Lafzon ki Potli

Lafzon ki Potli मन से मन तक शब्दों का तारतम्य,
ज्यों प्रेम हो धरा पर अनादि, अगम्य।

23/03/2026

मेरे कानों में चुपके से बोली मीठी सी अमराई
अब नाच झूम के बावरी तेरे घर है बेटी आई।।

Yayyy it's a baby girl🥰🥰🥰🥰🥰😃😃😃😃
अलका निगम

23/03/2026
   #हिंदीसाहित्य  #हिन्दीकविता झूठ पे न साँच पे,काल की धारदार काँच पे,उम्मीद की मद्धम आँच पे,मैंने तुम संग अपने नेह को,ह...
17/03/2026

#हिंदीसाहित्य #हिन्दीकविता
झूठ पे न साँच पे,
काल की धारदार काँच पे,
उम्मीद की मद्धम आँच पे,
मैंने तुम संग अपने नेह को,
हौले हौले पकाया है।

न अति मीठी न अधिक कटु,
प्रीत लिपि में वाक् पटु,
अस्थि विहीन चंचल नटी,
अपने उर की जिह्वा को,
तेरे नाम का मधु चटाया है।

निज बसंत की प्रतीक्षा में,
अंतर्दृष्टि अरु प्रेक्षा में,
अंतर्मन की कक्षा में,
भावों के चंचल शिशुओं को,
मैनें तेरा नाम रटाया है।

नश्वर जीवन के मेले को,
माटी से जन्मे में ढेले को,
दर्पण से जनित मेरे दर्प को,
तेरी अनुपम छवि ने घात लगा,
चूर चूर कर डाला है।

अपने भ्रम का तिमिर हटा,
तोल मोल की गणित घटा,
हिय में बिखेर के प्रीत छटा,
तेरी प्रीत की चाँद के उद्भव को,
मैंने उर अंबर को बिछाया है।

ये मन तुझपे ही आया है
बस तू ही मुझको भाया है।

राधे राधे........

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 #महिलादिवस  बहुत कुछ लिखना था इस महिला दिवस पर लेकिन इस तस्वीर को देख बस इतना ही लिख पाई😭😡स्त्री कभी अछूत नहीं थी।न तब,...
08/03/2026

#महिलादिवस
बहुत कुछ लिखना था इस महिला दिवस पर लेकिन इस तस्वीर को देख बस इतना ही लिख पाई😭😡

स्त्री कभी अछूत नहीं थी।
न तब,न अब।
जो अछूत होती तो भोग्या कैसे होती|
न सम्पन्न, न विपन्न
न शिशु,न वृद्धा
न सधवा,न विधवा
न प्रेमिका,न परित्यक्ता
वो तो सिर्फ एक देह थी
सदा से...
वो पूज्यनीय से पहले भोग्या थी|
पति और पिता अछूत हो सकते हैं,
पुत्र और भाई भी अछूत हो सकते हैं
पर...
पत्नी,बेटी, माँ और बहन
वो अछूत नहीं हो सकतीं,
कभी नहीं |
वो तो बस एक देह है,नेह नहीं
और इसमें...
तनिक भी संदेह नहीं |
एक ऐसी देह
जिसकी आसक्ति को
मृत्यु का भी भय नहीं
कि लाशों का भी बलात्कार होता है।
एक ऐसी देह
जिसके प्रति आसक्ति
हार जीत की भावना से भी परे है।
वो यदि जीत की ट्रॉफी है,
तो हार के बाद के अवसाद की
पीप को थूकने का भी पीकदान है।
वो हर भावना से परे
सिर्फ़ देह है
सिर्फ़ देह है।
उसमें पीड़ा नहीं,
उसमें प्राण नहीं,
उसमें मन नहीं,
उसका मान नहीं
और सबसे बढ़कर
उसका कोई सम्मान नहीं।
वो सिर्फ देह है।
वो देह
जो कभी
सम्मान की भेंट चढ़ी
तो कभी
विभाजन की।
कभी दंगों की,
तो कभी युद्ध की
कभी क्रोध की
तो कभी प्रतिशोध की।
के उसकी देह
एक जीवित मानचित्र है
जिसके उभारों और कटावों को रौंद
पुरुष अपने छद्म पुरुषत्व और वर्चस्व
की विजय पताका फहराता है।

