29/05/2026
बॉलीवुड का पुराना दस्तूर रहा है कि यहाँ 'कमिटमेंट' की उम्र सिर्फ उतनी ही होती है, जितनी बड़ी निर्माता की जेब या स्टार का नखरा हो। इतिहास इस बात का गवाह है कि जब बड़े-बड़े सूरमाओं ने ऐन वक्त पर चलते हुए प्रोजेक्ट्स से हाथ खींचे, तो फिल्म इंडस्ट्री ने हमेशा अपनी आँखों पर 'सद्भावना' की पट्टी बांध ली। याद कीजिए जब ऐश्वर्या राय बच्चन ने मात्र 7-8 दिन की शूटिंग के बाद अचानक मधुर भंडारकर की फिल्म 'हीरोइन' छोड़ दी थी। बेचारे मधुर डिप्रेशन में चले गए, सेट कबाड़ हो गया, लेकिन किसी ने ऐश्वर्या पर 'बैन' की तख्ती नहीं लटकाई; चुपचाप करीना कपूर को लाकर काम चला लिया गया। इसी तरह, जेपी दत्ता की फिल्म 'पलटन' का पूरा क्रू लद्दाख की हाड़ कंपाने वाली ठंड में पहले शेड्यूल के लिए कैमरा स्टैंड लगाकर खड़ा था, और जूनियर बच्चन यानी अभिषेक बच्चन ने ऐन मौके पर वॉकआउट कर दिया। तब किसी ट्रेड यूनियन को 'इंडस्ट्री के अनुशासन' की याद नहीं आई।
इतना ही नहीं,जब करीना कपूर ने 'कहो ना प्यार है' के सेट से पहले ही शेड्यूल में टाटा-बाय-बाय कह दिया, या प्रियंका चोपड़ा ने सलमान खान की 'भारत' को शादी का कार्ड थमाकर बीच में छोड़ दिया, तो बॉलीवुड ने इसे 'स्टार्स की पर्सनल चॉइस' मानकर दिल पर पत्थर रख लिया। इन तमाम मामलों में करोड़ों स्वाहा हुए, निर्माता खून के आंसू रोए, लेकिन किसी माई के लाल ने इन सितारों के खिलाफ कोई 'फतवा' या गैर-सहयोग आंदोलन नहीं चलाया।
लेकिन… लेकिन! जब बात रणवीर सिंह की आती है, तो एक्सेल एंटरटेनमेंट के फरहान अख्तर और रितेश सिधवानी का 'कॉन्ट्रैक्ट लव' अचानक जाग उठता है। जैसे ही रणवीर ने 'डॉन 3' को अपनी मर्जी से 'नो थैंक्स' कहा, वैसे ही फेडरेशन (FWICE) ने ढोल-नगाड़े बजाकर प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और रणवीर पर 'इंडस्ट्री बैन कम बॉयकॉट' का थप्पा मार दिया। जो रणवीर सिंह कल तक इनकी आँखों का तारा था, जिसने इनके लिए 'दिल धड़कने दो' और 'गली बॉय' में मुफ़्त की एक्टिंग जैसी शिद्दत दिखाई थी, वह अचानक पूरी इंडस्ट्री के लिए 'विलेन' कैसे बन गया? क्या मामला वाकई सिर्फ 'डॉन 3' की अधूरी स्क्रिप्ट या 45 करोड़ के कथित नुकसान का है? अगर आप ऐसा सोचते हैं, तो हुजूर, आप बॉलीवुड ल्यारी की क्रोनोलॉजी को नहीं समझ रहे हैं।
असल में, इस पूरे ड्रामे की स्क्रिप्ट 'डॉन 3' के ऑफिस में नहीं, बल्कि वैचारिक अखाड़े में लिखी गई है। रणवीर सिंह ने हाल ही में 'धुरंधर' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्म देकर बॉक्स ऑफिस पर जो धमाका किया, उसने ल्यारी के सुल्तानों की नींद उड़ा दी थी। लेकिन बॉलीवुड के लिए असली 'पाप' तो तब हुआ जब अप्रैल के पहले हफ्ते में रणवीर सिंह