Abhishek Tiwari

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'माफी मांग ली' फिर भी नहीं बची! KEM की स्टूडेंट सेजल पवार पर भारी पड़ रहा कॉमेडी शो....See moreमुंबई के KEM हॉस्पिटल ने ...
13/06/2026

'माफी मांग ली' फिर भी नहीं बची! KEM की स्टूडेंट सेजल पवार पर भारी पड़ रहा कॉमेडी शो....See more

मुंबई के KEM हॉस्पिटल ने MBBS छात्रा सेजल पवार के खिलाफ जांच शुरू कर दी है। कॉमेडियन प्रणीत मोरे के स्टैंड-अप शो में उसने पुरुष शवों (Male Cadavers) पर विवादित और अपमानजनक टिप्पणियां की थीं। सेजल ने लिखित माफी मांगी है, लेकिन हॉस्पिटल ने इसे गंभीरता से लिया है। इस बीच महाराष्ट्र साइबर ने प्रणीत मोरे, हिमांशु जांगड़ा, सेजल पवार और अन्यों के वायरल कॉमेडी वीडियो पर FIR दर्ज कर ली है। इस पूरे विवाद से डॉक्टर्स की इमेज खराब होने और डेड बॉडीज का सम्मान न करने का मुद्दा उठा है। लोग सोशल मीडिया पर इसकी निंदा कर रहे हैं। कॉमेडी शो में पवार की टिप्पणियों को गलत बताते हुए, हॉस्पिटल ने स्टूडेंट के खिलाफ जांच शुरू कर दी है। किंग एडवर्ड मेमोरियल (KEM) हॉस्पिटल और सेठ गोवर्धन दास सुंदर दास मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. हरीश पाठक ने कहा, "ऐसी बातें बिल्कुल भी स्वीकार्य और बर्दाश्त करने लायक नहीं हैं।" "हम मरे हुए लोगों के बारे में बात करते समय संवेदनशीलता बरतते हैं क्योंकि उनके अंगों को मेडिकल कामों के लिए डोनेट किया जा सकता है। हमने मामले की पूरी जांच के लिए दो सदस्यों की एक कमेटी बनाई है। शाम तक आने वाली जांच की रिपोर्ट के आधार पर उचित कार्रवाई की जाएगी।" KEM हॉस्पिटल के डीन डॉ. हरीश एम. पाठक ने मामले की जांच करने और उचित संस्थागत कार्रवाई के लिए रिपोर्ट सौंपने के लिए दो सदस्यों की एक कमेटी बनाई है। प्रणीत मोरे के शो के एक वायरल क्लिप में, पवार को मेडिकल जांच में इस्तेमाल होने वाली डेड बॉडी के बारे में बात करते हुए सुना जा सकता है। पवार बताती हैं कि शरीर के अंगों को कैसे काटा जाता है और फिर मरे हुए पुरुष मरीजों के प्राइवेट पार्ट्स पर आपत्तिजनक बात करती हैं।

विपक्ष के पास नीतियां हो सकती हैं, रणनीतियां हो सकती हैं, लेकिन केंद्र सरकार के पास 'मोदी-शाह' की वो जोड़ी है, जिसके आगे...
13/06/2026

विपक्ष के पास नीतियां हो सकती हैं, रणनीतियां हो सकती हैं, लेकिन केंद्र सरकार के पास 'मोदी-शाह' की वो जोड़ी है, जिसके आगे अच्छे-अच्छों की सियासी कश्ती बिना पतवार के तैरने लगती है।

नीति आयोग की इस बैठक में सभी 28 मुख्यमंत्रियों का बिना किसी नखरे के शामिल होना कोई इत्तेफाक नहीं था; यह अमित शाह की 'क्रोनोलॉजी' और पीएम मोदी के 'पॉलिटिकल ऑरा' का सीधा असर था।
नेताओं को समझ आ गया है कि जब सामने से 56 इंच का नेतृत्व और चाणक्य बुद्धि वाली रणनीति एक साथ चल रही हो, तो वीटो पावर या बॉयकॉट की जिद सिर्फ अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसी है।

