14/02/2026
हैप्पी वाला वेलेंटाइन अपुन के इश्टाइल में
रेट्रो इश्क़
हाँ तो भई...50 की दहलीज पार चुकी सभी परिजमाल से परियों की मम्मी या नानी बन चुकी खवातीनों और सर की उड़ चुकी ज़ुल्फ़ों के बीच टापू का नक्शा चस्पाये सारे हैंडसम हंक से एक सवाल...
क्या तुमने कभी किसी से प्यार किया ?
"कियाआआ"।
आएँ सब्बै ने किया,हियां तो चहुँ दिशाएँ गुंजायमान हुई गईं।
मतबल हमने सबही की कमजोर नबज पे हाँथ धर दिया।
बताओ बताओ कौन था/थी वो।
एक दम से दिमाग की घोड़ागाड़ी रिवर्स गियर में सर्रर्रर्रर्ररर्रर्रर्रर्रर से चली गई होगी औरर्रर्रर्रर्रर...
कहीं बुआ की देवरानी की लड़की तो कहीं मौसी के जेठ का लड़का दुनियादारी के झमेलों में दही बन जम चुके दिमाग की परात में छप्पाक से गिरा होगा और उसकी छीटों की मिठास से डियाबेटीज़ के कारण मिलने वाली फीकी चाय भी मीठी लगने लगी होगी। उंगलियां तुरंत फेसबुक के सर्च ऑप्शन में नाम याद कर टाइप करने लगी होंगी।
तो जनाब वो दौर ही अलग था।तब टीन वीन टाइप की कौनों उमर नहीं होती थी,तब तो हमारी नानी के अनुसार लड़का लड़की बौराते थे, माता पिता अपनी पुत्री के जीवन में ऐसा पेस्ट कंट्रोल करते थे कि न तो वो किसी फेस्ट में जाने लायक रहती थीं और कोई उनको फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज पाता था।
घर से भागने की जुर्रत वही कर पाते थे जिन्होंने ऋषि कपूर और डिंपल कपाड़िया की बॉबी से मिले अथाह ज्ञान को आत्मसात कर लिया था,बाकी लव बर्ड्स तो अपने दिल के अरमां आँसुओं में बहा देते थे पिताजी की एक घुड़की में।
तब लड़के टिटहरी टाइप ( जिम शिम के अभाव में) और लड़कियां नाज़ुकबदन, कचनार की कली टाइप होती थीं। आजकल की रफ़ल साड़ियां पहने,फेस पॉलिशिंग करवाये और आँखों में नकली पलकें लगाए जलवे दिखाती फ़ुर्रररर फुर्ररर करती तितलियों जैसी नहीं होती थीं।
तब तो मौसी की लड़की की शादी में एक अदद साड़ी की डिमांड पे मम्मी रैटल स्नेक की तरह ऐसे फुंफकारती कि झट वो सुई धागा ले मम्मी के ब्लाउज में उल्टी बखिया कर अपनी नाप का करने जुट जाती थीं।ज़्यादा से ज़्यादा एक टेढ़ी चुटिया, बालों में गजरा और हाँथों में 9 9 चूड़ियां पहन अपने आपको चाँदनी या भाग्यश्री समझने लगती थी।बसस्स यही इनका मेकअप होता था और लड़के उस जमाने के सलमान खान (विदाउट सिक्स पैक एब्स) और अनिल कपूर बन टेढ़े हो चलने लगते थे,थोड़ा और पुराने दौर की बात करें तो जितेंदर की तरह सफेद पैंट और जूते पहन लेते थे और लड़कियां शर्मिला टैगोर आदि की तरह सर पर कद्दू टाइप का जूड़ा बना लेती थीं, वो भी सिर्फ हाई क्लास की, वरना साधारण परिवार की लड़कियां तो आँखों में काजल की लंबी लंबी नोकें निकाल लगा कर ही तसल्ली कर लेती थीं।
ये वो दौर था जब लव बर्ड्स अक्सर मंदिर जाने के बहाने ही मिलते थे पर कभी कभी इनकी लव स्टोरी का दुखांत भी वहीं होता था, जब उसी मंदिर में लड़की की दिखाई के बाद लड़के को संभलने का मौका दिये बगैर चट मांगनी पट ब्याह हो जाता था और जब तक लड़का ग़म- ए-इश्क़ से कुछ उबर पाता लड़की की गोद में भगवान का प्रसाद (लल्ला/लल्ली) कजरौटा लगाये किलकारी मार रहा होता था।
इन पर कहर ढाने का काम करती थी हमसे भी दो पीढ़ी पहले की नानी-दादी। मतलब हद तो ये थी कि हमारी नानी जब तब अपना तकिया कलाम,(" बाबू जी यानि हमारे नानाजी मरते मर गए पर हमने उनकी शकल तक नहीं देखी।")दोहराती रहती थीं। अब भला बताओ... आखिर हमसे एक दिन रहा नहीं गया और पूछ ही बैठे तो फिर नानी ये आठ आठ बच्चे कहाँ से आये, बस उसके बाद हमारी वो लानत मलानत भेजी गई के बस कुछ पूछो मत।
