01/11/2025
“Agreement to Sell” से मालिकाना हक नहीं मिलता: हिमाचल हाईकोर्ट में मकान मालिक की बड़ी जीत, किरायेदारों का स्वामित्व दावा खारिज
समाचार रिपोर्ट ET के माध्यम से:
शिमला, 22 सितंबर 2025 — हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया कि सिर्फ “Agreement to Sell” (विक्रय अनुबंध) पर हस्ताक्षर कर देने से कोई व्यक्ति संपत्ति का मालिक नहीं बन जाता। इस ऐतिहासिक निर्णय में मकान मालिक श्री गुप्ता ने अपने किरायेदारों के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई जीत ली, जिन्होंने दावा किया था कि उन्होंने संपत्ति पर “Agreement to Sell” के जरिए मालिकाना हक हासिल कर लिया है।
यह मामला वर्षों पुराना है। श्री गुप्ता ने अपने किरायेदारों से किराया बकाया होने के कारण किराया नियंत्रक (Rent Controller) के समक्ष याचिका दायर की थी। उन्होंने मांग की थी कि किरायेदारों से बकाया किराया वसूला जाए और उन्हें संपत्ति से बेदखल किया जाए। हालांकि, किरायेदार न तो अदालत में पेश हुए और न ही उन्होंने मामला लड़ा। बाद में किरायेदार के निधन के पश्चात उनके कानूनी वारिसों ने यह दावा किया कि श्री गुप्ता ने उनके परिवार के साथ “Agreement to Sell” कर संपत्ति बेचने का वादा किया था।
किरायेदारों का तर्क था कि 21 जनवरी 2004 को हुए इस समझौते के तहत मकान मालिक ने “बेकरी बिल्डिंग” का आधा हिस्सा बेचने पर सहमति जताई थी, जिसमें विवादित चार कमरे भी शामिल थे। उन्होंने यह भी कहा कि ₹3.5 लाख के सौदे में ₹70,000 पहले ही दिए जा चुके थे, जबकि बाकी रकम रजिस्ट्री के समय देनी थी। लेकिन सरकारी अनुमति न मिलने के कारण रजिस्ट्री नहीं हो सकी।
मकान मालिक की ओर से अदालत में यह दलील दी गई कि “Agreement to Sell” का मतलब संपत्ति की बिक्री नहीं होता, जब तक कि उस पर विधिवत रजिस्ट्री न हो जाए। यह केवल भविष्य में बिक्री का वादा होता है, मालिकाना हक नहीं देता।
अदालत ने इस पर सहमति जताते हुए कहा कि किरायेदार का दावा कानूनन अस्वीकार्य है। हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 54 के अनुसार, संपत्ति का स्वामित्व केवल “Registered Sale Deed” यानी पंजीकृत विक्रय विलेख के माध्यम से ही स्थानांतरित किया जा सकता है।
PSL Advocates & Solicitors के पार्टनर, सोएब कुरैशी ने कहा, “हाईकोर्ट ने बिल्कुल स्पष्ट किया है कि ‘Agreement to Sell’ सिर्फ एक वादा है, उससे स्वामित्व नहीं बदलता। जब तक रजिस्ट्री नहीं होती, खरीदार को मालिकाना हक नहीं मिलता।” उन्होंने कहा कि “इस मामले में किरायेदार ने कभी भी रजिस्ट्री कराई नहीं और किराया भी नियमित रूप से चुकाया जाता रहा, जो यह साबित करता है कि किरायेदारी संबंध अभी भी कायम था।”
कुरैशी ने आगे बताया, “मकान मालिक की जीत इसलिए हुई क्योंकि कोर्ट ने पाया कि कथित ‘Agreement to Sell’ में न तो पूरी संपत्ति शामिल थी और न ही उसका क्रियान्वयन हुआ था। न तो किसी ने इसके लिए विशेष वाद (specific performance suit) दायर किया, न ही संपत्ति का स्वामित्व बदला। इसलिए, मकान मालिक का बेदखली का अधिकार पूरी तरह वैध था।”
महिला मकान मालिक के अधिकार पर कोर्ट की टिप्पणी