अमित शाह की राजनीतिक कार्यशैली का एक ही नियम है—"काम करो या फिर काम से जाओ!" मुख्यमंत्रियों को अच्छी तरह पता है कि शाह की डायरी में हर राज्य का पूरा लेखा-जोखा रहता है।

होमवर्क का खौफ: बैठक में बैठे कई मुख्यमंत्रियों की स्थिति उस छात्र जैसी थी, जिसे पता हो कि क्लास टीचर (अमित शाह) के पास उसकी पुरानी सारी शरारतों की रिपोर्ट है। इसलिए कल कोई 'बैकबेंचर' शरारत करने के मूड में नहीं था। सबने खुशी-खुशी अपनी फाइलें आगे कीं और गुड बॉय बनकर बैठ गए।

बहिष्कार का डर गायब: पहले नेता सोचते थे कि दिल्ली न जाकर वो अपनी ताकत दिखा रहे हैं। लेकिन मोदी-शाह के दौर में यह साफ हो गया है कि अगर आप दिल्ली नहीं आएंगे, तो दिल्ली आपके राज्य में सीधे जनता से संवाद कर लेगी। यानी, 'बायपास सर्जरी' तय है! इसी क्रोनोलॉजी को समझते हुए सबने कहा—"बायपास होने से अच्छा है, सीधे बाई (PM) के पास ही बैठ जाते हैं।"

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी खूबी यही रही है कि वो सहयोगियों को साथ लाना और विरोधियों को अपनी पिच पर खिलाना अच्छे से जानते हैं। कल की बैठक में जब पीएम मोदी ने 'टीम इंडिया' और 'विकसित भारत' का नारा दिया, तो टेबल के दूसरी तरफ बैठे धुर विरोधियों के पास भी मेज थपथपाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।

सियासत का नया नियम: "मोदी और शाह की ताकत का लोहा अब वो भी मान रहे हैं, जो कल तक उनके खिलाफ गठबंधन की गांठें बांध रहे थे।"

नेताओं को यह बात पूरी तरह समझ आ गई है कि देश की जनता अब प्रधानमंत्री मोदी के विकास मॉडल से सीधे जुड़ चुकी है। ऐसे में विकास की इस रफ्तार का विरोध करना सीधे जनता की नाराजगी मोल लेना है। इसीलिए, कल सभी मुख्यमंत्रियों ने अपने राजनीतिक अजेंडे को किनारे रखा, चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान चिपकाई, और पूरे समर्पण के साथ 'देश पहले, राजनीति बाद में' के मंत्र को स्वीकार कर लिया।

अंततः, कल की नीति आयोग की बैठक ने भारतीय राजनीति की एक नई तस्वीर साफ कर दी है। मोदी और अमित शाह के बढ़ते कदम और मजबूत पकड़ ने मुख्यमंत्रियों के पुराने 'विवाद और नखरे' के सारे चैप्टर हमेशा के लिए बंद कर दिए हैं।

अब देश एक ऐसे दौर में है जहाँ ड्रामा फ्लॉप हो चुका है और सिर्फ डिलीवरी (काम) सुपरहिट है। उम्मीद है कि मुख्यमंत्रियों का यह 'समर्पण और खुशी' सिर्फ कल की फोटो तक नहीं रहेगी, बल्कि जब वो अपने राज्यों में लौटेंगे, तब भी उनके दिमाग में अमित शाह की 'क्रोनोलॉजी' और मोदी का 'विकसित भारत' वाला मंत्र गूंजता रहेगा।
साभार

जब राघव चड्ढा पार्टी से दूर हुए, तो ज्यादातर AAP समर्थकों ने उन्हें और उनकी पत्नी तक को निशाना बनाना शुरू कर दिया था...व...
13/06/2026

जब राघव चड्ढा पार्टी से दूर हुए, तो ज्यादातर AAP समर्थकों ने उन्हें और उनकी पत्नी तक को निशाना बनाना शुरू कर दिया था...