उन दिनों प्रेम दिवस नाम के किसी भी राष्ट्रीय त्योहार का कोई वजूद नहीं होता था।भालू दिवस भला कैसे मनता क्योंकि पिताजी की एक घुड़की से ही लड़का खुदही भालू और लड़कियाँ बकरी बन जाती थीं।आलिंगन और चुम्बन दिवस का तो कोई सवालै नहीं था काहे कि,तब तो हीरोइने भी शर्मीली होती थीं।वहाँ भी गुलशन के फूलों को टकरा कर काम चला लिया जाता था।
ग्रीटिंग कार्ड एक अहम रोल प्ले करता था उन दिनों,काहे से के तब व्हाट्सएप, मैसेंजर और फेसबुक जो नहीं थे।कहीं घर के गेट के नीचे से कार्ड खिसकाए जाते थे, कहीं सहेली को डाकिया बनाया जाता था।ऊपर से जेब भी तंग रहती थी बेचारे लड़कों की,देसी गुलाब से काम चलाना पड़ता था,आर्किड और कारनेशन जैसे फूलों की प्रजाति का तो पता ही न था।
तो ख़ैर बात करते हैं हमारे एक भैया की, जो काफी गुणी थे अर्थात एक साथ कई लड़कियों से फ्लर्ट कर लेने की क्षमता थी उनमें। बेचारी हमारी गाय जैसी मौसी को पता ही नहीं था कि उनका लड़का बैल बन चुका है।
हम और वह एक ही कोचिंग में पढ़ा करते थे, जहां उनका दिल एक लड़की पर आ गया। अब ज़बरदस्ती हमें उस लड़की को सहेली बनाने के साथ साथ उन दोनों के बीच केमिकल इक्वेशन बनाने के लिए कैटेलिस्ट तक बनना पड़ा।
हमने भी भैया में वो वो क़वालिटीज़ भर दीं जिनका उनमें सर्वथा अभाव था । खैर काफी मशक्कत के बाद आखिर भइया ने उसे डेट पर ले जाने का प्लान बना ही लिया और लेकर पहुंच गए एक रेस्टोरेंट में और कह दी दिल की बात , लेकिन कम्बख़त उनकी तो भद्द ही पिट गयी जब लड़की ने कहा कि वो तो उनको भैया मानती है क्योंकि वो उनकी सहेली यानी हमारे भैया हैं।
बेचारे भैया...एक अदद बोसे की आरज़ू लेकर मधुर मिलन (रेस्टॉरेंट ) में गए हमारे भैया को डोसे का बिल भर खाली हाँथ और भारी मन के साथ लौटना पड़ा।हम आज भी उनकी खूब खिंचाई करते हैं।
उस ज़माने में कनकइया (पतंग) के साथ भी खूब प्रेम के पेंच लड़ते थे।जमघट के दिन तो स्पेशली पतंग कट कर महबूबा कि छत पर ही गिरती थी, वो भी हिडेन मेसेज के साथ और ज़ुल्फ़ें भी नाज़नीनें ड्रायर से नहीं बाक़ायदा छत पर तौलिए से झटक झटक के सुखाती थीं।
आलम यह था कि अपनी ही शादी में लड़का लड़की का काम बस दूल्हा दुल्हन का रोल प्ले करने भर का होता था,बाकी शादी किससे होनी है,पसंद नापंसद जैसे कोई ऑप्शन नहीं होते थे,यहां तक कि बाबा और नाना की ज़ुबान ही काफ़ी होती थी।सब कुछ ओफ्फिशयल होने के बाद ही बताया जाता था। बड़े लाड़ से माँ कहती थी "ए बिटिया तुम्हरे नाना जी कश्मीरी मोहल्ले के लाला केदार चंद के नाती के संग तुम्हरा ब्याह तय कर दिए नहीं, बहुतै बढियां रिस्ता है,कौनों पिराब्लम तो नहीं। " और जब तक लड़की कुछ कहने के लिए मूँह खोलती तब तक भावी सास चार ठो औरतीं के साथ आकर उसकी गोद में शगुन का नारियल लुढ़का चुकी होती थीं।अब ऐसे में दिलों का टूटना तो लाज़मी था।
न जाने कितनी ही प्रेम कहानियाँ अँखियों के झरोखों से शुरू होकर अँखियों के कोरों से ढुलक कर बह जाती थी।
ये रेट्रो इश्क़ था जनाब जब दिल पर लिखे किसी के नाम की महक ताज़िन्दी रूह में जज़्ब हो जाती थी।
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अलका निगम
लफ़्जों की पोटली✍️✍️✍️
लखनऊ
चित्र: साभार गूगल