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  हैप्पी वाला वेलेंटाइन अपुन के इश्टाइल मेंरेट्रो इश्क़हाँ तो भई...50 की दहलीज पार चुकी सभी परिजमाल से परियों की मम्मी या...
14/02/2026



हैप्पी वाला वेलेंटाइन अपुन के इश्टाइल में

रेट्रो इश्क़

हाँ तो भई...50 की दहलीज पार चुकी सभी परिजमाल से परियों की मम्मी या नानी बन चुकी खवातीनों और सर की उड़ चुकी ज़ुल्फ़ों के बीच टापू का नक्शा चस्पाये सारे हैंडसम हंक से एक सवाल...
क्या तुमने कभी किसी से प्यार किया ?
"कियाआआ"।
आएँ सब्बै ने किया,हियां तो चहुँ दिशाएँ गुंजायमान हुई गईं।
मतबल हमने सबही की कमजोर नबज पे हाँथ धर दिया।
बताओ बताओ कौन था/थी वो।
एक दम से दिमाग की घोड़ागाड़ी रिवर्स गियर में सर्रर्रर्रर्ररर्रर्रर्रर्रर से चली गई होगी औरर्रर्रर्रर्रर...
कहीं बुआ की देवरानी की लड़की तो कहीं मौसी के जेठ का लड़का दुनियादारी के झमेलों में दही बन जम चुके दिमाग की परात में छप्पाक से गिरा होगा और उसकी छीटों की मिठास से डियाबेटीज़ के कारण मिलने वाली फीकी चाय भी मीठी लगने लगी होगी। उंगलियां तुरंत फेसबुक के सर्च ऑप्शन में नाम याद कर टाइप करने लगी होंगी।
तो जनाब वो दौर ही अलग था।तब टीन वीन टाइप की कौनों उमर नहीं होती थी,तब तो हमारी नानी के अनुसार लड़का लड़की बौराते थे, माता पिता अपनी पुत्री के जीवन में ऐसा पेस्ट कंट्रोल करते थे कि न तो वो किसी फेस्ट में जाने लायक रहती थीं और कोई उनको फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज पाता था।
घर से भागने की जुर्रत वही कर पाते थे जिन्होंने ऋषि कपूर और डिंपल कपाड़िया की बॉबी से मिले अथाह ज्ञान को आत्मसात कर लिया था,बाकी लव बर्ड्स तो अपने दिल के अरमां आँसुओं में बहा देते थे पिताजी की एक घुड़की में।
तब लड़के टिटहरी टाइप ( जिम शिम के अभाव में) और लड़कियां नाज़ुकबदन, कचनार की कली टाइप होती थीं। आजकल की रफ़ल साड़ियां पहने,फेस पॉलिशिंग करवाये और आँखों में नकली पलकें लगाए जलवे दिखाती फ़ुर्रररर फुर्ररर करती तितलियों जैसी नहीं होती थीं।
तब तो मौसी की लड़की की शादी में एक अदद साड़ी की डिमांड पे मम्मी रैटल स्नेक की तरह ऐसे फुंफकारती कि झट वो सुई धागा ले मम्मी के ब्लाउज में उल्टी बखिया कर अपनी नाप का करने जुट जाती थीं।ज़्यादा से ज़्यादा एक टेढ़ी चुटिया, बालों में गजरा और हाँथों में 9 9 चूड़ियां पहन अपने आपको चाँदनी या भाग्यश्री समझने लगती थी।बसस्स यही इनका मेकअप होता था और लड़के उस जमाने के सलमान खान (विदाउट सिक्स पैक एब्स) और अनिल कपूर बन टेढ़े हो चलने लगते थे,थोड़ा और पुराने दौर की बात करें तो जितेंदर की तरह सफेद पैंट और जूते पहन लेते थे और लड़कियां शर्मिला टैगोर आदि की तरह सर पर कद्दू टाइप का जूड़ा बना लेती थीं, वो भी सिर्फ हाई क्लास की, वरना साधारण परिवार की लड़कियां तो आँखों में काजल की लंबी लंबी नोकें निकाल लगा कर ही तसल्ली कर लेती थीं।
ये वो दौर था जब लव बर्ड्स अक्सर मंदिर जाने के बहाने ही मिलते थे पर कभी कभी इनकी लव स्टोरी का दुखांत भी वहीं होता था, जब उसी मंदिर में लड़की की दिखाई के बाद लड़के को संभलने का मौका दिये बगैर चट मांगनी पट ब्याह हो जाता था और जब तक लड़का ग़म- ए-इश्क़ से कुछ उबर पाता लड़की की गोद में भगवान का प्रसाद (लल्ला/लल्ली) कजरौटा लगाये किलकारी मार रहा होता था।