वहीं जब अन्नामलाई ने बीजेपी में अपनी भूमिका छोड़ी, तब भी अधिकांश भाजपा समर्थक उनके प्रति सम्मान बनाए हुए हैं और उनके योगदान को स्वीकार कर रहे हैं...

"यह अंतर राजनीतिक संस्कृति का है..."

एक लोकतांत्रिक संगठन में व्यक्ति का सम्मान उसके पद से नहीं, उसके योगदान से होता है. असहमति को दुश्मनी नहीं माना जाता...

जबकि व्यक्तिपूजा पर आधारित राजनीति में पार्टी लाइन से ज़रा सा भी हटना "विश्वासघात" मान लिया जाता है...

नेता आते-जाते रहते हैं किसी संगठन की असली पहचान इस बात से होती है कि वह अपने पूर्व नेताओं और असहमत लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है...
साभार

असम में एयरफोर्स विमान दुर्घटना की खबर चिंताजनक है।हम भारतीय वायुसेना के सभी वीर जवानों की सुरक्षा एवं कुशलता की कामना क...
13/06/2026

असम में एयरफोर्स विमान दुर्घटना की खबर चिंताजनक है।
हम भारतीय वायुसेना के सभी वीर जवानों की सुरक्षा एवं कुशलता की कामना करते हैं।
ईश्वर सभी को सुरक्षित रखे।

Jorhat |

यह कुछ दिन पहले जन्मा कॉकरोच Gen Z के नाम पर देश के युवाओं के नाम पर अपनी दुकान सजाने की सोच रहा था।उमर खालिद जैसे देश त...
13/06/2026

यह कुछ दिन पहले जन्मा कॉकरोच Gen Z के नाम पर देश के युवाओं के नाम पर अपनी दुकान सजाने की सोच रहा था।
उमर खालिद जैसे देश तोड़ने वाले के समर्थकों की भीड़ और हिंदू धर्म का अपमान करने वालों को साथ लेकर निकला।

सोशल मीडिया पर 22 मिलियन यानी कि 2 करोड़ 22 लाख लोगों का समर्थन लेके देश मैं आंदोलन करने निकला।

लेकिन मात्र अभी 3 प्रदेशों में तीन प्रोटेस्ट मैं ही सारी नेता गिरी धरी की धरी रह गई है।

पहला प्रोटेस्ट राज्य दिल्ली स्थान जंतर मंतर भीड़ पहुंची 1 हजार मात्र 5 घंटे मैं गर्मी लगने की वजह से आंदोलन खत्म
दूसरा प्रोटेस्ट राज्य महाराष्ट्र जगह पुणे भीड़ पहुंची 500 से 700 उम्मीद अनुसार लोग ना आए तो निकल लिए
तीसरा प्रोटेस्ट राज्य उत्तरप्रदेश जगह लखनऊ का इको गार्डन भीड़ पहुंची 500 लोगो की जब देखा कि लोग ध्यान नहीं दे रहे तो गाड़ी मैं बैठकर रफूचक्कर हो लिए।

आप खुद सोचिए कि यह नरेंद्र मोदी सरकार से बराबरी करने के लिए आंदोलन कर रहे है जिन्हें कुछ घंटों की गर्मी सहन नहीं हो रही है और दूसरी तरफ है नरेंद्र मोदी जो 75 साल की उम्र मैं 4 राज्यों के चुनावों में रैली, सभा करते रहे।

इन कीड़े मकोड़ों को कौन समझाए कि नेता बनते है सड़क पर तप कर पसीना बहाकर सोशल मीडिया पर बकवास करके कोई नेता नहीं बन सकता।

लेकिन केजरीवाल जैसे लुटेरे और जनता को ठगने वाले की ये उपज भूल गई कि इनकी दुकान चलने वाले नहीं है और जितनी तेजी से नाम फैला रहे थे उतनी तेजी से नाम लोगों के मुंह से गायब भी हो जाएगा।

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आपको क्या लगता है मोदी सरकार सही काम कर रही है या नहीं.
13/06/2026

आपको क्या लगता है मोदी सरकार सही काम कर रही है या नहीं.

