27/12/2025
प्राचीन भारत में निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र एकलव्य अत्यंत प्रतिभाशाली और परिश्रमी बालक था। उसका एक ही सपना था— धनुर्विद्या में निपुण होकर महान योद्धा बनना।
एकलव्य ने गुरुकुल में जाकर गुरु द्रोणाचार्य से शिक्षा माँगी, लेकिन वह राजकुमार नहीं था, इसलिए द्रोणाचार्य ने उसे शिष्य बनाने से मना कर दिया। यह सुनकर एकलव्य निराश तो हुआ, पर हारा नहीं।
उसने वन में जाकर मिट्टी की गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनाई और उन्हें ही अपना गुरु मान लिया। प्रतिदिन पूरी श्रद्धा और अनुशासन से अभ्यास करने लगा। बिना किसी औपचारिक शिक्षा के भी उसकी साधना रंग लाई और वह एक अद्भुत धनुर्धर बन गया।
एक दिन पांडव और कौरव शिकार के लिए वन में पहुँचे। वहाँ अर्जुन ने देखा कि एकलव्य इतनी कुशलता से बाण चला रहा है कि कुत्ते के मुँह के चारों ओर तीर लगाकर भी उसे चोट नहीं पहुँची। यह देख अर्जुन चकित रह गया।
जब द्रोणाचार्य को पता चला कि एकलव्य उनसे ही प्रेरणा लेकर उनसे भी श्रेष्ठ धनुर्धर बन गया है, तो उन्होंने एकलव्य से गुरुदक्षिणा माँगी।
एकलव्य ने बिना कोई प्रश्न किए अपना दाहिना अंगूठा काटकर गुरु को अर्पित कर दिया।
अंगूठा कट जाने के बाद भी एकलव्य का साहस नहीं टूटा। वह त्याग, निष्ठा और समर्पण का अमर प्रतीक बन गया।