अपनी बेटी का नाम लेते हुए रो रहा था।
प्रिया ने चीख मारी—
“पापा!”
और गोद से छूटकर दौड़ पड़ी…