Facebook और Instagram का सर्वर ग्लोबली हुआ डाउन, दुनियाभर के करोड़ों यूजर्स हुए परेशान
13/06/2026

Facebook और Instagram का सर्वर ग्लोबली हुआ डाउन, दुनियाभर के करोड़ों यूजर्स हुए परेशान

12 जून 1999 तोलोलिंग विजय: कारगिल युद्ध का वह मोड़ जिसने इतिहास बदल दियाकारगिल युद्ध के दौरान द्रास सेक्टर की बर्फीली और...
13/06/2026

12 जून 1999 तोलोलिंग विजय: कारगिल युद्ध का वह मोड़ जिसने इतिहास बदल दिया

कारगिल युद्ध के दौरान द्रास सेक्टर की बर्फीली और दुर्गम पहाड़ियों में स्थित तोलोलिंग चोटी केवल एक पहाड़ नहीं थी, बल्कि भारत की सामरिक सुरक्षा की धुरी थी। लगभग 16,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित यह चोटी श्रीनगर–लेह राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-1) पर निगरानी रखने की क्षमता रखती थी। 1999 में पाकिस्तानी सेना और उसके सैनिकों ने घुसपैठ कर इस महत्वपूर्ण चौकी पर अवैध कब्ज़ा जमा लिया था, जिससे लेह और कारगिल तक भारतीय सेना की आपूर्ति व्यवस्था खतरे में पड़ गई। इसीलिए तोलोलिंग को पुनः प्राप्त करना भारतीय सेना के लिए केवल एक सैन्य लक्ष्य नहीं, बल्कि राष्ट्र की अस्मिता का प्रश्न बन गया था।

मई 1999 के अंतिम सप्ताह से भारतीय सेना ने इस दुर्गम लक्ष्य को हासिल करने के लिए लगातार प्रयास शुरू किए। दुश्मन ऊँचाई पर बैठा था और भारतीय सैनिकों को लगभग सीधी खड़ी चट्टानों पर चढ़ते हुए हमला करना पड़ रहा था। तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे था, ऑक्सीजन की कमी थी, और हर कदम पर दुश्मन की मशीनगनों तथा मोर्टारों की मारक क्षमता मौजूद थी। इसके बावजूद 18 ग्रेनेडियर्स, नागा रेजिमेंट, गढ़वाल राइफल्स और अन्य इकाइयों के सैनिकों ने अद्भुत साहस का प्रदर्शन किया। अनेक प्रयासों में उन्हें भारी क्षति उठानी पड़ी, लेकिन किसी ने पीछे हटने की बात नहीं सोची।

31 मई तक दो बड़े प्रयास किए जा चुके थे और 2-3 जून की रात को भीषण संघर्ष हुआ, परंतु सफलता अभी दूर थी। अंततः निर्णायक जिम्मेदारी 2 राजपूताना राइफल्स को सौंपी गई। 12 जून 1999 की रात भारतीय सेना ने एक सुनियोजित अभियान के तहत दुश्मन को भ्रमित करने के लिए निकटवर्ती क्षेत्र में गतिविधियाँ बढ़ाईं और फिर अंधेरी रात में तोलोलिंग पर अंतिम आक्रमण शुरू किया। यह हमला इतना कठिन था कि कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों ने इसे लगभग आत्मघाती मिशन माना था। फिर भी भारतीय सैनिकों के हौसले हिमालय की चोटियों से भी ऊँचे थे।

रातभर चले भीषण युद्ध में भारतीय जवान दुश्मन की गोलियों की बौछार के बीच आगे बढ़ते रहे। कई सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए, अनेक गंभीर रूप से घायल हुए, लेकिन किसी ने अपने कदम पीछे नहीं खींचे। अंततः 13 जून 1999 की सुबह, कर्नल एम. वी. रविन्द्रनाथ के नेतृत्व में 2 राजपूताना राइफल्स ने तोलोलिंग पर तिरंगा फहरा दिया। इस विजय के लिए भारतीय सेना ने भारी बलिदान दिया; अनेक वीरों ने मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। लेकिन उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया—तोलोलिंग की जीत ने कारगिल युद्ध की दिशा ही बदल दी।