इन पर कहर ढाने का काम करती थी हमसे भी दो पीढ़ी पहले की नानी-दादी। मतलब हद तो ये थी कि हमारी नानी जब तब अपना तकिया कलाम,(" बाबू जी यानि हमारे नानाजी मरते मर गए पर हमने उनकी शकल तक नहीं देखी।")दोहराती रहती थीं। अब भला बताओ... आखिर हमसे एक दिन रहा नहीं गया और पूछ ही बैठे तो फिर नानी ये आठ आठ बच्चे कहाँ से आये, बस उसके बाद हमारी वो लानत मलानत भेजी गई के बस कुछ पूछो मत।
उन दिनों प्रेम दिवस नाम के किसी भी राष्ट्रीय त्योहार का कोई वजूद नहीं होता था।भालू दिवस भला कैसे मनता क्योंकि पिताजी की एक घुड़की से ही लड़का खुदही भालू और लड़कियाँ बकरी बन जाती थीं।आलिंगन और चुम्बन दिवस का तो कोई सवालै नहीं था काहे कि,तब तो हीरोइने भी शर्मीली होती थीं।वहाँ भी गुलशन के फूलों को टकरा कर काम चला लिया जाता था।
ग्रीटिंग कार्ड एक अहम रोल प्ले करता था उन दिनों,काहे से के तब व्हाट्सएप, मैसेंजर और फेसबुक जो नहीं थे।कहीं घर के गेट के नीचे से कार्ड खिसकाए जाते थे, कहीं सहेली को डाकिया बनाया जाता था।ऊपर से जेब भी तंग रहती थी बेचारे लड़कों की,देसी गुलाब से काम चलाना पड़ता था,आर्किड और कारनेशन जैसे फूलों की प्रजाति का तो पता ही न था।
तो ख़ैर बात करते हैं हमारे एक भैया की, जो काफी गुणी थे अर्थात एक साथ कई लड़कियों से फ्लर्ट कर लेने की क्षमता थी उनमें। बेचारी हमारी गाय जैसी मौसी को पता ही नहीं था कि उनका लड़का बैल बन चुका है।
हम और वह एक ही कोचिंग में पढ़ा करते थे, जहां उनका दिल एक लड़की पर आ गया। अब ज़बरदस्ती हमें उस लड़की को सहेली बनाने के साथ साथ उन दोनों के बीच केमिकल इक्वेशन बनाने के लिए कैटेलिस्ट तक बनना पड़ा।
हमने भी भैया में वो वो क़वालिटीज़ भर दीं जिनका उनमें सर्वथा अभाव था । खैर काफी मशक्कत के बाद आखिर भइया ने उसे डेट पर ले जाने का प्लान बना ही लिया और लेकर पहुंच गए एक रेस्टोरेंट में और कह दी दिल की बात , लेकिन कम्बख़त उनकी तो भद्द ही पिट गयी जब लड़की ने कहा कि वो तो उनको भैया मानती है क्योंकि वो उनकी सहेली यानी हमारे भैया हैं।
बेचारे भैया...एक अदद बोसे की आरज़ू लेकर मधुर मिलन (रेस्टॉरेंट ) में गए हमारे भैया को डोसे का बिल भर खाली हाँथ और भारी मन के साथ लौटना पड़ा।हम आज भी उनकी खूब खिंचाई करते हैं।
उस ज़माने में कनकइया (पतंग) के साथ भी खूब प्रेम के पेंच लड़ते थे।जमघट के दिन तो स्पेशली पतंग कट कर महबूबा कि छत पर ही गिरती थी, वो भी हिडेन मेसेज के साथ और ज़ुल्फ़ें भी नाज़नीनें ड्रायर से नहीं बाक़ायदा छत पर तौलिए से झटक झटक के सुखाती थीं।
आलम यह था कि अपनी ही शादी में लड़का लड़की का काम बस दूल्हा दुल्हन का रोल प्ले करने भर का होता था,बाकी शादी किससे होनी है,पसंद नापंसद जैसे कोई ऑप्शन नहीं होते थे,यहां तक कि बाबा और नाना की ज़ुबान ही काफ़ी होती थी।सब कुछ ओफ्फिशयल होने के बाद ही बताया जाता था। बड़े लाड़ से माँ कहती थी "ए बिटिया तुम्हरे नाना जी कश्मीरी मोहल्ले के लाला केदार चंद के नाती के संग तुम्हरा ब्याह तय कर दिए नहीं, बहुतै बढियां रिस्ता है,कौनों पिराब्लम तो नहीं। " और जब तक लड़की कुछ कहने के लिए मूँह खोलती तब तक भावी सास चार ठो औरतीं के साथ आकर उसकी गोद में शगुन का नारियल लुढ़का चुकी होती थीं।अब ऐसे में दिलों का टूटना तो लाज़मी था।
न जाने कितनी ही प्रेम कहानियाँ अँखियों के झरोखों से शुरू होकर अँखियों के कोरों से ढुलक कर बह जाती थी।
ये रेट्रो इश्क़ था जनाब जब दिल पर लिखे किसी के नाम की महक ताज़िन्दी रूह में जज़्ब हो जाती थी।

