15/02/2026
ये तस्वीरें 80-90 के दशक में लगभग हर मुस्लिमों के घरों में लगी होती थी ज़माने के साथ सब कुछ बदल गया
लोगों मे दुनिया के साथ दीन-ए-इस्लाम को सही ढंग से सीखने समझने का शौक पैदा हुआ, अल्हम्दुलिल्लाह।
लोग पीरो - फ़क़ीरो - बाबाओ के चंगुल से ख़ुद को छुड़ाकर सीधे रास्ते की तरफ़ चल पड़े।
🙋♂️जहन्नुम मे गुमराह आलीमो, पीरो और उनके मुरीदो के झगड़े…..
1️⃣ जब ये लोग जहन्नम मे एक दूसरे से झगड़ रहे होगें तो दुनिया के हिसाब से जो कमज़ोर होगें वे बड़ा बनने वालो से कहेंगे (दुनिया मे) हम तुम्हारे मानने वाले थे अब क्या तुम यहां जहन्नम की आग की तकलीफ़ के कुछ हिस्से से हमे बचा लोगे? बड़ा बनने वाले जवाब देंगे, हम सब यहां एक ही हाल मे हैं अल्लाह बन्दो के बीच फ़ैसले कर चुका है। (सूरह मोमिन 40: 47-48)
2️⃣ जिस दिन उनके चेहरे आग मे उलट पलट किये जायेगे उस वक़्त ये कहेगे काश हमने अल्लाह और उसके रसूल की इताअत की होती और फ़रियाद करेगे ऐ हमारे रब! हमने अपने सरदारो और अपने बड़ो की इताअत की उन्होने हमे सीधी राह से गुमराह कर दिया ऐ हमारे रब! अब उन्हें दुगुना अज़ाब दे और उन पर सख़्त लानत कर।
(सूरह अहज़ाब 33: 66-68)
3️⃣ (गुमराह उल्मा और आवाम) एक दूसरे कि तरफ़ मुतवज्जह होकर सवाल जवाब करेगे (अवाम) कहेगे की तुम हमारे पास आकर क़समे खाते थे (कि हम तुम्हारी हक़ की तरफ़ रहनुमाई कर रहे हैं गुमराह उल्मा) कहेगे तुम ख़ुद ही ईमान लाने वाले नही थे हमारा तुम पर कोई ज़ोर नही था तुम लोग ख़ुद ही नाफ़रमान थे आख़िरकार हम अपने रब के उस फ़रमान के हक़दार हो ही गये हम अज़ाब का मज़ा चखने वाले हैं चूंकि हम ख़ुद गुमराह थे लिहाज़ा तुम्हें भी गुमराह किया उस दिन वे सब (गुमराह करने वाले और गुमराह होने वाले) आज़ाब मे (एक दूसरे) के साथी होंगे। (सूरह साफ़्फ़ात 37: 27-33)
4️⃣और (क़यामत के दिन) लोग सबके सब अल्लाह के सामने निकल खड़े होगें जो लोग (दुनिया में कमज़ोर थे बड़ी इज्ज़त रखने वालो से (उस वक़्त) कहेंगें कि हम तो बस तुम्हारे क़दम ब क़दम चलने वाले थे तो क्या (आज) तुम अल्लाह के अज़ाब से कुछ भी हमारे आड़े आ सकते हो वह जवाब देगें काश अल्लाह हमारी हिदायत करता तो हम भी तुम्हारी हिदायत करते हम ख़्वाह बेक़रारी करें ख़्वाह सब्र करे (दोनो) हमारे लिए बराबर है (क्योंकि अज़ाब से) हमें तो अब छुटकारा नहीं।
(सूरह इब्राहिम 14: 21)
🤲अल्लाह सुब्हान व तआला हमे क़ुरआन ओ सुन्नत पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता करे।
"Aamin"
Md Zahid Akhtar