15/02/2026
काशी के प्रमुख चतुर्दश महालिङ्ग
(शिवरात्रि विशेष)
तीर्थानि सर्वाणि पुर्यश्च सर्वा-स्तथा शिवस्यायतनानि षष्टिः ।
नद्यो नदाः ससरः सागराश्च देवा समस्ताः मुनयश्च सर्वे वसन्ति काश्यां सततं स्वशुद्धये विश्वेश्वरस्याद्भुतमुक्तिजन्मनः ।।
ब्रह्मवैवर्तपुराण के उपर्युक्त वचन के अनुसार सभी तीर्थ, सभी पुरियों, शिव के साठ स्थान, नदी, नद, सरोवर एवं सागर निरन्तर अद्भुत मुक्तिदाता विश्वेश्वर की काशी नगरी में अपनी शुद्धि हेतु वास करते हैं। काशी में लिङ्गधारी सदाशिव लोकरक्षा के लिये पञ्चक्रोशात्मक होकर सदैव विराजते हैं। पुराणों में काशी को ब्रह्मरूप में निरूपित किया गया है। यह काशीक्षेत्र, एक के भीतर एक इस प्रकार से चार प्रकार का है। काशी में वाराणसी, वाराणसी में अविमुक्त और अविमुक्त में अनुगृह है। परमज्योति रूप ब्रह्म इससे प्रकाशित होता है अतः यह काशी है। अस्सी, वरुणा के बीच में है अतः वाराणसी है। प्रलय काल में भी शिव इसे नहीं छोड़ते इसलिये अविमुक्त है और विश्वेश्वर का निरन्तर विहार-स्थान है अतः अनुगृह है। इसमें ईश्वर के आनन्द के अङ्कुर लिङ्ग रूप से उदित होते रहते हैं, इसलिये इसे आनन्द-वन भी कहा गया है।
प्रसिद्ध द्वादश ज्योतिर्लिङ्गों में विश्वेश्वर को प्रमुख माना गया है। नारदीय पुराण के अनुसार -
काशीविश्वेश्वरं लिङ्ग पूजितं नमितं स्तुतम् । न तस्य विद्यते कृत्यं संसृतिर्नैव जायते ।।
अर्थात् काशी विश्वेश्वर का जिसने पूजन, अर्चन और स्तुति कर ली उसके लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता। वह कृत-कृत्य हो जाता है तथा संसार में उसका पुनर्जन्म नहीं होता।
श्री विश्वेश्वर की महिमा तो सर्वोपरि है ही किन्तु काशी के अन्य शिवलिङ्गों के दर्शनादि का फल भी अमोघ होता है। काशी में स्थापित एवं स्वयंभू शिवविग्रहों को संख्या अनन्त है। "काशी के कंकर भी शंकर समान है" यह लोकोक्ति प्रसिद्ध है। पार्वती की जिज्ञासा पर शिव जी ने स्वयं कहा है-"असंख्यातानि लिङ्गानि पार्वत्यानन्दकानने" (काशी खण्ड) इन असंख्य लिङ्गों में उन्होंने चौदह महालिङ्ग विशेष महत्त्व के बताये है जो कलियुग में गुप्त तो हो जायेंगे किन्तु उनका प्रभाव अपने-अपने स्थान पर बना रहेगा। ये प्रमुख लिङ्ग है-
(१) ओंकारेश्वर, (२) त्रिलोचनेश्वर, (३) महादेव, (४) कृत्तिवासेश्वर, (५) रत्नेश्वर, (६) चन्द्रेश्वर, (७) केदारेश्वर, (८) धर्मेश्वर, (९) वीरेश्वर, (१०) कामेश्वर, (११) विश्वकर्मेश्वर, (१२) मणिकर्णिकेश्वर, (१३) अविमुक्तेश्वर और (१४) विश्वेश्वर। इस निबन्ध में उनकी महिमा एवं स्थान का संक्षेप में उल्लेख किया गया है। इन शिवलिङ्गों की यात्रा का महत्त्व ज्येष्ठकृष्णपक्ष की प्रतिपदा से चतुर्दशी तक प्रतिदिन क्रमशः करने के विशेष माहात्म्य से है।
१- ओंकारेश्वर - यह शिवलिङ्ग, मच्छोदरी के पास उत्तर कोयला बाजार (ओंकारेश्वर मुहल्ले) में स्थित है। इस मुहल्ले को छित्तनपुरा भी कहते हैं। मत्स्योदरी तीर्थ में स्नान करके इनके दर्शन का निर्देश काशी-खण्ड में है।
२- त्रिलोचनेश्वर - यह मन्दिर त्रिलोचन घाट पर है। जहाँ त्रिलोचन लिङ्ग है वह विरजाख्यपीठ है। उस पीठ के दर्शन से मनुष्य रजोगुण से निवृत्त हो जाता है। इनके दर्शन से पातकों का नाश होता है और मुक्ति की चिन्ता नहीं रहती।
३- महादेव - महादेव या आदि महादेव का स्थान त्रिलोचन नाथ के मन्दिर के पीछे पूर्वदिशा में है। शिवलिङ्ग के पूर्वोत्तर अर्थात् ईशान भाग में उनके दर्शन से
पशुपाशच्छेद होता है।
४- कृत्तिवासेश्वर - यह स्थान वृद्धकाल के मार्ग में राय लल्लन जी के बगीचे में स्थित है। काशी में ऋषियों को पीड़ा देने वाले गजासुर का वध करके शंकर भगवान् ने उसकी त्वचा को अपना अधोवस्त्र बनाया इसलिये उनका कृत्तिवासेश्वर नाम प्रसिद्ध