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चित्र: साभार गूगल

  ज़िंदगी...टुकड़ों टुकड़ों में चाक पे चढ़ती रही,हर रोज मुझमें इक नई "मैं" गढ़ती रही।मैं...कभी उसके खुरदुरे हाथों में आ ...
03/02/2026



ज़िंदगी...
टुकड़ों टुकड़ों में चाक पे चढ़ती रही,
हर रोज मुझमें इक नई "मैं" गढ़ती रही।

मैं...
कभी उसके खुरदुरे हाथों में आ कसमसाती,
और कभी नया आकार पा खिलखिलाती।

पर...
न वो मुझे गढ़ना छोड़ पाती,
और न ही मैं उससे मुँह मोड़ पाती।

तो...
ए ज़िंदगी गले लगा ले🎵🎶🎶

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Big shout out to my new rising fans! Rashmi Bhatnagar
02/02/2026

Big shout out to my new rising fans! Rashmi Bhatnagar

ऐ देह के मुसाफ़िर...क्या एक रात काफ़ी थी,इस देह को समझने के लिए?क्या रात्रि के चार पहर काफ़ी थे,इसके भूगोल को मापने के ल...
01/02/2026

ऐ देह के मुसाफ़िर...
क्या एक रात काफ़ी थी,
इस देह को समझने के लिए?
क्या रात्रि के चार पहर काफ़ी थे,
इसके भूगोल को मापने के लिए?
कुछ और ठहर जाते,
तो कदाचित मन की थाह भी पा जाते।
इस नश्वर काया के माया जाल से मुक्त हो,
अनादि अनंत आत्मा से
साक्षात्कार कर पाते।
पर नहीं...
तुम्हें तो बिना मुड़ कर देखे
निर्मोही हो प्रस्थान करना था।
भोग की लिप्सा को संतुष्ट कर
अपने योगी होने का प्रमाण
इस संसार को देना था।
काश...
कुछ और रुक जाते,
तो कदाचित पारिजात के शाख से टूट
धरती पर बिछ जाने का कारण जान पाते।
काश तुम रुक जाते,
तो एक और यशोधरा को
बनने से रोक पाते।

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 #मन  #मनमर्जियां मन बैरागी ढीली सारी गिरह हुईं बेमतलब सारी जिरह हुईं अब तोला माशा रत्ती केअंतर की भी फ़िक्र नहींहुआ मन ...
30/01/2026

#मन #मनमर्जियां
मन बैरागी

ढीली सारी गिरह हुईं
बेमतलब सारी जिरह हुईं
अब तोला माशा रत्ती के
अंतर की भी फ़िक्र नहीं
हुआ मन बैरागी
हुआ मन बैरागी