तोलोलिंग की विजय केवल एक सैन्य सफलता नहीं थी; यह भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस, अनुशासन, त्याग और राष्ट्रभक्ति का अमर प्रतीक बन गई। इस जीत ने पाकिस्तानी सेना के मनोबल को गहरा आघात पहुँचाया और भारतीय सेना को आगे चलकर टाइगर हिल सहित अन्य महत्वपूर्ण चोटियों को पुनः प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त किया। कारगिल की बर्फीली चोटियों पर बहा भारतीय वीरों का रक्त आज भी हमें याद दिलाता है कि भारत की सीमाएँ केवल हथियारों से नहीं, बल्कि उन सैनिकों के अटूट संकल्प से सुरक्षित हैं जो अपने आज को हमारे कल के लिए न्योछावर कर देते हैं।

तोलोलिंग की विजय हमें यह सिखाती है कि जब मातृभूमि की रक्षा का प्रश्न हो, तब भारतीय सैनिक असंभव को भी संभव बना देते हैं। 13 जून 1999 को फहराया गया वह तिरंगा केवल एक पहाड़ी पर नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के गर्व, सम्मान और आत्मविश्वास पर फहराया गया था। 🇮🇳

शत-शत नमन उन अमर वीरों को, जिनके बलिदान ने कारगिल की बर्फीली चोटियों को भी भारत माता की जय के उद्घोष से गुंजायमान कर दिया। 🇮🇳🙏

✈️ भारत के लिए ऐतिहासिक दिन! 'मेक इन इंडिया' की एक और बड़ी उड़ान! 🇮🇳रक्षा और विमानन के क्षेत्र में भारत ने आज एक नया इति...
13/06/2026

✈️ भारत के लिए ऐतिहासिक दिन! 'मेक इन इंडिया' की एक और बड़ी उड़ान! 🇮🇳
रक्षा और विमानन के क्षेत्र में भारत ने आज एक नया इतिहास रच दिया है। भारत में बना पहला Airbus C295 सैन्य परिवहन विमान (Military Transport Aircraft) गुजरात के वडोदरा से अपनी पहली उड़ान (Maiden Test Flight) सफलतापूर्वक पूरी कर चुका है।
यह केवल एक उड़ान नहीं, बल्कि 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान की एक बहुत बड़ी सफलता है। देश के इतिहास में पहली बार, निजी क्षेत्र (Private Sector) में टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स (TASL) और एयरबस की साझेदारी के तहत भारत की धरती पर एक सैन्य विमान का निर्माण और सफल परीक्षण किया गया है।
इस बड़ी कामयाबी की मुख्य बातें:
🔹 वडोदरा में निर्माण: इस विमान को गुजरात के वडोदरा स्थित प्लांट में पूरी तरह असेंबल और तैयार किया गया है।
🔹 बड़ी डील का हिस्सा: भारतीय वायुसेना के 56 विमानों के सौदे में से 16 स्पेन से आए हैं, और भारत में बनने वाले 40 विमानों में से यह पहला विमान है।
🔹 वायुसेना की बढ़ेगी ताकत: यह विमान दशकों पुराने 'एवरो-748' बेड़े की जगह लेगा और हमारी सामरिक क्षमता को दोगुना करेगा।
🔹 दुर्गम इलाकों के लिए वरदान: यह विमान 8 टन पेलोड या 70 सैनिकों को लेकर पहाड़ों और कच्चे एयरस्ट्रिप पर भी आसानी से लैंड कर सकता है।
भारतीय वायुसेना और टाटा-एयरबस की पूरी टीम को इस गौरवशाली उपलब्धि के लिए ढेर सारी बधाई! देश अब वैश्विक एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग का एक बड़ा हब बनने की ओर अग्रसर है। 🚁🔧

बहुत बुरा हाल है , कांग्रेस में मर्ज हो जाओ दीदी ।
12/06/2026

बहुत बुरा हाल है , कांग्रेस में मर्ज हो जाओ दीदी ।

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