हुआ। यह शिवलिङ्ग सबका शिरोभूत माना गया है।
कृत्तिवासेश्वरं नाम महापातकनाशनम् । सर्वेषामेव लिङ्गानां शिरोभूतमिदं परम् ।।
५- रत्नेश्वर - यह स्थान भी वृद्धकाल के मार्ग में कृत्तिवासेश्वर के पास ही है। इनके दर्शन से ज्ञानरत्न की प्राप्ति होती है।
६- चन्द्रेश्वर - संकठा देवी के मन्दिर के पास सिद्धेश्वरी देवी के मन्दिर में चन्द्रेश्वर का लिङ्ग है। इसी मन्दिर में चन्द्रकूप भी है। यह स्थान सिद्ध योगीश्वरी का पीठ है। यह शिवलिङ्ग चन्द्रदेव द्वारा स्थापित माना जाता है। गया में पिण्डदान से पितृगणों को जो तृप्ति होती है वैसे ही चन्द्रकूप तीर्थ में श्राद्ध करने से होने का प्रमाण
काशी खण्ड में है। यथा-गयायां पिण्डदानेन यथा तुष्यन्ति पूर्वजाः । तथा चन्द्रोदकूपेऽस्मिन् श्रद्वैस्तुष्यन्ति पूर्वजाः ।।
७- केदारेश्वर - केदारघाट पर प्रसिद्ध मन्दिर में यह विग्रह है। हिमालय पर्वत पर स्थित केदारेश्वर के दर्शन से जो पुण्य होता है उससे सात गुना फल काशी में केदारेश्वर के दर्शन से होता है। यथा-
तुषाराद्रिं समारुहा केदारं द्रक्ष्य यत्फलम् । तत्फलं सप्तगुणितं काश्यां केदारदर्शन ।।
८- धर्मेश्वर - यह स्थान लाहौरी टोला में मीरघाट पर स्थित है। इनके दर्शन से पुरुषार्थ की सिद्धि होती है।
९- वीरेश्वर यह स्थान सिंधिया घाट के ऊपर आत्मवीरेश्वर नाम से प्रसिद्ध है। यह शिवलिङ्ग सर्वसिद्धिदायक है तथा पुत्रदाता के रूप में प्रसिद्ध है। काशीखण्ड के अनुसार-
तिलान्तरापि नो काश्यां भूमिलिङ्गं विना क्वचित् । परं वीरेशसदृशं न लिङ्गं त्वाशुसिद्धिदम् ।।
१०- कामेश्वर - यह स्थान मच्छोदरी के पास त्रिलोचन गंज में है। शिवलिङ्ग दुर्वासा मुनि द्वारा स्थापित है। इसकी आराधना से मुनि की सारी कामनायें पूर्ण हुई थीं।
११- विश्वकर्मेश्वर - यह स्थान वाराणसी सिटी स्टेशन के पास गोलगड्डा में
स्थित है। यह विश्वकर्मा द्वारा स्थापित किया गया था। इनके दर्शन से सद्बुद्धि प्राप्त होती है जो मोक्ष के लिये हितकर है।
१२- मणिकर्णिकेश्वर यह स्थान मणिकर्णिकाघाट के ऊपर कासाराम की गली (गऊमठ) में स्थित है। इनके दर्शन से मोक्ष-लाभ होता है।
(१३) अविमुक्तेश्वर - यह शिवलिङ्ग विश्वनाथ मन्दिर में पूर्व-दक्षिण के कोण
पर है। जब विश्वेश्वर काशी से मन्दराचल जाने लगे तब भी उन्होंने काशी का लिङ्गरूप से त्याग नहीं किया। यह अविमुक्तेश्वर लिङ्ग काशी में ही नहीं, पृथ्वी में स्थापित प्रथम लिङ्ग माना जाता है। यथा-
आदिलिङ्गमिदं प्रोक्तमविमुक्तेश्वरं महत् । ततो लिङ्गान्तराण्यत्र जातानि क्षितिमण्डले ।।
१४- विश्वेश्वर - इस शिवलिङ्ग की महिमा, जो विश्वनाथ नाम से प्रसिद्ध है, सर्वविदित है। काशी खण्ड के अनुसार आलस्य करके भी जो इनके दर्शन को जाता है, उसे पद-पद पर अश्वमेध यज्ञ से अधिक पुण्यलाभ होता है। जो मनुष्य गंगा में स्नान करके श्रद्धापूर्वक दर्शन करता है उसके पुण्य का तो अन्त ही नहीं है। यथा-आलस्येनापि यो यायाद् गृहाद्विश्वेश्वरालयम् । अश्वमेधाधिको धर्मस्तदुपास्य पदे पदे ।।
यः स्नात्वोत्तरवाहिन्यां यदि विश्वेशदर्शने ।
श्रद्धापरेण यातस्य श्रेयसस्तेन विद्यते ।।
उपर्युक्त चौदह महालिङ्गों का दर्शन-पूजन, प्रत्येक काशीवासी को अवश्य करना चाहिये। यह सत्य है कि आज के युग में, काशी की तिथिवार-माह-वार्षिक आदि यात्राओं का जो विधान है उसके अनुसार यात्रा करना कठिन, फिर भी यथासमय सुविधानुसार दर्शन-पूजन करने का प्रयास अवश्य करना चाहिये।
डा आशीष पाण्डेय
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