सीधे नागपुर स्थित आरएसएस (RSS) मुख्यालय जा पहुंचे। वहां उन्होंने न केवल डॉक्टर हेडगेवार को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की, बल्कि संघ प्रमुख मोहन भागवत के साथ डेढ़ घंटे लंबी चाय पर चर्चा भी कर डाली। सोने पर सुहागा यह कि उन्होंने संघ के शताब्दी वर्ष के लिए एक शानदार वीडियो बनाकर शेयर कर दिया। जो लड़का कल तक अतरंगी कपड़े पहनकर घूमता था, वह अचानक पश्चिमी चकाचौंध की चादर छोड़कर देश के प्राचीन मंदिरों में माथा टेकने लगा और माथे पर त्रिपुंड लगाकर संतों का आशीर्वाद लेने लगा।
अब आप ही बताइए, जो बॉलीवुड दशकों से एक खास वामपंथी और छद्म-धर्मनिरपेक्ष नैरेटिव के ऑक्सीजन पर जी रहा हो, वह एक चोटी के सुपरस्टार को 'सनातनी' रंग में रंगते कैसे देख सकता है? प्रसिद्ध लेखिका शोभा डे ने अपने कॉलम में अर्जुन रामपाल के हवाले से लिखा था कि 'भारत माता की जय' कहना बॉलीवुड के लिए खतरनाक होता जा रहा है। उन्होंने रोना रोया था कि कैसे एक खास विचारधारा के प्रभाव में नैरेटिव बदला जा रहा है। असल में, खतरा भारत माता की जय से नहीं, बल्कि बॉलीवुड ल्यारी के उस बिखरते हुए इकोसिस्टम को है, जिसका एकाधिकार अब टूट रहा है। जो कोई भी इनके 'सिस्टम' को लात मार रहा है या उसे तोड़ रहा है, उसे सबक सिखाना इस गैंग की मजबूरी बन गया है। अगर रणवीर नागपुर न गए होते और 'धुरंधर' में ल्यारी के चहेते 'अब्बू दाऊद' की हेकड़ी न निकाली होती, तो आज वे सबसे संस्कारी और प्रोफेशनल एक्टर कहलाते।
फरहान अख्तर, जो सीएए (CAA) कानून के विरोध में सड़कों पर उतरकर ज्ञान बांट रहे थे, वे अपने ही सेट पर एक 'सनातनी हमज़ा' (आस्तीन का सांप) को कैसे पनपने देते? बॉलीवुड के इस बदलते मौसम से चिढ़े हुए लोग ही आज रणवीर को अनप्रोफेशनल घोषित करने का प्रहसन कर रहे हैं। आखिरकार, ये उसी खानदान की विरासत ढो रहे हैं जिनके अब्बू (जावेद अख्तर) ने हिंदी सिनेमा के इतिहास में सनातनी विचारधारा को हमेशा मंदिर की सीढ़ियों पर लाचार बैठाए रखा और कभी प्रसाद तक नसीब नहीं होने दिया। उनके लिखे किरदारों में 'विजय' हमेशा नास्तिक बनकर भगवान से लड़ने गर्भगृह में घुस जाता था, लेकिन अपनी जेब में '786' का बिल्ला सीने से चिपकाए रखता था। जिस सिनेमाई तंत्र ने हमेशा सनातनी प्रतीकों का मजाक उड़ाया, वहां आज का सुपरस्टार मंदिर जाकर त्रिपुंड लगाएगा, और ये आका चुपचाप देखते रहेंगे?
लेकिन जनता अब जाग चुकी है। जब बहुसंख्यकों ने इनकी फिल्मों का असली वाला बहिष्कार किया था, तो पूरा ल्यारी कांप उठा था। इसलिए रणवीर पर लगाया गया यह कथित बैन कुछ और नहीं, बल्कि 'घंटे का बॉयकॉट' है। यह नया भारत है, और यहाँ का नैरेटिव अब ल्यारी के अब्बू तय नहीं करेंगे। जय श्रीराम।