बिना नाप के रिश्ते पहने
अब सुकून से लगी मैं रहने
बीती बातें मन की मुट्ठी से
लगी बहाने
हुआ मन बैरागी
हुआ मन बैरागी

मन के दालान में सालों से
जो सजे हुए थे नागफणी
उन्हें उखाड़ मन की माटी
मैं लगी सहलाने
हुआ मन बैरागी
हुआ मन बैरागी

हर मौसम थाली में परोसे
इसे उबाले उसको छौंके
अब लगी कसैले जिमिकंद का
मधुपर्क बनाने
हुआ मन बैरागी
हुआ मन बैरागी

चंदा सूरज की पाली में
जीवन की इस थाली में
थक गई लुढ़कते
तो...
अब परे हटा इस झंझट को
मनमर्ज़ी की मैं ओढ़ रजाई
लगी अलसाने
हुआ मन बैरागी
हुआ मन बैरागी

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 #राधे_श्याम  #राधे_राधेchallenge बृज की रज में रची बसीएक ऐसी प्रेम कहानी,युग बीते सदियां बीतींनहीं कोई भी उसका सानी।एक ...
29/01/2026

#राधे_श्याम #राधे_राधेchallenge

बृज की रज में रची बसी
एक ऐसी प्रेम कहानी,
युग बीते सदियां बीतीं
नहीं कोई भी उसका सानी।

एक किशोरी बरसाने की
एक नंद का लाला,
एक शुभ्र लड़ी मोतियन की
एक वैजयंतीमाला।

बरजोरी के नेपथ्य में थी
बंधी प्रीत की डोरी,
दोनों ने ही एक दूजे के
रंग से खेली होरी।

देह के मंदिर में दोनों ने
एक दूजे को साधा,
हरी जा बसे श्री के उर में
हरि मन में बस गई राधा।

अविरल यमुना की लहरों में
प्रतिपल प्रीत थी बहती,
तज कल कल की धुन लहरें भी
राधे राधे ही कहतीं।

राधा के सम्मोहन में
मोहन का भी एक भाग था
और मोहन की वंशी में
राधा का कृष्णानुराग था।

रीत प्रीत की समझाने को
दोनों ने रचाया रास था
जहाँ क्षुद्र वासनाओं से परे
आत्मोत्सर्ग का वास था।

भाव था शुद्ध समर्पण का
नहीं तृष्णाओं के घर्षण का,
कर प्रिय की प्रीत में अभ्यर्पण
वो यज्ञ था स्व के तर्पण का।

नर नारी के स्वस्थ शाश्वत
रिश्ते की नई परिभाषा गढ़ी,
देह से ऊपर उठकर जग ने
उर लिखित प्रीत की भाषा पढ़ी।

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चित्र साभार: google

  वो संकोच में लिख न सकीवो कहते कहते चूक गया,कुछ यूँ एक प्रेम कथा का पुष्पखिलने से पहले सूख गया।वो टहनी ओस में भीगी सी व...
23/01/2026



वो संकोच में लिख न सकी
वो कहते कहते चूक गया,
कुछ यूँ एक प्रेम कथा का पुष्प
खिलने से पहले सूख गया।

वो टहनी ओस में भीगी सी
वो धूप खिली संक्रांति की,
उसके ताप से हुई वो ओजस
ओढ़ चुनर पीतांबर की।

अंधियारी पूस की रातों में
वो जब कोहरे से डरती थे,
उससे लगाव का इक अलाव
उसके अन्तस में जलता था।

जो दूरी पाँवों से नप न सकी
उसे मन विहग तय करता था,
निर्द्वन्द वो दोनों के मन के
प्रेमांगन में उतरता था।

एक दूजे की पेशानी की
सिलवटें मिटाया करते थे,
वो मूक अधर,पर मुखर नयन से
पहरों बातें करते थे।

वे भावों के स्वर्णाक्षर से
प्रेम ग्रंथ लिख जाते थे,
राधे कृष्णा लिखते लिखते
अपनी कथा लिख जाते थे।

राधे कृष्णा लिखते लिखते
अपनी कथा लिख जाते थे।

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