इस फैसले ने महिलाओं के संपत्ति अधिकारों पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। एडवोकेट स्मृति जसवाल (Accord Juris LLP) ने कहा, “यह निर्णय उस पुरानी सोच को चुनौती देता है कि गृहिणी को अपने ही घर पर सीमित अधिकार हैं। कोर्ट ने साफ कहा है कि कोई महिला मकान मालिक अपने घर की जरूरत या अपने परिवार की भलाई के लिए संपत्ति वापस लेना चाहती है तो यह उसका वैधानिक और नैतिक अधिकार है। उसे किसी की अनुमति या ‘जस्टिफिकेशन’ की आवश्यकता नहीं है।”
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद 2001 से शुरू हुआ जब किरायेदार सुमित्रा देवी ने कई सालों तक किराया नहीं चुकाया। मकान मालिक ने अगस्त 2015 में Rent Petition दायर की, जिसमें 1 मार्च 2001 से लेकर याचिका दाखिल करने तक का बकाया किराया ₹4,35,860 बताया गया। कोर्ट ने 1 अक्टूबर 2016 को आदेश दिया कि यह रकम 30 दिनों के भीतर जमा की जाए, वरना बेदखली का सामना करना पड़ेगा।
किरायेदार ने आदेश का पालन नहीं किया, और 2017 में मकान मालिक ने निष्पादन याचिका (Ex*****on Petition) दायर की। लेकिन प्रक्रिया के दौरान सुमित्रा देवी की मृत्यु हो गई और मामला उनके उत्तराधिकारियों तक पहुंच गया। उन्होंने दावा किया कि “Agreement to Sell” के कारण अब वे संपत्ति के मालिक हैं।
हाईकोर्ट की कठोर टिप्पणी
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि “Agreement to Sell” से किसी प्रकार का स्वामित्व नहीं बनता। यह सिर्फ एक ‘वादा’ होता है, न कि संपत्ति का ट्रांसफर। अदालत ने कहा कि “यदि यह वास्तविक बिक्री होती, तो किरायेदारी का संबंध समाप्त हो जाता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। समझौते में खुद लिखा है कि यह या तो बिक्री या पट्टे (lease) के लिए था, इसलिए यह दोनों पक्षों के बीच किरायेदारी खत्म करने का सबूत नहीं बनता।”
कोर्ट ने रेंट कंट्रोलर के 7 जनवरी 2021 के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि उसने तथ्य और कानून दोनों में गलती की थी। अदालत ने मकान मालिक की पुनरीक्षण याचिका स्वीकार कर ली और मामले को फिर से रेंट कंट्रोलर शिमला के पास भेज दिया, ताकि बेदखली संबंधी कार्रवाई शीघ्र पूरी हो सके।
अंतिम आदेश और प्रभाव
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि दोनों पक्ष 13 अक्टूबर 2025 को रेंट कंट्रोलर के समक्ष पेश हों और निष्पादन याचिका को 31 दिसंबर 2025 तक निपटा दिया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि यदि किरायेदार की उत्तराधिकारी कमलेश किसी सिविल केस का हवाला देती हैं, तो उसकी सुनवाई भी कानून के अनुसार की जाएगी, लेकिन बेदखली की प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से लंबित नहीं किया जाएगा।
इस निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि “Agreement to Sell” सिर्फ भविष्य में बिक्री का इरादा होता है — इससे किसी को भी स्वामित्व नहीं मिलता। मकान मालिक श्री गुप्ता के पक्ष में आया यह फैसला न केवल उनके लिए, बल्कि उन तमाम लोगों के लिए एक मिसाल है जो किरायेदारों के गलत स्वामित्व दावों से जूझ रहे हैं।
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