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एक मित्र कर्ण जैसा भी होना चाहिए जो जाने तुम गलत हो फिर भी तुम्हारा साथ दे -Ek Mitra Aisa Bhi, Ek Mitra Karn Jaisa Bhi H...
21/07/2026

एक मित्र कर्ण जैसा भी होना चाहिए जो जाने तुम गलत हो फिर भी तुम्हारा साथ दे -
Ek Mitra Aisa Bhi, Ek Mitra Karn Jaisa Bhi Ho

World International Yoga Day 2026
21/06/2026

World International Yoga Day 2026

सूर्यपुत्र कर्ण सनातन धर्म के महान महाकाव्य 'महाभारत' के सबसे पराक्रमी, दानवीर और जटिल पात्रों में से एक थे। उन्हें अंग ...
18/06/2026

सूर्यपुत्र कर्ण सनातन धर्म के महान महाकाव्य 'महाभारत' के सबसे पराक्रमी, दानवीर और जटिल पात्रों में से एक थे। उन्हें अंग देश का राजा होने के कारण अंगराज कर्ण भी कहा जाता है।

महाभारत के अनुसार उनके जीवन की मुख्य बातें नीचे दी गई हैं:

जन्म और परिचय: कर्ण पांडवों की माता कुंती के सबसे बड़े पुत्र थे। कुंती ने कौमार्य (शादी से पहले) में सूर्यदेव की आराधना करके उन्हें वरदान के रूप में प्राप्त किया था। लोक-लाज के डर से कुंती ने नवजात कर्ण को एक टोकरी में रखकर गंगा नदी में बहा दिया था।

पालन-पोषण: अधिरथ नाम के एक सूत (रथ चालक) और उनकी पत्नी राधा ने कर्ण को नदी से निकाला और अपने बेटे की तरह पाला। इसी कारण कर्ण को 'सूतपुत्र' या 'राधेय' (राधा का पुत्र) कहा गया।

अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा: सूतपुत्र होने के कारण गुरु द्रोणाचार्य ने उन्हें शिक्षा देने से मना कर दिया था। इसके बाद कर्ण ने ब्राह्मण का भेष बदलकर भगवान परशुराम से ब्रह्मास्त्र सहित कई दिव्य अस्त्रों की शिक्षा ली। बाद में सच्चाई पता चलने पर परशुराम ने श्राप दिया कि सबसे कठिन समय में कर्ण अपनी विद्या भूल जाएंगे।

दुर्योधन से अटूट दोस्ती: रंगभूमि में जब सूतपुत्र कहकर कर्ण का अपमान किया जा रहा था, तब दुर्योधन ने उनकी वीरता देखकर उन्हें अंग देश का राजा घोषित किया और उन्हें समाज में सम्मान दिया। कर्ण ने जीवनभर दुर्योधन की इस भलाई का कर्ज चुकाया और कौरवों का साथ दिया।

दानवीरता: कर्ण के पास जो भी मांगने आता, वे उसे कभी खाली हाथ नहीं भेजते थे। इंद्रदेव ने जब ब्राह्मण का रूप धरकर उनके जन्मजात सुरक्षा कवच और कुंडल दान में मांगे, तो कर्ण ने जानते हुए भी कि इससे उनकी जान को खतरा है, अपने शरीर से अलग करके उन्हें दान कर दिए।

कुरुक्षेत्र युद्ध और अंत: कुरुक्षेत्र के युद्ध में वे कौरव सेना के प्रधान सेनापति बने। युद्ध के 17वें दिन, परशुराम के श्राप और नियति के खेल के कारण जब उनके रथ का पहिया जमीन में धंस गया, तब श्रीकृष्ण के कहने पर अर्जुन ने अंजलि अस्त्र से कर्ण का वध कर दिया।

महावीर और सच्चे मित्र होने के बावजूद, जीवनभर सामाजिक भेदभाव, श्राप और किस्मत की मार झेलने के कारण कर्ण को महाभारत का सबसे 'दुखांत' (Tragic) पात्र माना जाता है।

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दिगंत काँपे, ब्रह्मांड डोलता,
मृत्यु का रचता वो मरण-राग है।
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हे मृत्यु तैयार आ, दी तू आने को...

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